महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के संकेत मिल रहे हैं। वर्ष 2022 में शिवसेना के विभाजन के बाद अब उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) यानी शिवसेना (UBT) के सामने नया संकट खड़ा होता दिखाई दे रहा है। पिछले कुछ दिनों से चर्चा में बने ‘ऑपरेशन टाइगर’ को लेकर राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, शिवसेना (UBT) के लोकसभा सांसदों के एक समूह द्वारा एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ जाने की संभावनाओं को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं। दावा किया जा रहा है कि पार्टी के 9 सांसदों में से 6 सांसद अलग रुख अपना सकते हैं, हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा अभी तक नहीं हुई है।
लोकसभा स्पीकर को पत्र, बढ़ी राजनीतिक सरगर्मी
राजनीतिक घटनाक्रम के बीच शिवसेना (UBT) के वरिष्ठ नेता और लोकसभा में पार्टी के नेता अरविंद सावंत ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखा है। पत्र में उन्होंने आग्रह किया है कि पार्टी का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाले किसी भी कथित अलग समूह या बागी गुट को तत्काल कोई स्वतंत्र मान्यता या विशेष दर्जा न दिया जाए।
उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी निर्णय से पहले मूल राजनीतिक दल का पक्ष अवश्य सुना जाना चाहिए, ताकि संसदीय प्रक्रिया और दलगत पहचान की संवैधानिक व्यवस्था बनी रहे।
#WATCH | Nagpur | Maharashtra Minister and BJP leader Chandrashekhar Bawankule says, "BJP has no relation with where Uddhav Thackeray's MPs go. Uddhav Thackeray should know why his MPs or MLAs are leaving him. If they are going to Eknath Shinde, then it is a matter related to… pic.twitter.com/HXO11BL2kH
— ANI (@ANI) June 17, 2026
दिल्ली में बैठकों को लेकर चर्चाएं
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, बीती रात उद्धव ठाकरे गुट के कुछ सांसदों और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के दिल्ली में मौजूद होने की खबरों ने अटकलों को और हवा दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में इस घटनाक्रम को लेकर और स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकती है।
कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि संभावित रूप से अलग होने वाले सांसदों को केंद्र सरकार में प्रतिनिधित्व मिलने की चर्चा चल रही है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
कांग्रेस का हमला, नाना पटोले ने उठाए सवाल
महाराष्ट्र कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले ने इस पूरे घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कथित ‘ऑपरेशन टाइगर’ को ‘ऑपरेशन गीदड़’ बताते हुए आरोप लगाया कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है।
पटोले ने कहा कि राजनीतिक दलों को कमजोर करने और उनके जनप्रतिनिधियों को प्रभावित करने की कोशिशें लोकतंत्र के लिए चिंताजनक हैं। उन्होंने सांसदों की खरीद-फरोख्त से जुड़े आरोपों पर भी सवाल उठाते हुए निष्पक्ष राजनीतिक वातावरण की आवश्यकता पर जोर दिया।
लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका पर भी बहस
नाना पटोले ने लोकसभा स्पीकर को लिखे गए पत्र पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस मामले में संसदीय प्रक्रियाओं का पालन होना चाहिए। उन्होंने संसदीय संस्थाओं की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर भी टिप्पणी की।
हालांकि भाजपा नेताओं ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है और कहा है कि पार्टी का इस पूरे घटनाक्रम से कोई संबंध नहीं है।
भाजपा ने खुद को बताया अलग
महाराष्ट्र सरकार में मंत्री और भाजपा नेता चंद्रशेखर बावनकुले ने कहा कि शिवसेना (UBT) के सांसद या विधायक किस राजनीतिक निर्णय पर पहुंचते हैं, यह उनका आंतरिक विषय है। उन्होंने कहा कि भाजपा को इस विवाद में अनावश्यक रूप से घसीटा जा रहा है।
बावनकुले ने यह भी कहा कि यदि कोई नेता या जनप्रतिनिधि पार्टी छोड़ने का निर्णय लेता है तो उसके पीछे के कारणों की समीक्षा संबंधित दल को स्वयं करनी चाहिए।
संजय निरुपम का दावा
शिवसेना (शिंदे गुट) के नेता संजय निरुपम ने भी उद्धव ठाकरे गुट पर निशाना साधते हुए दावा किया कि पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का नेतृत्व पर भरोसा लगातार कम हो रहा है।
उन्होंने कहा कि यदि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियां जारी रहीं तो आने वाले वर्षों में शिवसेना (UBT) को और चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
2022 के विभाजन के बाद नया संकट
गौरतलब है कि वर्ष 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुए राजनीतिक विद्रोह के बाद शिवसेना दो हिस्सों में विभाजित हो गई थी। बाद में चुनाव आयोग ने शिवसेना का नाम और चुनाव चिह्न शिंदे गुट को आवंटित कर दिया था, जबकि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट को ‘शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे)’ नाम और ‘मशाल’ चुनाव चिह्न मिला।
अब सांसदों के संभावित असंतोष और बगावत की चर्चाओं को ठाकरे गुट के लिए एक और बड़े राजनीतिक परीक्षण के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह केवल राजनीतिक अटकलें हैं या महाराष्ट्र की राजनीति में एक और बड़ा बदलाव होने वाला है।
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