भारत अपने स्वदेशी सैटेलाइट इंटरनेट नेटवर्क की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने जा रहा है। मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाली रिलायंस जियो के लगभग 1,600 लो-अर्थ ऑर्बिट यानी LEO सैटेलाइट्स पर आधारित कम्युनिकेशन नेटवर्क को भारतीय अंतरिक्ष नियामक इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड ऑथराइजेशन सेंटर (IN-SPACe) से तकनीकी हरी झंडी मिल गई है।
IN-SPACe ने विस्तृत मूल्यांकन के बाद जियो की प्रस्तावित सैटेलाइट प्रणाली को ‘Technically Sound’ यानी तकनीकी रूप से सक्षम बताया है। यह कदम परियोजना के लिए एक महत्वपूर्ण नियामकीय उपलब्धि है, हालांकि व्यावसायिक सेवाएँ शुरू करने से पहले कंपनी को स्पेक्ट्रम, दूरसंचार और अन्य आवश्यक अनुमतियाँ भी हासिल करनी होंगी।
ISRO और दूरसंचार विभाग के साथ हुआ तकनीकी मूल्यांकन
रिपोर्ट के अनुसार, रिलायंस जियो के प्रस्ताव की समीक्षा IN-SPACe ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO और दूरसंचार विभाग के वायरलेस प्लानिंग एंड कोऑर्डिनेशन विंग (WPC) के साथ समन्वय करके की।
इस दौरान सैटेलाइट नेटवर्क की तकनीकी क्षमता, संभावित ऑर्बिट, फ्रीक्वेंसी इस्तेमाल, स्पेक्ट्रम समन्वय, ग्राउंड स्टेशन और संचार सेवाओं से जुड़े विभिन्न पहलुओं का मूल्यांकन किया गया। समीक्षा के बाद प्रस्तावित प्रणाली को वैश्विक LEO नेटवर्क के तकनीकी मानकों के अनुरूप माना गया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जियो को मिल सकता है सरकारी सहयोग
तकनीकी हरी झंडी मिलने के बाद भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय नियामकीय प्रक्रियाओं में जियो की सहायता कर सकेगी। इनमें इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन (ITU) के समक्ष जरूरी फाइलिंग, स्पेक्ट्रम समन्वय, ऑर्बिटल अधिकार और दूसरे देशों या सैटेलाइट ऑपरेटरों के साथ तालमेल जैसे मामले शामिल हो सकते हैं।
LEO सैटेलाइट नेटवर्क के लिए केवल उपग्रहों का निर्माण और प्रक्षेपण पर्याप्त नहीं होता। कंपनियों को निर्धारित रेडियो फ्रीक्वेंसी, ऑर्बिटल संसाधनों और अंतरराष्ट्रीय समन्वय से जुड़ी जटिल प्रक्रियाएँ भी पूरी करनी होती हैं।
क्या होता है LEO सैटेलाइट नेटवर्क?
लो-अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट आमतौर पर पृथ्वी के अपेक्षाकृत नजदीक स्थापित किए जाते हैं। पारंपरिक जियोस्टेशनरी सैटेलाइट्स की तुलना में कम ऊँचाई पर होने के कारण इनके माध्यम से इंटरनेट सेवा में कम विलंब यानी लो-लेटेंसी और बेहतर स्पीड मिलने की संभावना होती है।
इसी तकनीक का इस्तेमाल एलन मस्क की कंपनी SpaceX के Starlink नेटवर्क में किया जाता है। रिलायंस जियो भी बड़े पैमाने पर सैटेलाइट समूह तैयार कर भारत में हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड और मोबाइल कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने की योजना बना रही है।
दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुँचेगा हाई-स्पीड इंटरनेट
जियो का प्रस्तावित नेटवर्क उन क्षेत्रों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है, जहाँ फाइबर, मोबाइल टावर या पारंपरिक दूरसंचार नेटवर्क पहुँचाना कठिन और महँगा है।
परियोजना के माध्यम से कंपनी निम्न सेवाएँ उपलब्ध करा सकती है:
- हाई-स्पीड सैटेलाइट ब्रॉडबैंड
- मोबाइल टावरों के लिए सेल्युलर बैकहॉल
- ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी
- समुद्री और दूरस्थ औद्योगिक क्षेत्रों में संचार
- आपदा के समय वैकल्पिक कम्युनिकेशन नेटवर्क
- डायरेक्ट-टू-डिवाइस मोबाइल सैटेलाइट सेवा
डायरेक्ट-टू-डिवाइस तकनीक के माध्यम से भविष्य में मोबाइल उपकरण सीमित परिस्थितियों में सीधे सैटेलाइट नेटवर्क से जुड़ सकेंगे।
भारत में लगाए जा सकते हैं 20 से 22 ग्राउंड स्टेशन
रिपोर्ट के मुताबिक, रिलायंस जियो भारत में करीब 20 से 22 ग्राउंड स्टेशन स्थापित करने की योजना बना रही है। ये स्टेशन सैटेलाइट्स और जमीन पर मौजूद इंटरनेट एवं दूरसंचार नेटवर्क के बीच डेटा ट्रांसफर करने का काम करेंगे।
कंपनी ने भारत के लिए करीब 4.5 से 5 टेराबिट प्रति सेकंड की क्षमता उपलब्ध कराने का प्रस्ताव रखा है। यदि यह क्षमता पूरी तरह विकसित होती है, तो जियो का नेटवर्क देश में बड़े पैमाने पर ब्रॉडबैंड, मोबाइल बैकहॉल और एंटरप्राइज सेवाएँ देने में सक्षम हो सकता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है परियोजना?
जियो का प्रस्तावित सैटेलाइट नेटवर्क केवल व्यावसायिक इंटरनेट सेवाओं तक सीमित नहीं माना जा रहा। यह भारत की रणनीतिक और सुरक्षित संचार क्षमताओं को भी मजबूत कर सकता है।
युद्ध, प्राकृतिक आपदा, साइबर हमला या पारंपरिक संचार नेटवर्क के बाधित होने की स्थिति में स्वदेशी सैटेलाइट प्रणाली एक वैकल्पिक कम्युनिकेशन नेटवर्क उपलब्ध करा सकती है। इससे सरकारी एजेंसियों, आपदा प्रबंधन टीमों और महत्वपूर्ण संस्थानों के बीच संपर्क बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों के बीच कई देश विदेशी सैटेलाइट नेटवर्क पर निर्भरता कम करने और अपनी संप्रभु अंतरिक्ष-आधारित संचार व्यवस्था विकसित करने पर जोर दे रहे हैं। जियो की परियोजना को भारत की इसी रणनीतिक दिशा से जोड़कर देखा जा रहा है।
Starlink के लिए बनेगी बड़ी घरेलू चुनौती
वैश्विक LEO सैटेलाइट इंटरनेट बाजार में फिलहाल Starlink सबसे बड़ा नेटवर्क संचालित करता है। जियो की योजना सैटेलाइट संख्या के मामले में Starlink से छोटी होगी, लेकिन भारत जैसे विशाल बाजार में उसे एक मजबूत स्वदेशी विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
जियो को घरेलू दूरसंचार नेटवर्क, करोड़ों मोबाइल ग्राहकों, फाइबर इंफ्रास्ट्रक्चर और व्यापक रिटेल पहुँच का लाभ मिल सकता है। हालांकि परियोजना को पूरा करने के लिए भारी निवेश, सैटेलाइट निर्माण, सफल लॉन्च, स्पेक्ट्रम आवंटन और अंतिम नियामकीय स्वीकृतियाँ महत्वपूर्ण होंगी।
जियो की पुरानी सैटेलाइट साझेदारी से अलग है नया प्लान
रिलायंस जियो पहले से लक्जमबर्ग की कंपनी SES के साथ Orbit Connect India के माध्यम से सैटेलाइट ब्रॉडबैंड क्षेत्र में काम कर रही है। उस व्यवस्था में मुख्य रूप से मौजूदा विदेशी सैटेलाइट क्षमता का उपयोग किया जाना है।
इसके विपरीत, 1,600 LEO सैटेलाइट वाली नई परियोजना को जियो का अपना बड़े पैमाने का घरेलू सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन बताया जा रहा है। इसलिए इसे भारत के निजी अंतरिक्ष और दूरसंचार क्षेत्र के लिए अधिक रणनीतिक परियोजना माना जा रहा है।
अभी किन चुनौतियों को पार करना होगा?
IN-SPACe का तकनीकी मूल्यांकन एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन परियोजना के सामने अभी कई चरण बाकी हैं। इनमें अंतिम प्राधिकरण, स्पेक्ट्रम आवंटन, ITU समन्वय, उपग्रहों का निर्माण, प्रक्षेपण व्यवस्था, ग्राउंड स्टेशन की स्थापना और व्यावसायिक सेवा की अनुमति शामिल हो सकती है।
इसलिए इसे तत्काल सैटेलाइट इंटरनेट सेवा शुरू करने की अंतिम मंजूरी के बजाय परियोजना के तकनीकी रूप से आगे बढ़ने का बड़ा रास्ता साफ होने के रूप में देखा जाना चाहिए।
भारत को मिल सकते हैं ये बड़े फायदे
अगर रिलायंस जियो की यह परियोजना तय योजना के अनुसार आगे बढ़ती है, तो भारत को दूरदराज के क्षेत्रों में बेहतर डिजिटल कनेक्टिविटी, स्वदेशी सैटेलाइट इंटरनेट नेटवर्क, मजबूत रणनीतिक संचार व्यवस्था और विदेशी नेटवर्क पर कम निर्भरता जैसे लाभ मिल सकते हैं।
यह परियोजना भारत को वैश्विक सैटेलाइट इंटरनेट बाजार में केवल एक उपभोक्ता नहीं, बल्कि एक प्रमुख नेटवर्क निर्माता और सेवा प्रदाता के रूप में स्थापित करने की क्षमता रखती है।
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