अयोध्या भूमि विवाद पर नवंबर 2019 में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को मस्जिद निर्माण के लिए अयोध्या जिले के धन्नीपुर में पाँच एकड़ जमीन आवंटित की थी। बाद में इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन का गठन किया गया। धन्नीपुर की यह जमीन राम मंदिर परिसर से लगभग 25 किलोमीटर दूर बताई जाती है। शुरुआत में इस स्थान को केवल एक मस्जिद तक सीमित नहीं रखने, बल्कि एक बड़े सामाजिक और सांस्कृतिक परिसर के रूप में विकसित करने की योजना सामने रखी गई थी।
प्रारंभिक योजना के तहत मस्जिद के अलावा 300 बिस्तरों वाला मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल और पुस्तकालय बनाने की बात कही गई थी। अलग-अलग चरणों में कम्युनिटी किचन, संग्रहालय और सांस्कृतिक सुविधाओं का विचार भी परियोजना से जोड़ा गया। लेकिन छह साल से अधिक समय बीतने के बावजूद निर्माण शुरू नहीं हो सका और अब ट्रस्ट ने स्वीकार किया है कि धन की कमी के कारण मूल महत्वाकांक्षी योजना को छोड़कर काफी छोटे स्तर पर आगे बढ़ना पड़ेगा।
चंदे का संकट: जरूरत ₹3 से ₹5 करोड़, जुटे केवल ₹1.5 करोड़
इस परियोजना के सामने सबसे बड़ी समस्या फंडिंग की है। IICF के सचिव अतहर हुसैन के अनुसार, अब एक छोटी मस्जिद बनाने की योजना तैयार की जा रही है। इसके लिए भी लगभग ₹3 करोड़ से ₹5 करोड़ की आवश्यकता होगी, जबकि फाउंडेशन अब तक केवल करीब ₹1.5 करोड़ का चंदा ही जुटा पाया है। यानी संशोधित और छोटे प्रोजेक्ट के लिए जरूरी न्यूनतम रकम का भी केवल आधा हिस्सा उपलब्ध है।
IICF के अध्यक्ष जुफर अहमद फारूकी ने भी धन की कमी के पीछे परियोजना के प्रति समुदाय की सीमित दिलचस्पी का जिक्र किया है। उनका कहना है कि अपेक्षित मात्रा में सहयोग और चंदा नहीं मिला, इसलिए अब मूल योजना के मुकाबले काफी छोटी मस्जिद बनाने का निर्णय लिया गया है। यह पहली बार है जब परियोजना से जुड़े शीर्ष पदाधिकारियों ने इतने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया है कि धन की कमी के साथ-साथ अपेक्षित सामुदायिक समर्थन का अभाव भी निर्माण में बड़ी बाधा बना है।
300 बेड के अस्पताल का सपना पहले ही पड़ गया था कमजोर
धन्नीपुर परियोजना में धन का संकट अचानक पैदा नहीं हुआ है। जुलाई 2023 में ही फंड की कमी के कारण प्रस्तावित अस्पताल के निर्माण को टालने की खबर सामने आ गई थी। उस समय भी ट्रस्ट द्वारा मस्जिद, चैरिटी अस्पताल और कम्युनिटी किचन जैसे बड़े प्रोजेक्ट की बात की जा रही थी, लेकिन वित्तीय संसाधनों की कमी ने अस्पताल की योजना को प्रभावित कर दिया था।
इसके बाद भी परियोजना को नए डिजाइन और नई समयसीमा के साथ आगे बढ़ाने की कोशिशें होती रहीं। दिसंबर 2025 तक ट्रस्ट के स्तर पर अप्रैल 2026 के आसपास काम शुरू होने की संभावित समयसीमा की चर्चा थी, लेकिन जमीन पर निर्माण नहीं शुरू हो सका। जुलाई 2026 तक स्थिति यह हो गई कि मूल मेगा प्रोजेक्ट को पीछे छोड़कर छोटी मस्जिद को पहली प्राथमिकता बनानी पड़ी।
नक्शा 2023 में मंजूर, फिर भी नहीं रखी जा सकी पहली ईंट
परियोजना में देरी की एक वजह शुरुआती प्रशासनिक और तकनीकी अड़चनें भी रहीं। अयोध्या विकास प्राधिकरण ने मार्च 2023 में परियोजना के लेआउट को मंजूरी दी थी। इसके बावजूद निर्माण आगे नहीं बढ़ पाया। बाद के वर्षों में फंडिंग, परियोजना के आकार, अतिरिक्त जमीन की जरूरत और निर्माण मॉडल जैसे मुद्दे सामने आते रहे। सितंबर 2025 तक भी स्थिति यह थी कि परियोजना स्थल पर पहली ईंट तक नहीं रखी गई थी।
ऐसे में यह कहना अधिक सटीक होगा कि परियोजना केवल एक कारण से नहीं रुकी। शुरुआत में मंजूरियों और प्रक्रिया में समय लगा, बाद में धन की कमी सबसे बड़ी चुनौती बनी और फिर पूरे मेगा प्रोजेक्ट की व्यवहारिकता पर सवाल खड़े हुए। अब IICF की प्राथमिकता बड़े अस्पताल और लाइब्रेरी वाले विशाल परिसर के बजाय उपलब्ध संसाधनों के हिसाब से पहले एक छोटी मस्जिद बनाना है।
राम मंदिर और धन्नीपुर प्रोजेक्ट की तस्वीर बिल्कुल अलग
अयोध्या विवाद के 2019 के फैसले के बाद एक ओर मूल विवादित स्थल पर राम मंदिर का निर्माण तेजी से आगे बढ़ा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में जनवरी 2024 में प्राण प्रतिष्ठा समारोह आयोजित हुआ, वहीं दूसरी ओर धन्नीपुर की परियोजना निर्माण शुरू होने से पहले ही फंड की कमी से जूझती रही। धन्नीपुर परियोजना के पदाधिकारियों का कहना है कि पर्याप्त चंदा नहीं मिलने के कारण मूल योजना को छोटे स्वरूप में बदलना पड़ा है।
दोनों परियोजनाओं के बीच यह अंतर अब राजनीतिक और सार्वजनिक बहस का विषय भी बन गया है। धन्नीपुर में अस्पताल, पुस्तकालय और अन्य सुविधाओं वाला बड़ा परिसर बनाने की शुरुआती योजना फिलहाल पीछे हट चुकी है और अब सवाल यह है कि ₹1.5 करोड़ की मौजूदा राशि के बाद बाकी जरूरी धन कब और कैसे जुटाया जाएगा।
राम मंदिर के चढ़ावे को लेकर अलग विवाद भी सुर्खियों में
इसी बीच अयोध्या का राम मंदिर भी एक अलग विवाद के कारण चर्चा में है। मंदिर के चढ़ावे से कथित चोरी के मामले में जांच के बाद आठ लोगों की गिरफ्तारी हुई है और करीब ₹80 लाख की बरामदगी की खबर सामने आई है। मामले के बाद मंदिर ट्रस्ट के प्रबंधन में बड़ा बदलाव हुआ और महासचिव चंपत राय तथा ट्रस्टी अनिल मिश्रा के पद छोड़ने की खबर आई। विपक्ष ने इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक हमले तेज किए हैं, जबकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि जिन लोगों के खिलाफ सबूत मिले हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है और कुछ आरोपियों के कारण पूरे ट्रस्ट को बदनाम करना उचित नहीं है।
हालांकि राम मंदिर के चढ़ावे की जांच और धन्नीपुर मस्जिद की फंडिंग समस्या दो अलग-अलग मामले हैं। धन्नीपुर परियोजना को छोटा करने का कारण IICF के पदाधिकारियों ने सीधे तौर पर चंदे की कमी और परियोजना के प्रति अपेक्षित रुचि नहीं मिलने को बताया है।
अब सबसे बड़ा सवाल—कब बनेगी छोटी मस्जिद?
धन्नीपुर परियोजना के सामने अब सबसे बड़ा सवाल समयसीमा का है। छह साल से अधिक समय पहले जमीन आवंटित होने, 2023 में लेआउट मंजूर होने और कई बार निर्माण शुरू होने की संभावित तारीखें सामने आने के बावजूद काम शुरू नहीं हुआ। अब ट्रस्ट ने मेगा प्रोजेक्ट के बजाय ₹3 करोड़ से ₹5 करोड़ की लागत वाली छोटी मस्जिद बनाने की बात कही है, लेकिन इसके लिए भी मौजूदा चंदा अपर्याप्त है।
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि धन्नीपुर में अस्पताल, पुस्तकालय और विशाल परिसर वाला शुरुआती सपना फिलहाल वास्तविकता से काफी दूर चला गया है। परियोजना की प्राथमिकता अब एक सीमित आकार की मस्जिद तक सिमट गई है। फाउंडेशन यदि शेष धन जुटाने में सफल होता है तो निर्माण आगे बढ़ सकता है, लेकिन फिलहाल कोई ठोस निर्माण समयसीमा सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है।
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