दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ को OTT प्लेटफॉर्म ZEE5 पर रिलीज किए जाने और महज दो दिन बाद भारत में हटा दिए जाने के बाद पंजाब में आतंकवाद और उग्रवाद के सबसे भयावह दौर को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। फिल्म 3 जुलाई 2026 को ZEE5 पर रिलीज हुई थी और 5 जुलाई को इसे भारत में अगले आदेश तक अनुपलब्ध कर दिया गया। प्लेटफॉर्म ने कहा कि वह फिल्म को दोबारा उपलब्ध कराने के लिए कानूनी विकल्प तलाश रहा है।
इस विवाद के बीच पंजाब के गाँवों, गुरुद्वारों और सामुदायिक स्थलों पर फिल्म के अनौपचारिक प्रदर्शन किए जाने की खबरें सामने आई हैं। इन प्रदर्शनों के माध्यम से फिल्म को पंजाब में कथित पुलिस ज्यादतियों, लोगों के लापता होने और अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार से जुड़ी दबाई गई कहानी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
हालांकि, इस पूरे विमर्श का दूसरा पक्ष यह सवाल उठा रहा है कि क्या फिल्म पंजाब आतंकवाद के दौर की पूरी तस्वीर सामने रखती है या केवल राज्य की कार्रवाई और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों पर केंद्रित एक अधूरा ऐतिहासिक नैरेटिव प्रस्तुत करती है।
पहले ‘घल्लूघारा’, फिर ‘पंजाब 95’ और अब ‘सतलुज’
फिल्म का शुरुआती शीर्षक कथित तौर पर ‘घल्लूघारा’ था। बाद में इसे ‘पंजाब 95’ नाम दिया गया और OTT रिलीज से ठीक पहले इसका नाम बदलकर ‘सतलुज’ कर दिया गया। फिल्म के अभिनेता दिलजीत दोसांझ ने दावा किया था कि नाम बदलने के बावजूद फिल्म को बिना किसी कट के रिलीज किया गया।
फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है। खालड़ा ने पंजाब में उग्रवाद विरोधी अभियानों के दौरान कथित फर्जी मुठभेड़ों, हिरासत में मौतों, लोगों के गायब होने और अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार से जुड़े मामलों की जाँच की थी।
वर्ष 1995 में खालड़ा का अपहरण कर उनकी हत्या कर दी गई थी। इस मामले में पंजाब पुलिस के कई अधिकारियों को दोषी ठहराया गया और उम्रकैद की सजा सुनाई गई। फिल्म इसी घटनाक्रम तथा खालड़ा की जाँच को अपनी कहानी का केंद्रीय आधार बनाती है।
सामुदायिक प्रदर्शनों से दोबारा जीवित हुआ दर्द
भारत में फिल्म हटाए जाने के बाद कई सिख संगठनों, स्थानीय कार्यकर्ताओं और समुदायों ने गाँवों तथा गुरुद्वारों में इसके प्रदर्शन आयोजित किए। एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, इन प्रदर्शनों के दौरान उस दौर को प्रत्यक्ष रूप से देखने वाले कई बुजुर्ग भावुक हो गए, जबकि युवा पीढ़ी ने पहली बार पंजाब के उस हिंसक इतिहास को विस्तार से समझने की कोशिश की।
इन प्रदर्शनों के समर्थकों का कहना है कि फिल्म उन परिवारों की पीड़ा को सामने लाती है, जिनके सदस्य पुलिस हिरासत या आतंकवाद विरोधी कार्रवाइयों के दौरान लापता हो गए थे। उनका तर्क है कि अवैध हत्याओं और गुप्त अंतिम संस्कारों से जुड़े प्रमाणों तथा पीड़ित परिवारों की आवाज को दबाया नहीं जाना चाहिए।
जसवंत सिंह खालड़ा का अपहरण और हत्या निस्संदेह एक गंभीर अपराध था। इस मामले में हुई दोषसिद्धि यह स्पष्ट करती है कि राज्य की शक्ति के दुरुपयोग या मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
फिल्म की कहानी क्या छोड़ देती है?
फिल्म की आलोचना करने वाले पक्ष का कहना है कि ‘सतलुज’ पंजाब आतंकवाद की कहानी को लगभग पूरी तरह पुलिस कार्रवाई, कथित फर्जी मुठभेड़ों और राज्य की बर्बरता के दृष्टिकोण से दिखाती है।
आलोचकों के अनुसार, फिल्म में खालिस्तानी आतंकवाद और उसके कारण आम नागरिकों, पुलिसकर्मियों, पत्रकारों तथा राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं को झेलनी पड़ी हिंसा को पर्याप्त स्थान नहीं मिला। इससे दर्शकों के सामने यह धारणा बनने का खतरा रहता है कि पूरा संघर्ष केवल राज्य और एक प्रतिरोध आंदोलन के बीच था।
लेकिन पंजाब में 1980 और 1990 के दशक का वास्तविक इतिहास कहीं अधिक जटिल और रक्तरंजित था।
यह वही दौर था जब आतंकवादी बसों और ट्रेनों को रोककर यात्रियों की धार्मिक पहचान पूछते थे। अनेक निर्दोष लोगों को केवल हिंदू होने के कारण निशाना बनाया गया। शांति और सामाजिक सौहार्द की बात करने वाले सिख नेताओं की भी हत्या की गई।
आतंकवादियों की विचारधारा या भाषा का समर्थन करने से इनकार करने वाले पत्रकारों, संपादकों और बुद्धिजीवियों को धमकियाँ दी गईं तथा कई लोगों की हत्या कर दी गई। पुलिस अधिकारियों और उनके परिवारों पर हमले हुए। सरकारी परिसरों में बम विस्फोट किए गए और सड़कों पर घात लगाकर पुलिसकर्मियों को निशाना बनाया गया।
आतंकवाद के पीड़ितों की कहानी क्यों गायब है?
पंजाब आतंकवाद के दौरान मारे गए आम हिंदुओं, सिखों, पुलिसकर्मियों, पत्रकारों और शांति समर्थक नेताओं की कहानियाँ आज सार्वजनिक विमर्श में लगातार कमजोर पड़ती दिखाई देती हैं।
इन पीड़ितों को केंद्र में रखकर बहुत कम फिल्में बनती हैं। उनके परिवारों के लिए बड़े स्तर पर सामुदायिक प्रदर्शन या सार्वजनिक संवाद आयोजित नहीं होते। उनकी व्यक्तिगत कहानियाँ अक्सर पुराने अखबारों, सरकारी रिकॉर्ड और मृतकों की संख्या तक सीमित होकर रह जाती हैं।
यही कारण है कि ‘सतलुज’ जैसी फिल्म पर बहस केवल सेंसरशिप या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह सवाल भी पूछा जाना जरूरी है कि जब किसी ऐतिहासिक संघर्ष को सिनेमा में प्रस्तुत किया जाता है, तो क्या सभी प्रकार के पीड़ितों और हिंसा के सभी जिम्मेदार पक्षों को समान गंभीरता से दिखाया गया है?
दो तरह के नैरेटिव के बीच फँसा पंजाब का इतिहास
‘सतलुज’ विवाद के बाद मुख्य रूप से दो तरह के नैरेटिव सामने आ रहे हैं।
पहला नैरेटिव मानवाधिकार उल्लंघनों, कथित फर्जी मुठभेड़ों, गुमशुदगियों और पुलिस की जवाबदेही पर केंद्रित है। दूसरा नैरेटिव इस बात पर जोर देता है कि खालिस्तानी आतंकवाद के कारण मारे गए हजारों निर्दोष नागरिकों, पुलिसकर्मियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की पीड़ा को भी इतिहास से गायब नहीं किया जा सकता।
समस्या तब उत्पन्न होती है, जब किसी एक पक्ष की पीड़ा को स्वीकार करने के लिए दूसरे पक्ष के पीड़ितों को भुला दिया जाता है। पुलिस या सरकारी तंत्र की गैरकानूनी कार्रवाई का सच सामने आना चाहिए, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि खालिस्तानी आतंकवाद को केवल एक राजनीतिक प्रतिरोध आंदोलन के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाए।
इसी तरह आतंकवाद की भयावहता को स्वीकार करने का अर्थ भी यह नहीं है कि हिरासत में हत्या, फर्जी मुठभेड़ या न्यायेतर कार्रवाई को उचित ठहरा दिया जाए।
पूरा इतिहास सामने लाना जरूरी
पंजाब के हिंसक दौर की ईमानदार व्याख्या के लिए दोनों प्रकार के पीड़ितों की बात करना आवश्यक है। इसमें आतंकवादी हिंसा में मारे गए हिंदू और सिख नागरिक, पुलिसकर्मी, पत्रकार और राजनीतिक कार्यकर्ता भी शामिल हैं। साथ ही उन परिवारों की पीड़ा को भी दर्ज किया जाना चाहिए, जिनके सदस्य कथित गैरकानूनी पुलिस कार्रवाइयों में मारे गए या लापता हुए।
इतिहास का उद्देश्य किसी एक राजनीतिक या अलगाववादी एजेंडे को मजबूत करना नहीं, बल्कि घटनाओं को उनके पूरे संदर्भ में सामने रखना होना चाहिए।
‘सतलुज’ ने पंजाब के इतिहास के एक दर्दनाक हिस्से को दोबारा चर्चा में जरूर ला दिया है। अब जरूरत इस बात की है कि यह चर्चा केवल एक फिल्म या एक नैरेटिव तक सीमित न रहे। पंजाब के आतंकवाद की पूरी कहानी तभी सामने आएगी, जब राज्य की ज्यादतियों के साथ-साथ आतंकवादियों द्वारा निर्दोष नागरिकों पर किए गए अत्याचारों को भी समान स्पष्टता और संवेदनशीलता से दर्ज किया जाएगा।
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