आगरा के ताजमहल को भगवान शिव का प्राचीन मंदिर ‘तेजोमहालय’ बताए जाने से जुड़ी दशकों पुरानी बहस अब एक नई कानूनी प्रक्रिया के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुँची है। हाई कोर्ट ने ताजमहल के निरीक्षण, फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने की मांग से जुड़ी याचिका पर केंद्र सरकार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI और अन्य प्रतिवादियों से जवाब माँगा है।
जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की पीठ ने याचिका पर नोटिस जारी करते हुए प्रतिवादियों को अगली सुनवाई से पहले अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने की अनुमति दी है। कोर्ट ने नोटिस की तामील के लिए 10 दिन के भीतर आवश्यक कदम उठाने का भी निर्देश दिया है।
हाई कोर्ट ने केंद्र और ASI से मांगा जवाब
यह मामला आगरा की निचली अदालतों के उन आदेशों के खिलाफ दाखिल किया गया है, जिनमें ताजमहल परिसर के निरीक्षण के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने की मांग स्वीकार नहीं की गई थी।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अब केंद्र सरकार और ASI से कहा है कि वे याचिका में उठाए गए मुद्दों पर अपना पक्ष रखें। कोर्ट ने एक अन्य प्रतिवादी पंकज कुमार वर्मा को भी नोटिस जारी किया है।
इस स्तर पर अदालत ने केवल सभी संबंधित पक्षों को सुनने की प्रक्रिया शुरू की है। न तो सर्वे की अनुमति दी गई है और न ही याचिकाकर्ताओं के ऐतिहासिक दावों पर कोई न्यायिक निष्कर्ष दिया गया है।
याचिकाकर्ता क्या मांग रहे हैं?
याचिका में मांग की गई है कि एक एडवोकेट कमिश्नर यानी कोर्ट द्वारा नियुक्त आयुक्त को ताजमहल परिसर का स्थानीय निरीक्षण करने के लिए नियुक्त किया जाए।
याचिकाकर्ता चाहते हैं कि संबंधित हिस्सों की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी कराई जाए, ताकि वे उन वास्तुशिल्प विशेषताओं और धार्मिक प्रतीकों को अदालत के रिकॉर्ड पर ला सकें, जिन्हें वे अपने दावे के समर्थन में महत्वपूर्ण बताते हैं।
एक अंतरिम आवेदन में ASI के निदेशक को ताजमहल के अंदर और बाहर की तस्वीरें लेने तथा उन्हें न्यायिक रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश देने की मांग भी की गई है।
याचिकाकर्ताओं का दावा- ताजमहल पहले ‘तेजोमहालय’ था
मूल सिविल मुकदमे में याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि वर्तमान ताजमहल परिसर मूल रूप से भगवान शिव को समर्पित एक प्राचीन मंदिर था, जिसे वे ‘तेजोमहालय’ कहते हैं।
याचिका Lord Sri Agreshwar Mahadev Nagnatheswar Virajman and others v. Union of India and others शीर्षक से दायर की गई है। देवता की ओर से ‘नेक्स्ट फ्रेंड’ के रूप में अधिवक्ता हरि शंकर जैन और अन्य श्रद्धालु इस कानूनी कार्रवाई से जुड़े हैं।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये याचिकाकर्ताओं के दावे हैं, जिन पर अदालत ने अभी कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है।
‘बिना भौतिक निरीक्षण के कैसे सामने आएंगे सबूत?’
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि ताजमहल की भौतिक संरचना, कथित धार्मिक प्रतीकों और कुछ सीमित पहुंच वाले हिस्सों से जुड़े दावों को केवल मौखिक गवाही से साबित नहीं किया जा सकता।
उनका तर्क है कि ताजमहल ASI के नियंत्रण में संरक्षित परिसर है, इसलिए वे स्वतंत्र रूप से उन हिस्सों तक पहुँचकर तस्वीरें या अन्य सामग्री एकत्र नहीं कर सकते। इसी आधार पर कोर्ट की निगरानी में निरीक्षण की मांग की गई है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष ने व्यापक भौतिक और वैज्ञानिक परीक्षण की आवश्यकता का भी तर्क रखा।
एडवोकेट कमिश्नर क्या होता है?
सिविल मामलों में अदालत कुछ परिस्थितियों में स्थानीय जांच के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त कर सकती है। याचिकाकर्ताओं ने सिविल प्रक्रिया संहिता यानी CPC के Order XXVI Rule 9 का सहारा लिया है।
उनका कहना है कि विवाद से जुड़े भौतिक तथ्यों को स्पष्ट करने के लिए स्थानीय निरीक्षण आवश्यक है। याचिकाकर्ताओं ने इस संदर्भ में अयोध्या भूमि विवाद से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले में स्थानीय जांच संबंधी न्यायिक शक्तियों का भी उल्लेख किया है।
हालांकि एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करना या न करना अदालत का न्यायिक निर्णय है और हाई कोर्ट ने वर्तमान स्तर पर ऐसी नियुक्ति का आदेश नहीं दिया है।
2015 में आगरा कोर्ट से शुरू हुई कानूनी लड़ाई
इस विवाद की मौजूदा कानूनी प्रक्रिया वर्ष 2015 में आगरा की सिविल अदालत में दायर एक मुकदमे से जुड़ी है।
मूल वाद में याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि ‘अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर विराजमान तेजोमहालय’ ताजमहल परिसर में मौजूद है। इसके साथ कथित मंदिर की घोषणा और पूजा-अर्चना से जुड़े अधिकारों की मांग भी की गई थी।
मुकदमा अभी सिविल जज (सीनियर डिवीजन), आगरा की अदालत से जुड़ी प्रक्रिया का हिस्सा है।
2017 में दाखिल हुई थी निरीक्षण की अर्जी
लंबित मुकदमे के दौरान वर्ष 2017 में याचिकाकर्ताओं ने ताजमहल का निरीक्षण कराने के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने की अर्जी दाखिल की।
इस आवेदन का उद्देश्य परिसर का निरीक्षण तथा कथित वास्तुशिल्प और धार्मिक संकेतों का दस्तावेजीकरण कराना था।
18 जुलाई 2019 को निचली अदालत ने खारिज की अर्जी
आगरा के अतिरिक्त सिविल जज (सीनियर डिवीजन) ने 18 जुलाई 2019 को एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने की अर्जी खारिज कर दी थी।
रिपोर्टों के अनुसार, निचली अदालत ने राजस्व रिकॉर्ड और संपत्ति की पहचान से जुड़े मुद्दों का उल्लेख किया। अदालत ने कहा था कि याचिकाकर्ताओं ने कथित संपत्ति का सही गाटा नंबर स्पष्ट करने के लिए खसरा-खतौनी जैसे दस्तावेज दाखिल नहीं किए और क्षेत्रफल तथा सीमाओं के विवरण में भी अंतर था।
4 अप्रैल 2026 को जिला अदालत से भी नहीं मिली राहत
निचली अदालत के आदेश को याचिकाकर्ताओं ने आगरा की जिला अदालत में चुनौती दी।
4 अप्रैल 2026 को अतिरिक्त जिला जज ने पुनरीक्षण याचिका को कानूनन विचारणीय नहीं मानते हुए खारिज कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया।
अनुच्छेद 227 के तहत हाई कोर्ट पहुँचा मामला
याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत इलाहाबाद हाई कोर्ट में निचली अदालतों के आदेशों को चुनौती दी है।
अनुच्छेद 227 हाई कोर्ट को अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाली अधीनस्थ अदालतों और न्यायाधिकरणों पर पर्यवेक्षण की शक्ति देता है। वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता चाहते हैं कि हाई कोर्ट निचली अदालतों द्वारा एडवोकेट कमिश्नर की अर्जी पर दिए गए आदेशों की समीक्षा करे।
इसका अर्थ यह नहीं है कि हाई कोर्ट ने स्वयं “ऐतिहासिक जांच” शुरू कर दी है। वर्तमान न्यायिक सवाल मुख्य रूप से यह है कि निचली अदालतों ने निरीक्षण संबंधी अर्जी को कानून के अनुसार सही तरीके से निपटाया या नहीं।
याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलील क्या है?
याचिकाकर्ता पक्ष का कहना है कि निचली अदालतों ने यह तय करने पर पर्याप्त विचार नहीं किया कि विवाद को समझने के लिए स्थानीय निरीक्षण जरूरी है या नहीं।
उनका आरोप है कि अर्जी को उन आधारों पर खारिज किया गया, जो उनके अनुसार एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने के मूल सवाल से सीधे जुड़े नहीं थे।
याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट से निचली अदालतों के आदेश रद्द करने और एडवोकेट कमिश्नर से जुड़ी अर्जी पर नए सिरे से गुण-दोष के आधार पर फैसला कराने की मांग की है।
10 दिन के भीतर नोटिस की तामील का आदेश
हाई कोर्ट ने सभी प्रतिवादियों को नोटिस जारी करते हुए निर्देश दिया कि नोटिस की तामील के लिए 10 दिनों के भीतर आवश्यक कदम उठाए जाएँ।
केंद्र सरकार और ASI समेत प्रतिवादियों को अगली सुनवाई से पहले जवाबी हलफनामा दाखिल करने की अनुमति दी गई है।
अब केंद्र और ASI के जवाब के बाद याचिकाकर्ता पक्ष को भी अपना प्रत्युत्तर रखने का अवसर मिल सकता है।
सरकार और ASI की ओर से कौन पेश हुआ?
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तथा अधिवक्ता मनोज कुमार सिंह की मौजूदगी बताई गई है।
याचिकाकर्ता पक्ष की पैरवी से हरि शंकर जैन, विष्णु शंकर जैन और अधिवक्ता सौम्या श्रीवास्तव जुड़े हैं।
हाई कोर्ट के नोटिस का मतलब क्या है?
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नोटिस जारी होना किसी दावे की सत्यता की न्यायिक पुष्टि नहीं है।
नोटिस का अर्थ है कि अदालत संबंधित पक्षों का जवाब सुनना चाहती है। केंद्र और ASI अपना पक्ष रखेंगे, जिसके बाद कोर्ट तय करेगा कि याचिका में मांगी गई राहत पर आगे क्या आदेश दिया जाना चाहिए।
हाई कोर्ट ने अभी मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।
क्या अब ताजमहल का सर्वे होगा?
अभी इसका उत्तर नहीं है।
फिलहाल केवल नोटिस जारी हुआ है। कोर्ट ने एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त नहीं किया, ताजमहल की वीडियोग्राफी या वैज्ञानिक सर्वे का आदेश नहीं दिया और ‘तेजोमहालय’ दावे पर कोई निष्कर्ष नहीं सुनाया।
अगला महत्वपूर्ण चरण केंद्र सरकार, ASI और अन्य प्रतिवादियों के जवाब होंगे। उनके जवाबों और आगे की सुनवाई के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि हाई कोर्ट निचली अदालतों के आदेशों में हस्तक्षेप करेगा या नहीं।
अब आगे क्या होगा?
केंद्र और ASI को जवाबी हलफनामा दाखिल करना होगा। इसके बाद अदालत दोनों पक्षों की दलीलें सुनेगी।
हाई कोर्ट के सामने प्रमुख सवालों में यह शामिल हो सकता है कि क्या निचली अदालतों ने एडवोकेट कमिश्नर की अर्जी को उचित कानूनी आधार पर खारिज किया और क्या लंबित सिविल विवाद के निर्णय के लिए किसी स्थानीय निरीक्षण की वास्तव में आवश्यकता है।
फिलहाल कानूनी लड़ाई एक नए चरण में प्रवेश कर चुकी है, लेकिन ताजमहल के ऐतिहासिक स्वरूप से जुड़ा कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी बहुत दूर है।
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