भारत में स्कूल और कॉलेज स्तर पर सेक्स एजुकेशन को लेकर लंबे समय से चली आ रही सामाजिक झिझक के बीच एक महत्वपूर्ण नीतिगत पहल सामने आई है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि उसने राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर स्कूलों और कॉलेजों में कॉम्प्रिहेंसिव सेक्स एजुकेशन यानी व्यापक यौन शिक्षा शुरू करने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है।
हालांकि, यह व्यवस्था अभी लागू नहीं हुई है। केंद्र ने अदालत को बताया कि सुप्रीम कोर्ट से आवश्यक मंजूरी और निर्देश मिलने के बाद इसे देशभर में लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ के समक्ष केंद्र की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी पेश हुईं। उन्होंने बताया कि सरकार ने राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और उसकी सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है।
रिपोर्ट में स्कूलों और कॉलेजों में उम्र के अनुरूप व्यापक सेक्स एजुकेशन शुरू करने, बच्चों को यौन शोषण से बचाने और किशोरावस्था से जुड़े शारीरिक एवं भावनात्मक बदलावों के बारे में वैज्ञानिक जानकारी देने की सिफारिश की गई है।
प्रस्तावित पाठ्यक्रम में केवल प्रजनन या यौन संबंधों की जानकारी नहीं होगी, बल्कि बच्चों की सुरक्षा, शरीर की निजता, स्वास्थ्य, स्वच्छता, सहमति और यौन शोषण से बचाव जैसे विषयों को भी शामिल किया जा सकता है।
POCSO कानून से जुड़ी सुनवाई के दौरान आया प्रस्ताव
यह विशेषज्ञ समिति सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित की गई थी। अदालत किशोरियों के गर्भवती होने और आपसी सहमति वाले किशोर प्रेम संबंधों में POCSO कानून के इस्तेमाल से पैदा होने वाली कानूनी एवं सामाजिक जटिलताओं पर विचार कर रही है।
POCSO कानून के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति की सहमति को कानूनी सहमति नहीं माना जाता। इसके कारण कुछ मामलों में आपसी सहमति से बने किशोर संबंध भी आपराधिक मुकदमों में बदल जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट ऐसे मामलों में बाल सुरक्षा तथा किशोरों की वास्तविक सामाजिक परिस्थितियों के बीच संतुलन की आवश्यकता पर विचार करते रहे हैं।
विशेषज्ञ समिति को किशोरों की निजता, गरिमा, सुरक्षा, स्वास्थ्य और कानूनी अधिकारों से जुड़े मुद्दों का अध्ययन करने की जिम्मेदारी दी गई थी।
26 सदस्यीय राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति ने तैयार की रिपोर्ट
केंद्र सरकार ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव की अध्यक्षता में 26 सदस्यों की एक राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति गठित की थी।
समिति में कथित तौर पर निम्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ और प्रतिनिधि शामिल थे:
- टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज यानी TISS के विशेषज्ञ
- क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट
- केंद्रीय मंत्रालयों के प्रतिनिधि
- राज्य सरकारों के अधिकारी
- राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग यानी NCPCR के प्रतिनिधि
- कानूनी सेवा संस्थानों और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ
समिति ने सुझाव दिया कि किशोर शिक्षा को केवल एक जागरूकता अभियान तक सीमित रखने के बजाय स्कूलों के मुख्य पाठ्यक्रम का औपचारिक हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
शुरुआती कक्षाओं से पढ़ाया जा सकता है सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श
विशेषज्ञ समिति ने सुझाव दिया है कि बच्चों को उम्र के अनुसार जानकारी दी जाए। फाउंडेशनल और प्राथमिक स्तर पर किसी भी प्रकार की जटिल यौन जानकारी के बजाय सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े बुनियादी विषय पढ़ाए जा सकते हैं।
इनमें शामिल हो सकते हैं:
- शरीर के अंगों की सामान्य जानकारी
- व्यक्तिगत स्वच्छता
- शरीर की निजता
- सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श
- किसी असहज परिस्थिति में ‘नहीं’ कहना
- भरोसेमंद अभिभावक या शिक्षक को जानकारी देना
- गलत व्यवहार और यौन शोषण की पहचान
- ऑनलाइन सुरक्षा और अनुचित डिजिटल सामग्री से बचाव
उम्र बढ़ने के साथ किशोरों को यौवन, हार्मोनल बदलाव, मासिक धर्म, मानसिक स्वास्थ्य, सहमति, सम्मानजनक संबंध, लैंगिक संवेदनशीलता और प्रजनन स्वास्थ्य से संबंधित जानकारी दी जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले भी कहा था कि सेक्स एजुकेशन केवल कक्षा नौ से शुरू करने के बजाय बच्चों को अपेक्षाकृत कम उम्र से ही आयु-उपयुक्त तरीके से दी जानी चाहिए।
NCERT को सिलेबस तैयार करने की जिम्मेदारी देने की सिफारिश
रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि व्यापक सेक्स एजुकेशन का पाठ्यक्रम NCERT द्वारा तैयार किया जाए। पाठ्यक्रम को बच्चों की उम्र, मानसिक परिपक्वता, सुरक्षा और सांस्कृतिक संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर चरणबद्ध तरीके से विकसित किया जा सकता है।
समिति का मानना है कि वर्तमान किशोर शिक्षा कार्यक्रमों की समीक्षा और सुधार की आवश्यकता है। नया पाठ्यक्रम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के समग्र विकास, आलोचनात्मक सोच, स्वास्थ्य शिक्षा और जीवन कौशल से जुड़े उद्देश्यों के अनुरूप तैयार किया जा सकता है।
सप्ताह में दो बार विशेष कक्षाओं की सिफारिश
रिपोर्ट में प्राथमिक स्तर से ही इस विषय के लिए प्रशिक्षित या विशेषज्ञ शिक्षक नियुक्त करने का सुझाव दिया गया है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्तावित व्यवस्था में:
- सप्ताह में कम से कम दो कक्षाएं आयोजित की जा सकती हैं।
- प्रत्येक कक्षा लगभग 15 से 20 मिनट की हो सकती है।
- विषयों को बच्चों की उम्र और समझ के अनुसार पढ़ाया जाएगा।
- शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा।
- बच्चों की पहचान, सवालों और व्यक्तिगत जानकारी की गोपनीयता बनाए रखी जाएगी।
विशेषज्ञ समिति ने इन कक्षाओं को वैकल्पिक जागरूकता कार्यक्रम के बजाय व्यवस्थित और अनिवार्य शिक्षा का हिस्सा बनाने की सिफारिश की है।
माता-पिता और शिक्षकों के लिए भी होंगी बैठकें
समिति ने माना है कि व्यापक सेक्स एजुकेशन को प्रभावी बनाने के लिए केवल बच्चों को पढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। माता-पिता, अभिभावकों और शिक्षकों को भी इस प्रक्रिया में शामिल करना आवश्यक है।
इसके लिए स्कूलों में विशेष बैठकें, कार्यशालाएं और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने का सुझाव दिया गया है। इनमें अभिभावकों को बताया जा सकता है कि उम्र के अनुसार दी जाने वाली सेक्स एजुकेशन का उद्देश्य बच्चों को समय से पहले यौन गतिविधियों के लिए प्रेरित करना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित, जागरूक और जिम्मेदार बनाना है।
सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व निर्णय में भी वैज्ञानिक अध्ययनों का उल्लेख करते हुए कहा गया था कि व्यापक यौन शिक्षा से असुरक्षित व्यवहार बढ़ने का दावा सही नहीं है; ऐसी शिक्षा बच्चों और किशोरों को बेहतर एवं सुरक्षित निर्णय लेने में मदद कर सकती है।
पाठ्यक्रम में किन विषयों को शामिल किया जा सकता है?
उम्र और कक्षा के अनुसार प्रस्तावित पाठ्यक्रम में निम्न विषय शामिल किए जा सकते हैं:
- शरीर और स्वास्थ्य की बुनियादी जानकारी
- किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक बदलाव
- मासिक धर्म और व्यक्तिगत स्वच्छता
- मानसिक और भावनात्मक बदलाव
- सुरक्षित-असुरक्षित स्पर्श
- सहमति और व्यक्तिगत सीमाएं
- बाल यौन शोषण से सुरक्षा
- साइबर बुलिंग और ऑनलाइन उत्पीड़न
- लैंगिक समानता और सम्मान
- स्वस्थ एवं जिम्मेदार संबंध
- प्रजनन और यौन स्वास्थ्य
- जरूरत पड़ने पर सहायता प्राप्त करने के तरीके
बच्चों की सुरक्षा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है पहल?
विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों को शरीर, सुरक्षा और व्यक्तिगत सीमाओं की सही जानकारी नहीं मिलने से वे कई बार अनुचित व्यवहार को पहचान नहीं पाते। सामाजिक झिझक के कारण बच्चे अपनी समस्याएं माता-पिता या शिक्षकों के सामने बताने से भी डरते हैं।
व्यापक सेक्स एजुकेशन से बच्चों को सही और गलत व्यवहार में अंतर समझने, यौन शोषण की पहचान करने तथा किसी परेशानी की स्थिति में सहायता मांगने का आत्मविश्वास मिल सकता है।
इसके साथ ही किशोरों को इंटरनेट या सोशल मीडिया से मिलने वाली गलत और भ्रामक जानकारी के बजाय वैज्ञानिक, प्रमाणित और उम्र के अनुकूल जानकारी उपलब्ध हो सकेगी।
अभी अंतिम फैसला बाकी
केंद्र सरकार द्वारा विशेषज्ञ समिति की सिफारिशें स्वीकार करना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी स्कूलों में तत्काल सेक्स एजुकेशन शुरू हो गई है।
सुप्रीम कोर्ट रिपोर्ट पर विचार करने और उचित आदेश पारित करने के लिए सहमत हुआ है। अदालत के निर्देशों के बाद ही पाठ्यक्रम का प्रारूप, कक्षाओं की शुरुआत, शिक्षक प्रशिक्षण और देशभर में इसके क्रियान्वयन की विस्तृत व्यवस्था स्पष्ट होगी।
फिलहाल प्रस्ताव अदालत की मंजूरी और आगे की सरकारी अधिसूचना के अधीन है।
निष्कर्ष
भारत में कॉम्प्रिहेंसिव सेक्स एजुकेशन को औपचारिक पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने का प्रस्ताव बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और समग्र विकास की दिशा में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।
प्रस्तावित व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य बच्चों को उम्र के अनुकूल वैज्ञानिक जानकारी देना, उन्हें यौन शोषण से बचाना, किशोरावस्था के बदलावों को समझने में सहायता करना और सहमति, निजता तथा जिम्मेदार व्यवहार के प्रति जागरूक बनाना है।
अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्देश और उसके बाद केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा तैयार की जाने वाली कार्ययोजना पर नजर रहेगी।
हमारी यूट्यूब चैनल को लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करे
Like, Share and Subscribe our YouTube channel