उत्तर प्रदेश के संभल जिले में सार्वजनिक जमीन पर नमाज पढ़ने की अनुमति से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए याचिका खारिज कर दी। शुक्रवार (1 मई 2026) को दिए गए इस फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर किसी एक समुदाय या व्यक्ति का विशेष अधिकार नहीं हो सकता और ऐसी जगहों का इस्तेमाल नियमित धार्मिक गतिविधियों के लिए नहीं किया जा सकता।
धार्मिक स्वतंत्रता पूर्ण अधिकार नहीं: कोर्ट
खंडपीठ ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता संविधान द्वारा दी गई है, लेकिन यह पूर्ण रूप से निरंकुश अधिकार नहीं है। यह अन्य नागरिकों के अधिकारों, सार्वजनिक व्यवस्था और सामाजिक शांति के अधीन है। कोर्ट के मुताबिक यदि कोई पक्ष पहले से चली आ रही परंपरा से अलग नई व्यवस्था लागू करने की कोशिश करता है, तो राज्य सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए हस्तक्षेप कर सकती है।
निजी संपत्ति पर भी लागू होंगे नियम
जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने कहा कि निजी संपत्ति पर सीमित और व्यक्तिगत धार्मिक गतिविधियाँ संरक्षित हो सकती हैं, लेकिन जब वही गतिविधियाँ नियमित, संगठित और बड़े स्तर पर होने लगती हैं, तो उनका प्रभाव सार्वजनिक जीवन पर पड़ता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी गतिविधियों से ट्रैफिक, आवाजाही, सुरक्षा, शोर और सामाजिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। इसलिए प्रशासन को कानून और स्थानीय नियमों के तहत नियंत्रण लागू करने का अधिकार है। किसी निजी परिसर को बिना अनुमति सार्वजनिक धार्मिक स्थल में बदलने की छूट नहीं दी जा सकती।
पुराने फैसलों की नई व्याख्या
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में पहले दिए गए आदेशों का भी जिक्र किया और स्पष्ट किया कि निजी संपत्ति पर प्रार्थना के लिए अनुमति न होने का मतलब यह नहीं है कि हर प्रकार की सामूहिक धार्मिक गतिविधि प्रशासनिक नियंत्रण से बाहर होगी।
कोर्ट ने कहा कि पुराने फैसले केवल सीमित, निजी और गैर-विघटनकारी गतिविधियों तक ही लागू होते हैं। यदि किसी गतिविधि का स्वरूप बड़ा होकर सार्वजनिक प्रभाव पैदा करता है, तो उस पर कानून लागू होगा।
क्या है संभल का पूरा मामला?
यह मामला उत्तर प्रदेश के संभल जिले के इकौना गांव से जुड़ा है। याचिकाकर्ता असीन ने दावा किया था कि उन्हें 2023 में 82.80 वर्गमीटर जमीन उपहार में मिली थी, जिस पर नमाज पढ़ने की अनुमति मांगी गई थी।
हालांकि राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि संबंधित जमीन राजस्व रिकॉर्ड में सार्वजनिक उपयोग की भूमि के रूप में दर्ज है और वहां परंपरागत रूप से केवल ईद के अवसर पर नमाज होती रही है। सरकार ने यह भी कहा कि अब वहां नियमित और बड़े स्तर पर सामूहिक नमाज शुरू करने का प्रयास किया जा रहा है, जिसमें बाहरी लोगों की भागीदारी भी शामिल है।
राज्य को एहतियाती कदम उठाने का अधिकार
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि राज्य को किसी संभावित विवाद या अव्यवस्था के वास्तविक रूप लेने का इंतजार करने की जरूरत नहीं है। यदि किसी गतिविधि से सार्वजनिक शांति प्रभावित होने की आशंका है, तो प्रशासन पहले से ही एहतियाती कदम उठा सकता है।
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