छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने राज्य के सरकारी स्कूलों में सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र और अन्य प्रार्थनाएँ कराए जाने से जुड़े सरकारी आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि वर्तमान स्तर पर ऐसा कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो कि किसी छात्र को उसकी इच्छा के विरुद्ध इन प्रार्थनाओं या मंत्रों का पाठ करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की अदालत में हुई। हाई कोर्ट ने याचिका को समय से पहले दाखिल की गई याचिका मानते हुए कहा कि केवल आशंका के आधार पर सरकारी आदेश को रद्द नहीं किया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में किसी बच्चे पर जबरदस्ती की जाती है, उसके धार्मिक अधिकारों में हस्तक्षेप होता है या उसके साथ किसी प्रकार का भेदभाव किया जाता है, तो संबंधित पक्ष ठोस सबूतों के साथ दोबारा अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है।
क्या था पूरा मामला?
छत्तीसगढ़ सरकार के स्कूल शिक्षा विभाग ने सरकारी स्कूलों की प्रार्थना सभा और दैनिक गतिविधियों को लेकर एक व्यवस्था लागू की थी। इसके तहत सुबह की सभा में राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, दीप मंत्र, सरस्वती वंदना और गुरु मंत्र जैसे पाठ शामिल किए गए। इसके अलावा छात्रों को महापुरुषों के जीवन से जुड़ी प्रेरक कहानियाँ सुनाने की व्यवस्था भी की गई।
दोपहर के भोजन से पहले भोजन मंत्र और स्कूल की छुट्टी से पहले गायत्री मंत्र तथा शांति मंत्र के पाठ का प्रावधान भी इस व्यवस्था का हिस्सा बताया गया। इसी आदेश को लेकर हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई थी।
याचिकाकर्ताओं ने क्या आपत्ति जताई?
याचिका छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन अब्दुल सलाम रिजवी, अल्पसंख्यक विभाग के पूर्व चेयरमैन महेंद्र छाबड़ा और सामाजिक कार्यकर्ता शफीक अहमद की ओर से दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सरकारी स्कूलों में इस प्रकार की प्रार्थनाओं को अनिवार्य करना छात्रों की व्यक्तिगत और धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ हो सकता है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि स्कूलों में शामिल की गई प्रार्थनाएँ एक विशेष धार्मिक परंपरा से जुड़ी हैं और सभी छात्रों पर उन्हें लागू करना संविधान की भावना के विपरीत है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से सरकारी आदेश पर रोक लगाने की मांग की थी।
हाई कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?
हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस मामला सामने नहीं आया, जिसमें किसी छात्र को जबरन सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र या किसी अन्य प्रार्थना का पाठ करने के लिए मजबूर किया गया हो।
अदालत ने यह भी कहा कि किसी सरकारी आदेश को केवल इस आशंका पर असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता कि भविष्य में उसका दुरुपयोग हो सकता है। कोर्ट के अनुसार, जब तक वास्तविक अधिकार हनन का कोई प्रमाण सामने नहीं आता, तब तक इस तरह की चुनौती को स्वीकार करना उचित नहीं होगा।
‘संस्कार और नैतिक शिक्षा देना गलत नहीं’
हाई कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 28(1) का उल्लेख करते हुए धार्मिक शिक्षा और नैतिक शिक्षा के बीच अंतर पर जोर दिया।
अदालत ने कहा कि सरकारी शिक्षण संस्थानों में किसी विशेष धर्म की पूजा-पद्धति या धार्मिक शिक्षा देने पर संवैधानिक सीमाएँ हैं, लेकिन बच्चों को नैतिक मूल्य, अनुशासन, अच्छे संस्कार और सामाजिक जिम्मेदारी सिखाना अलग विषय है।
कोर्ट के अनुसार, बच्चों को अच्छा नागरिक बनाने, समाज में भाईचारा बढ़ाने और जिम्मेदार व्यवहार सिखाने के उद्देश्य से दी जाने वाली नैतिक शिक्षा पर रोक नहीं लगाई जा सकती।
संविधान का अनुच्छेद 28(1) क्या कहता है?
संविधान का अनुच्छेद 28 सरकारी धन से पूरी तरह संचालित शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा से संबंधित है। इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राज्य द्वारा संचालित संस्थानों में किसी विशेष धर्म की धार्मिक शिक्षा अनिवार्य रूप से न दी जाए। हालांकि, किसी गतिविधि को धार्मिक शिक्षा माना जाए या सांस्कृतिक, नैतिक अथवा मूल्य आधारित शिक्षा- यह प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने वर्तमान मामले में कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि सरकारी आदेश के कारण छात्रों के संवैधानिक अधिकारों का वास्तविक उल्लंघन हुआ है।
सरकार ने कोर्ट में क्या कहा?
राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि स्कूलों में कराए जा रहे मंत्र और वंदनाएँ किसी धर्म विशेष को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लागू नहीं की गई हैं। सरकार का तर्क था कि इन गतिविधियों का उद्देश्य छात्रों में अनुशासन, बड़ों के प्रति सम्मान, नैतिक मूल्य और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना है। सरकार ने यह भी कहा कि यह व्यवस्था भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं और मूल्य आधारित शिक्षा का हिस्सा है।
राज्य की ओर से अदालत में यह दलील भी दी गई कि व्यवस्था लागू होने के बाद किसी छात्र या अभिभावक की ओर से जबरदस्ती या उत्पीड़न की ठोस शिकायत सामने नहीं आई है।
स्कूलों की सुबह की सभा में क्या-क्या शामिल?
स्कूल शिक्षा विभाग की व्यवस्था के अनुसार, सरकारी स्कूलों में सुबह की सभा में कई गतिविधियाँ शामिल की गई हैं।
इनमें प्रमुख रूप से:
- राष्ट्रगान
- राष्ट्रगीत
- दीप मंत्र
- सरस्वती वंदना
- गुरु मंत्र
- महापुरुषों की प्रेरक कहानियाँ
शामिल हैं। इसके अलावा भोजन से पहले भोजन मंत्र और छुट्टी से पहले गायत्री मंत्र तथा शांति मंत्र के पाठ की व्यवस्था भी बताई गई है।
क्या छात्रों के लिए प्रार्थना अनिवार्य है?
याचिका पर सुनवाई के दौरान सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही था कि क्या छात्रों को इन प्रार्थनाओं में भाग लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
हाई कोर्ट ने कहा कि उसके सामने ऐसा कोई प्रमाण पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो कि किसी छात्र पर दबाव डाला गया है। अदालत ने इसी आधार पर याचिका को फिलहाल खारिज कर दिया।
हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि भविष्य में यदि किसी छात्र को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी धार्मिक गतिविधि में शामिल करने का मामला सामने आता है, तो अदालत में नई चुनौती दी जा सकती है।
भविष्य में जबरदस्ती हुई तो फिर खुला रहेगा कोर्ट का रास्ता
हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के लिए भविष्य का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया है।
कोर्ट ने कहा कि यदि आगे किसी छात्र के साथ जबरदस्ती की जाती है, धार्मिक आधार पर भेदभाव होता है या किसी के मौलिक अधिकारों का हनन होता है, तो ठोस सबूतों के आधार पर नई याचिका दायर की जा सकती है। इस टिप्पणी के साथ अदालत ने वर्तमान याचिका खारिज कर दी।
फैसले के बाद बढ़ी कानूनी और राजनीतिक चर्चा
हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक शिक्षा और स्कूलों में नैतिक मूल्यों को लेकर बहस तेज हो सकती है।
एक पक्ष इसे भारतीय संस्कृति और मूल्य आधारित शिक्षा से जोड़कर देख रहा है, जबकि दूसरा पक्ष सरकारी स्कूलों में किसी भी धार्मिक प्रतीक या मंत्र की भूमिका पर सवाल उठा रहा है। फिलहाल अदालत ने साफ कर दिया है कि किसी वास्तविक जबरदस्ती या अधिकार हनन के प्रमाण के बिना सरकारी आदेश को रद्द नहीं किया जा सकता।
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