उत्तर प्रदेश में 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर कई शहरों में लगाए गए पोस्टरों ने एक बार फिर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उस भयावह सांप्रदायिक हिंसा की याद ताजा कर दी है। लखनऊ, मुजफ्फरनगर, अलीगढ़, सहारनपुर और शामली समेत कई स्थानों पर ‘न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे’ लिखे पोस्टर दिखाई दिए हैं।
इन पोस्टरों के सामने आने के बाद 13 साल पुराने मुजफ्फरनगर दंगों, उनकी शुरुआत, प्रशासनिक भूमिका, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और उसके बाद चली लंबी कानूनी प्रक्रिया की फिर चर्चा हो रही है।
27 अगस्त से शुरू हुआ तनाव, 7 सितंबर को व्यापक हुई हिंसा
मुजफ्फरनगर दंगों को अक्सर 7 सितंबर 2013 से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन घटनाक्रम की शुरुआत इससे पहले 27 अगस्त 2013 को कवाल गांव की घटना से हो चुकी थी।
7 सितंबर को नंगला मंदौड़ में हुई बड़ी महापंचायत के बाद हिंसा ने व्यापक रूप ले लिया। उपलब्ध सरकारी और जांच रिकॉर्ड के मुताबिक 27 अगस्त से 16 सितंबर के बीच मुजफ्फरनगर समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में बड़ी संख्या में सांप्रदायिक घटनाएं दर्ज हुईं।
मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत, मेरठ और सहारनपुर तक फैले तनाव ने करीब तीन सप्ताह तक पूरे क्षेत्र की कानून-व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी थी। आगजनी, हिंसा, पलायन और राहत शिविर उस दौर की पहचान बन गए थे।
लखनऊ, उत्तर प्रदेश: गोमती नगर के विपुल खंड 4 में CMS (सिटी मोंटेसरी स्कूल) चौराहे पर एक पोस्टर देखा गया। इस पोस्टर में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव को कथित तौर पर एक लड़की का डांस देखते हुए दिखाया गया है और इसमें मुज़फ़्फ़रनगर दंगों का भी ज़िक्र है। पोस्टर पर लिखा है: "न… pic.twitter.com/pdT50O9n9h
— IANS Hindi (@IANSKhabar) September 7, 2026
कवाल की घटना के बाद तेजी से बिगड़े हालात
27 अगस्त 2013 को जानसठ थाना क्षेत्र के कवाल गांव में शाहनवाज, सचिन और गौरव की मौत हुई थी। इस घटना के बाद क्षेत्र में तनाव तेजी से बढ़ा।
मामले को लेकर उसी दिन अलग-अलग FIR दर्ज की गई थीं। शुरुआती पुलिस रिकॉर्ड और बाद में सार्वजनिक तथा राजनीतिक मंचों पर सामने आए दावों के बीच अंतर को लेकर भी लंबे समय तक सवाल उठते रहे।
कवाल की घटना के बाद पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लिया था। बाद में कुछ लोगों को पर्याप्त आधार नहीं मिलने अथवा FIR में नाम न होने के कारण छोड़ा गया। न्यायमूर्ति विष्णु सहाय आयोग ने बाद में शुरुआती पुलिस और प्रशासनिक फैसलों को लेकर सवाल उठाए और माना कि कुछ फैसलों ने समुदायों के बीच अविश्वास बढ़ाने में भूमिका निभाई।
28 अगस्त के बाद लगातार बढ़ता गया तनाव
कवाल की घटना के अगले दिन क्षेत्र में तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाओं की खबरें सामने आईं। 29 अगस्त को कवाल और आसपास के क्षेत्र में धारा 144 लागू की गई और सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाई गई।
30 अगस्त 2013 को मुजफ्फरनगर के शहीद चौक पर नमाज के बाद बड़ी सभा हुई। इस सभा और इसमें दिए गए भाषणों को लेकर पुलिस कार्रवाई हुई और मामला दर्ज किया गया।
इसके बाद 31 अगस्त को नंगला मंदौड़ और सिखेड़ा क्षेत्र में पंचायत हुई। लगातार हो रही सभाओं और बढ़ते तनाव ने प्रशासन के सामने चुनौती और गंभीर कर दी।
7 सितंबर की महापंचायत बनी निर्णायक मोड़
7 सितंबर 2013 को नंगला मंदौड़ इंटर कॉलेज के मैदान में बड़ी महापंचायत आयोजित हुई। अलग-अलग रिपोर्टों और प्रशासनिक आकलनों में इसमें शामिल लोगों की संख्या को लेकर अलग-अलग अनुमान सामने आए थे।
इस महापंचायत में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई प्रमुख किसान और राजनीतिक नेता शामिल हुए थे। महापंचायत के संबंध में सिखेड़ा थाने में FIR दर्ज की गई और कई लोगों को नामजद किया गया।
जांच आयोग ने बाद में प्रशासन द्वारा महापंचायत और उसके संभावित असर का पर्याप्त आकलन नहीं कर पाने तथा प्रभावी नियंत्रण नहीं कर पाने पर सवाल उठाए।
महापंचायत के बाद कई इलाकों में हिंसा
महापंचायत खत्म होने के बाद लौट रहे लोगों के रास्ते में जौली नहर पट्टी और अन्य इलाकों में हिंसक घटनाएं हुईं। दोनों समुदायों के लोगों की मौत और घायल होने की खबरें सामने आईं।
इसके बाद हिंसा मुजफ्फरनगर शहर और ग्रामीण इलाकों से आगे शामली तक फैल गई। मुजफ्फरनगर, शामली और मेरठ समेत कई क्षेत्रों में कर्फ्यू लगाना पड़ा।
कुटबा-कुटबी, फुगाना, लिसाढ़, लांक, बहावड़ी, काकड़ा और आसपास के कई गांव हिंसा और पलायन से प्रभावित हुए।
हालात बिगड़े तो बुलानी पड़ी सेना
स्थिति लगातार बिगड़ने के बाद राज्य सरकार को सेना की मदद लेनी पड़ी। 9 सितंबर तक सेना और अन्य केंद्रीय सुरक्षा बल कई संवेदनशील इलाकों में तैनात कर दिए गए थे।
यह उस समय उत्तर प्रदेश सरकार के लिए कानून-व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन गया था। पुलिस और स्थानीय प्रशासन की शुरुआती प्रतिक्रिया को लेकर बाद में राजनीतिक दलों से लेकर जांच आयोग तक ने गंभीर सवाल उठाए।
60 से ज्यादा लोगों की मौत, हजारों हुए विस्थापित
मुजफ्फरनगर हिंसा में मौतों के सरकारी आंकड़े अलग-अलग समय पर बदलते रहे। अक्टूबर 2013 तक सरकारी रिकॉर्ड में 60 से अधिक लोगों की मौत की पुष्टि की गई थी। विभिन्न रिपोर्टों और आयोग के आंकड़ों में कुल मृतकों की संख्या करीब 62 से 65 के बीच बताई गई।
इस हिंसा की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों में से एक बड़े पैमाने पर हुआ विस्थापन था। दोनों समुदायों से जुड़े अनेक परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़े। हजारों लोग राहत शिविरों और अस्थायी ठिकानों तक पहुंचे।
कई परिवार लंबे समय तक अपने गांवों और घरों में वापस नहीं लौट सके। इस वजह से दंगों का सामाजिक और आर्थिक असर वर्षों तक महसूस किया गया।
अखिलेश यादव सरकार पर उठे थे गंभीर सवाल
दंगों के समय उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी सरकार थी। हिंसा फैलने के बाद विपक्षी दलों ने सरकार पर कानून-व्यवस्था संभालने में विफल रहने, प्रशासनिक ढिलाई और कथित पक्षपात के आरोप लगाए थे।
बीजेपी ने राज्यपाल से हस्तक्षेप की मांग की थी, जबकि कांग्रेस समेत अन्य दलों ने भी सरकार और पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाए थे।
बाद में जांच आयोग ने पुलिस और प्रशासन के कुछ शुरुआती फैसलों, गलत आकलन और स्थिति को समय रहते नियंत्रित न कर पाने की कमियों का उल्लेख किया।
डीएम और एसएसपी के तबादले तथा कवाल प्रकरण में हिरासत में लिए गए कुछ लोगों को छोड़े जाने जैसे फैसलों को लेकर भी उस समय राजनीतिक विवाद हुआ था।
भड़काऊ भाषण और वीडियो भी जांच के दायरे में आए
दंगों के दौरान सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो और विभिन्न सभाओं में दिए गए कथित भड़काऊ भाषणों को तनाव बढ़ाने वाले कारणों में गिना गया।
कई नेताओं और अन्य लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए। कुछ मामलों में जांच एजेंसियों को पर्याप्त सबूत नहीं मिले, जबकि कुछ मुकदमे लंबे समय तक अदालतों में चलते रहे।
सोशल मीडिया पर प्रसारित कुछ वीडियो की प्रामाणिकता और उनके स्रोत को लेकर भी विवाद हुआ था।
सैकड़ों मुकदमे, कई मामलों में आरोपी बरी
दंगों के बाद सितंबर 2013 में विशेष जांच प्रकोष्ठ बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट के सामने बाद में बताया गया कि सैकड़ों मामलों की जांच की जा रही थी।
हालांकि वर्षों तक चली न्यायिक प्रक्रिया में कई मामलों में आरोपी बरी भी हुए। गवाहों के मुकर जाने, अदालत में उपस्थित न होने और पर्याप्त प्रत्यक्ष साक्ष्य न मिल पाने जैसी वजहें कई मामलों में सामने आईं।
वहीं कवाल में सचिन और गौरव की हत्या के मामले में 2019 में सात आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।
13 साल बाद पोस्टरों से फिर उठा सवाल
अब 2026 में मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर ‘न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे’ लिखे पोस्टरों ने 2013 की घटनाओं को एक बार फिर सार्वजनिक और राजनीतिक चर्चा में ला दिया है।
दंगों के 13 साल बाद भी उन परिवारों के लिए यह घटना केवल इतिहास का हिस्सा नहीं है, जिन्होंने हिंसा में अपने परिजन खोए, घर छोड़े या राहत शिविरों में रहने को मजबूर हुए।
मुजफ्फरनगर दंगों ने प्रशासनिक व्यवस्था के सामने एक अहम सवाल भी छोड़ा—क्या कवाल की शुरुआती घटना के बाद प्रभावी और निष्पक्ष कार्रवाई, अफवाहों पर तेजी से नियंत्रण और संवेदनशील इलाकों में पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था की जाती, तो हिंसा को इतना व्यापक होने से रोका जा सकता था?
यह सवाल 2013 में भी चर्चा में था और 13 साल बाद भी मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर फिर सामने है।
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