सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को सस्पेंड करने के लिए किसी तरह का अंतरिम आदेश जारी करने से इनकार कर दिया है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने याचिका में लगाए गए आरोपों को लेकर भारत निर्वाचन आयोग (ECI) से जवाब मांगा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने आयोग के अन्य दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना कुछ फैसले एकतरफा तरीके से लिए।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए तत्काल निलंबन की मांग स्वीकार नहीं की। अदालत ने पहले चुनाव आयोग का पक्ष जानना उचित माना है।
चुनाव आयोग से सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर भारत निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। सुनवाई के दौरान अदालत ने संकेत दिया कि आयोग का जवाब मिलने के बाद कथित तौर पर बिना आवश्यक सहमति लिए गए फैसलों की वैधता पर विचार किया जा सकता है।
पीठ ने कहा कि यदि चुनाव आयोग के जवाब से यह सामने आता है कि कुछ फैसले जरूरी आम सहमति के बिना लिए गए थे, तो अदालत उन फैसलों की समीक्षा कर सकती है। यानी फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कोई दंडात्मक अंतरिम कार्रवाई नहीं की है, लेकिन याचिका में उठाए गए मुद्दों पर निर्वाचन आयोग से स्पष्टीकरण जरूर मांगा है।
The Supreme Court refuses to pass any interim order to suspend the Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar over allegations that he took decisions unilaterally in the Election Commission of India, without consensus from the two other Election Commissioners.
A bench headed by… pic.twitter.com/pWq876QSNS
— ANI (@ANI) October 5, 2026
याचिका में सामूहिक फैसले की व्यवस्था लागू करने की मांग
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका का मुख्य मुद्दा निर्वाचन आयोग के भीतर सामूहिक निर्णय लेने की व्यवस्था से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि चुनाव आयोग के महत्वपूर्ण निर्णय निर्धारित प्रक्रिया और आयोग की सामूहिक व्यवस्था के तहत ही लिए जाएं।
इसके साथ ही याचिका में क्वो वारंटो रिट जारी करने की भी मांग की गई है। इसके जरिए यह सवाल उठाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने कथित तौर पर आयोग की ओर से एकतरफा निर्णय किस अधिकार के तहत लिए।
संविधान के अनुच्छेद 324 का दिया हवाला
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 324 का हवाला देते हुए तर्क दिया गया है कि चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण की संवैधानिक शक्ति केवल मुख्य चुनाव आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से नहीं, बल्कि भारत निर्वाचन आयोग को दी गई है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इसी वजह से आयोग से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले संस्थागत और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के अनुसार लिए जाने चाहिए।
2023 के कानून की धारा 18 का भी जिक्र
याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 18 का भी उल्लेख किया गया है।
याचिकाकर्ता के मुताबिक यह प्रावधान आयोग में सामूहिक निर्णय लेने की व्यवस्था से संबंधित है। जिन मामलों में चुनाव आयुक्तों के बीच सर्वसम्मति नहीं बनती, उनमें फैसला बहुमत के आधार पर किया जाना चाहिए।
इसी आधार पर याचिका में सवाल उठाया गया है कि अगर अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति नहीं थी तो संबंधित निर्णय किस प्रक्रिया के तहत लिए गए।
दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का दावा
याचिका में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी से संबंधित कथित लिखित आपत्तियों और फाइल नोटिंग का भी हवाला दिया गया है।
याचिका में दावा किया गया है कि अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच चुनाव आयोग के नाम पर लिए गए विभिन्न फैसलों को लेकर दोनों चुनाव आयुक्तों ने कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की थी। हालांकि, ये याचिका में लगाए गए दावे हैं और इनकी सत्यता पर अभी सुप्रीम कोर्ट ने कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।
‘न्यूज रिपोर्ट के आधार पर फैसला नहीं दे सकते’
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिका में मीडिया रिपोर्ट्स पर निर्भरता को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल समाचार रिपोर्ट के आधार पर किसी मामले में अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
इसी कारण अदालत ने भारत निर्वाचन आयोग को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया है। आयोग के जवाब और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर आगे मामले पर विचार किया जाएगा।
फिलहाल CEC ज्ञानेश कुमार को राहत
सुप्रीम कोर्ट द्वारा अंतरिम निलंबन आदेश जारी करने से इनकार किए जाने के कारण फिलहाल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को राहत मिली है। हालांकि, चुनाव आयोग को नोटिस जारी होने के बाद मामला अभी समाप्त नहीं हुआ है।
अब इस मामले में निर्वाचन आयोग का जवाब महत्वपूर्ण होगा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट यह तय कर सकता है कि याचिका में उठाए गए सामूहिक निर्णय प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर आगे किस तरह की सुनवाई या आदेश की आवश्यकता है।
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