भारत में विदेशी चंदे के नियमन से जुड़े कानून में प्रस्तावित बदलावों को लेकर राजनीतिक और सामाजिक विवाद तेज हो गया है। केंद्र सरकार का Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 विदेशी फंड से बनी संपत्तियों की निगरानी, प्रबंधन और निपटारे के लिए नया कानूनी ढांचा तैयार करने का प्रस्ताव करता है।
यह विधेयक 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था। विपक्ष और सिविल सोसाइटी संगठनों की आपत्तियों के बीच इसे उस समय पारित नहीं कराया जा सका। अब मानसून सत्र के दौरान इसे लोकसभा में विचार और पारित करने के लिए सूचीबद्ध किया गया है। फिलहाल विधेयक संसद से पारित होकर कानून नहीं बना है।
क्या है FCRA और क्यों लाया गया संशोधन?
Foreign Contribution Regulation Act, 2010 यानी FCRA भारत में व्यक्तियों, संस्थाओं, कंपनियों और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा विदेशी चंदा स्वीकार करने तथा उसका उपयोग करने की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है।
विदेशी योगदान प्राप्त करने के लिए किसी संस्था को केंद्र सरकार से FCRA पंजीकरण प्रमाणपत्र या किसी विशेष उद्देश्य के लिए पूर्व अनुमति लेनी होती है। वर्तमान व्यवस्था में पंजीकरण प्रमाणपत्र की वैधता पांच वर्ष होती है और उसे समय-समय पर नवीनीकृत कराना पड़ता है।
सरकार का कहना है कि विदेशी धन का उपयोग पारदर्शी, उत्तरदायी और राष्ट्रीय हित के अनुरूप होना चाहिए। गृह मंत्रालय के अनुसार, विदेशी फंडिंग पर नियमन केवल भारत तक सीमित नहीं है और अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया तथा कनाडा जैसे देशों में भी विदेशी प्रभाव एवं फंडिंग की निगरानी के लिए कानूनी व्यवस्थाएं मौजूद हैं।
विदेशी फंड से बनी संपत्तियों के लिए बनेगी Designated Authority
प्रस्तावित संशोधन की सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था एक Designated Authority गठित करने से संबंधित है। यह प्राधिकरण उन संस्थाओं के विदेशी चंदे और उससे पूर्ण या आंशिक रूप से बनाई गई संपत्तियों की निगरानी, प्रबंधन और निपटारा कर सकेगा, जिनका FCRA प्रमाणपत्र समाप्त हो गया हो।
किसी संस्था का पंजीकरण सरकार द्वारा रद्द किए जाने, संस्था द्वारा स्वयं प्रमाणपत्र वापस करने, समय पर नवीनीकरण आवेदन नहीं करने या नवीनीकरण आवेदन खारिज होने की स्थिति में समाप्त माना जा सकता है।
ऐसी स्थिति में संस्था की विदेशी निधि और उससे निर्मित संपत्तियां पहले अस्थायी रूप से Designated Authority के नियंत्रण में जा सकती हैं। पंजीकरण बहाल या नवीनीकृत होने पर अप्रयुक्त विदेशी चंदा और संपत्ति संस्था को लौटाई जा सकेगी। प्रमाणपत्र बहाल नहीं होने पर संपत्ति स्थायी रूप से प्राधिकरण के पास जा सकती है।
क्या सरकार NGO की संपत्ति अपने कब्जे में ले सकेगी?
विधेयक में विदेशी योगदान से बनाई गई संपत्तियों को सरकारी प्राधिकरण के अधीन रखने का प्रावधान है, लेकिन इसे प्रत्येक NGO की सभी संपत्तियों को तत्काल जब्त करने का सामान्य अधिकार कहना पूरी तरह सही नहीं होगा।
यह व्यवस्था मुख्य रूप से उन्हीं संपत्तियों पर लागू होगी, जो विदेशी योगदान से पूर्ण या आंशिक रूप से बनाई गई हों और संबंधित संस्था का FCRA पंजीकरण कानूनी रूप से समाप्त हो चुका हो।
स्थायी रूप से प्राधिकरण में निहित संपत्ति को सार्वजनिक उद्देश्य के लिए केंद्र या राज्य सरकार के किसी मंत्रालय, विभाग, एजेंसी या प्राधिकरण को हस्तांतरित किया जा सकता है। उसे बेचने या अन्य निर्धारित प्रक्रिया से निपटाने का प्रावधान भी प्रस्तावित है। बिक्री से प्राप्त राशि और शेष विदेशी योगदान भारत की संचित निधि में जमा किया जा सकता है।
धार्मिक स्थल के स्वरूप को सुरक्षित रखने का प्रावधान
विधेयक में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि प्राधिकरण में निहित संपत्ति पूर्ण या आंशिक रूप से कोई धार्मिक स्थल है, तो उसका धार्मिक स्वरूप बरकरार रखना होगा।
Designated Authority ऐसे धार्मिक स्थल का प्रबंधन निर्धारित व्यक्ति या संस्था को सौंप सकेगी, लेकिन यह सुनिश्चित करना होगा कि संपत्ति के धार्मिक चरित्र में परिवर्तन न हो।
ईसाई संगठनों ने क्यों जताई चिंता?
अमेरिका स्थित इंटरनेशनल क्रिश्चियन कंसर्न सहित कुछ अंतरराष्ट्रीय ईसाई संगठनों ने प्रस्तावित बदलावों को लेकर चिंता जताई है। उनका आरोप है कि नए प्रावधानों से ईसाई संस्थाओं, स्कूलों, अस्पतालों और चैरिटेबल संगठनों के लिए FCRA पंजीकरण बनाए रखना कठिन हो सकता है।
इन संगठनों का कहना है कि विदेशी चंदे से वर्षों के दौरान निर्मित अस्पताल, स्कूल, चर्च और सेवा केंद्र पंजीकरण समाप्त होने पर सरकारी प्राधिकरण के नियंत्रण में जा सकते हैं। उनका दावा है कि इससे विदेशी फंडिंग पर निर्भर संस्थाओं की स्वतंत्र रूप से काम करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
ICC ने यह आरोप भी लगाया है कि धर्मांतरण संबंधी शिकायतों के नाम पर ईसाई संस्थाओं के वैध सामाजिक और मानव सेवा कार्यों को निशाना बनाया जा सकता है। ये ICC के आरोप हैं; भारत सरकार ने कहा है कि FCRA किसी विशेष धर्म या समुदाय को निशाना नहीं बनाता और धार्मिक संस्थाओं की वैध कल्याणकारी गतिविधियां विदेशी सहायता प्राप्त करने की पात्र बनी रहेंगी।
सरकार ने धार्मिक भेदभाव के आरोपों को किया खारिज
केंद्र सरकार ने उन आरोपों को खारिज किया है कि प्रस्तावित कानून ईसाई या किसी अन्य धार्मिक समुदाय के विरुद्ध लाया गया है।
सरकार के अनुसार, FCRA का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशों से आने वाला धन पंजीकृत, घोषित और जवाबदेह माध्यमों से भारत में पहुंचे। सरकार का तर्क है कि अनियंत्रित विदेशी धन लोकतांत्रिक संस्थाओं, चुनावी प्रक्रियाओं, सार्वजनिक विमर्श और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।
गृह मंत्रालय ने यह भी कहा है कि केवल पंजीकरण कानूनी रूप से समाप्त होने के बाद ही विदेशी योगदान से निर्मित संपत्तियों के प्रबंधन की व्यवस्था लागू होगी।
नवीनीकरण नहीं कराने पर भी संपत्ति पर असर
प्रस्तावित कानून में केवल पंजीकरण रद्द होने की स्थिति ही शामिल नहीं है। यदि संस्था समय पर अपने FCRA प्रमाणपत्र के नवीनीकरण के लिए आवेदन नहीं करती या उसका नवीनीकरण आवेदन अस्वीकार हो जाता है, तो उसका प्रमाणपत्र समाप्त माना जा सकता है।
इसके बाद विदेशी योगदान और उससे बनाई गई संपत्तियां Designated Authority के अधीन जा सकती हैं। PRS Legislative Research ने इसे महत्वपूर्ण चिंता बताते हुए कहा है कि इससे कोई संस्था FCRA व्यवस्था से बाहर निकलने पर अपनी विदेशी धन से निर्मित संपत्ति खो सकती है।
सुनवाई और अपील की व्यवस्था पर सवाल
PRS के विश्लेषण के अनुसार, कानून और प्रस्तावित विधेयक में FCRA प्रमाणपत्र के नवीनीकरण से इनकार किए जाने के विरुद्ध स्पष्ट अपील व्यवस्था उपलब्ध नहीं है।
संगठन को नवीनीकरण से इनकार किए जाने से पहले अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं मिलने की आशंका भी व्यक्त की गई है। आलोचकों का कहना है कि यदि इसके साथ संपत्ति के प्राधिकरण में निहित होने का प्रावधान जोड़ा जाता है, तो संस्थाओं को गंभीर प्रशासनिक और वित्तीय नुकसान हो सकता है।
संस्था के प्रमुख पदाधिकारियों की जिम्मेदारी बढ़ेगी
विधेयक में संस्था के प्रमुख पदाधिकारियों यानी Key Functionaries की परिभाषा विस्तृत की गई है। इसमें कंपनी के निदेशक, फर्म के साझेदार, ट्रस्ट के ट्रस्टी, संस्था के पदाधिकारी और प्रबंधन से जुड़े अन्य जिम्मेदार व्यक्ति शामिल हो सकते हैं।
किसी संस्था द्वारा FCRA अपराध किए जाने पर संबंधित प्रमुख पदाधिकारी को जिम्मेदार माना जा सकता है। हालांकि वह यह साबित कर सकता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना हुआ या उसने इसे रोकने के लिए पूरी सावधानी बरती थी।
यदि कोई संस्था बंद या निष्क्रिय हो जाती है, तो उसके अंतिम पदाधिकारियों को केंद्र सरकार को सूचना देनी होगी। ऐसा नहीं करने पर संस्था का विदेशी चंदा स्थायी रूप से Designated Authority में निहित हो सकता है।
सजा घटाने का भी प्रस्ताव
विधेयक केवल नियम कड़े करने तक सीमित नहीं है। इसमें FCRA के कुछ उल्लंघनों के लिए अधिकतम कारावास की अवधि पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष करने का प्रस्ताव भी है।
इसलिए प्रस्तावित संशोधन में एक ओर संपत्तियों की निगरानी और प्रबंधन से जुड़े अधिकार बढ़ाने की व्यवस्था है, वहीं दूसरी ओर कुछ अपराधों के लिए जेल की अधिकतम अवधि कम करने का भी प्रावधान है।
कितनी संस्थाएं FCRA के तहत पंजीकृत?
PRS के अनुसार, गृह मंत्रालय के आंकड़ों में वर्ष 2019 से 2022 के दौरान 13,520 संगठनों ने कुल ₹55,741 करोड़ का विदेशी योगदान प्राप्त किया था।
PRS द्वारा उद्धृत FCRA पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 के मध्य तक हजारों प्रमाणपत्र सक्रिय थे, जबकि बड़ी संख्या में पंजीकरण रद्द या समाप्त श्रेणी में दर्ज थे। सरकार का कहना है कि हजारों वैध संस्थाएं अभी भी FCRA के तहत विदेशी धन प्राप्त कर सामाजिक और कल्याणकारी गतिविधियां संचालित कर रही हैं।
FCRA विधेयक की मौजूदा स्थिति
FCRA संशोधन विधेयक 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था और 3 अगस्त 2026 तक लोकसभा में लंबित है। इसे मानसून सत्र में विचार और पारित करने के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
लोकसभा से पारित होने के बाद इसे राज्यसभा की मंजूरी और फिर राष्ट्रपति की स्वीकृति की आवश्यकता होगी। जब तक यह पूरी संसदीय प्रक्रिया पूरी नहीं करता, प्रस्तावित प्रावधान मौजूदा कानून का हिस्सा नहीं माने जाएंगे।
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