नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह को देश के युवाओं, खासकर Gen-Z ने बड़े राजनीतिक बदलाव की उम्मीद के साथ समर्थन दिया था। पारंपरिक राजनीतिक दलों से अलग काम करने वाले युवा नेता के रूप में उभरे बालेन शाह से लोगों को सुशासन, विकास, रोजगार और नई राजनीतिक संस्कृति की उम्मीद थी। हालांकि, प्रधानमंत्री बनने के करीब 150 दिन बाद अब उनकी सरकार की कार्यशैली, विदेश नीति, आंतरिक सुरक्षा और कई फैसलों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
आलोचकों का दावा है कि बालेन शाह सरकार अभी तक उन अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरी नहीं उतर सकी है, जिनके आधार पर युवाओं ने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया था। नेपाल के Gen-Z युवाओं के एक वर्ग में भी सरकार की गति और नीतिगत फैसलों को लेकर असंतोष दिखाई देने की बात कही जा रही है।
रैपर से काठमांडू के मेयर और फिर प्रधानमंत्री तक पहुंचे बालेन शाह
बालेन शाह राजनीति में आने से पहले रैपर के रूप में भी पहचान बना चुके हैं। उन्होंने स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। काठमांडू के मेयर के रूप में काम करने के दौरान वे खासकर शहरी और युवा मतदाताओं के बीच लोकप्रिय हुए।
2025 में नेपाल में हुए Gen-Z प्रदर्शनों और उसके बाद आए राजनीतिक बदलाव के दौरान बालेन शाह युवाओं की उम्मीद के प्रमुख चेहरे के रूप में उभरे। बाद में चुनाव घोषित होने पर उन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के लिए पूरे देश में प्रचार किया और पार्टी ने उन्हें प्रधानमंत्री पद के प्रमुख चेहरे के रूप में प्रस्तुत किया।
केपी शर्मा ओली को हराकर सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे
बालेन शाह ने मार्च में हुए चुनाव में नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को उनके मजबूत राजनीतिक क्षेत्र झापा में हराया होने का दावा किया गया है। इस जीत के बाद बालेन शाह नेपाली राजनीति के सबसे प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए।
चुनाव के दौरान युवा मतदाताओं ने उनसे भ्रष्टाचार पर कार्रवाई, पारदर्शिता, रोजगार, तेज विकास और पुराने राजनीतिक ढांचे में बदलाव की अपेक्षा की थी। अब सरकार के शुरुआती महीनों के बाद इन्हीं मुद्दों पर उनके प्रदर्शन का मूल्यांकन किया जा रहा है।
भारतीय सामानों पर कस्टम शुल्क को लेकर विवाद
बालेन शाह सरकार का भारत से लाए जाने वाले सामानों पर नया कस्टम शुल्क लागू करने का निर्णय भी विवाद में रहा। बताया गया कि अप्रैल में भारत से सामान खरीदकर नेपाल लौटने वाले नागरिकों की सीमा पर जांच कड़ी कर दी गई थी।
भारत-नेपाल सीमा से जुड़े कई इलाकों में रहने वाले नेपाली नागरिक दवाइयों, किराने और रोजमर्रा के सामानों के लिए भारतीय बाजारों पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में नए नियमों के कारण आम लोगों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा और विरोध बढ़ने के बाद सरकार को फैसला वापस लेना पड़ा।
विदेश नीति पर भी उठे सवाल
प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन शाह ने कथित तौर पर मंत्री स्तर से नीचे के विदेशी प्रतिनिधियों के साथ आमने-सामने की बैठक न करने की नीति अपनाई थी। इस निर्णय को उनके कूटनीतिक दृष्टिकोण के रूप में देखा गया।
हालांकि, 10 अगस्त को उन्होंने काठमांडू के सिंह दरबार में भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव और चीनी राजदूत से अलग-अलग मुलाकात की। इसके बाद राजनीतिक विरोधियों और कुछ विश्लेषकों ने इसे विदेश नीति में यू-टर्न बताते हुए सवाल उठाए।
सांप्रदायिक हिंसा बनी सरकार के लिए बड़ी चुनौती
जुलाई के अंतिम सप्ताह में भारत से सटे नेपाल के दक्षिणी जिलों में हिंदू और मुस्लिम समूहों के बीच सांप्रदायिक झड़पें होने की खबरें सामने आईं। इन घटनाओं में तीन लोगों की मौत होने का दावा किया गया है।
स्थिति गंभीर होने के बाद बालेन शाह को प्रधानमंत्री के रूप में बड़ा सार्वजनिक संबोधन करना पड़ा। इस घटनाक्रम ने उनकी सरकार की कानून-व्यवस्था संभालने की क्षमता को लेकर नई बहस छेड़ दी।
विकास और प्रशासनिक गति पर भी सवाल
बालेन शाह के आलोचकों का कहना है कि सरकार बनने के बाद विकास परियोजनाओं को अपेक्षित गति नहीं मिल सकी। विदेश नीति में अनिश्चितता और प्रशासनिक फैसलों में बदलाव को लेकर भी राजनीतिक विरोधियों ने उन पर निशाना साधा है।
हालांकि, सरकार समर्थकों का तर्क है कि कुछ ही महीनों में किसी नई सरकार के प्रदर्शन का अंतिम मूल्यांकन करना जल्दबाजी होगी और संरचनात्मक बदलावों के परिणाम सामने आने में समय लग सकता है।
RSP के अंदर भी असंतोष की चर्चा
बालेन शाह की कार्यशैली पर केवल विपक्षी दल ही सवाल नहीं उठा रहे, बल्कि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के भीतर भी उनके सीमित जुड़ाव को लेकर चर्चा होने की बात सामने आई है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, 21 अगस्त को काठमांडू में RSP की केंद्रीय समिति की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई थी, जिसमें आगामी स्थानीय चुनावों की तैयारियों पर चर्चा होनी थी। हालांकि, बालेन शाह इस बैठक में शामिल नहीं हुए।
पार्टी बैठक के दौरान पोखरा-मुस्तांग जाने पर सवाल
रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि RSP की महत्वपूर्ण बैठक के दौरान बालेन शाह काठमांडू से पोखरा चले गए और बाद में मुस्तांग गए। इस घटनाक्रम के बाद पार्टी और सरकार के बीच समन्वय को लेकर राजनीतिक सवाल उठाए गए।
उनकी पार्टी के साथ सक्रिय सहभागिता कितनी है और सरकार के फैसलों में RSP की भूमिका क्या है, यह भी नेपाली राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है।
Gen-Z की उम्मीदों के बीच बालेन शाह की सबसे बड़ी परीक्षा
बालेन शाह के राजनीतिक उदय में Gen-Z युवाओं का बड़ा योगदान माना जाता है। यही वजह है कि उनकी सरकार से अपेक्षाएं भी बहुत अधिक हैं। युवा मतदाता अब रोजगार, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक सुधार, कूटनीति और विकास के मोर्चे पर ठोस नतीजों की उम्मीद कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री के रूप में शुरुआती 150 दिन पूरे होने के बाद बालेन शाह की सबसे बड़ी चुनौती उन मतदाताओं का भरोसा कायम रखने की है, जिन्होंने उन्हें पारंपरिक राजनीति के विकल्प के रूप में चुना था। आने वाले महीनों में उनकी सरकार के फैसले ही तय करेंगे कि बालेन शाह परिवर्तन के अपने राजनीतिक वादे को कितनी मजबूती से आगे बढ़ा पाते हैं।
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