राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने उदयपुर में आयोजित हल्दीघाटी विजय की 450वीं वर्षगांठ और महाराणा प्रताप जयंती कार्यक्रम में इतिहास, राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें कहीं। उन्होंने कहा कि हल्दीघाटी का युद्ध केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि स्वाभिमान, स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा का प्रतीक था।
अपने संबोधन में भागवत ने कहा कि महाराणा प्रताप ने युद्ध के तीसरे चरण में अपनी सेना को सुरक्षित निकालने की रणनीति अपनाई, जिससे संघर्ष जारी रखा जा सके। बाद में उन्होंने मेवाड़ को पुनः संगठित किया, चावंड को राजधानी बनाया और मुगलों द्वारा कब्जाई गई चौकियों को वापस जीतकर धर्म, न्याय और सुशासन पर आधारित शासन स्थापित किया।
“आज भी महाराणा प्रताप की जयंती मनती है, अकबर की नहीं”
मोहन भागवत ने कहा कि इतिहास का मूल्यांकन केवल तत्कालीन परिणामों से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक प्रभावों से किया जाना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा,
“आज हम महाराणा प्रताप की जयंती मना रहे हैं। क्या आपने कभी सुना है कि दुनिया में कहीं अकबर की जयंती मनाई जाती है? इससे स्पष्ट है कि इतिहास में वास्तविक विजय किसकी हुई।”
उन्होंने कहा कि कई बार इतिहास को गलत नैरेटिव के माध्यम से प्रस्तुत किया गया, लेकिन तथ्य और समकालीन अभिलेख कुछ और ही कहानी बताते हैं।
#WATCH | उदयपुर, राजस्थान: आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, “हल्दीघाटी के तीसरे चरण में उन्होंने (महाराणा प्रताप) अपनी रणनीति से सेना को युद्धक्षेत्र के पार खींच लिया, जिससे सेना सुरक्षित रही।
बाद में मेवाड़ को मुक्त कराने के बाद चावंड राजधानी बना और राज्य कार्यरत रहा।
मुगलों… pic.twitter.com/LpsQ18TiKr
— One India News (@oneindianewscom) June 17, 2026
“हल्दीघाटी की विजय महाराणा प्रताप की थी”
RSS प्रमुख ने दावा किया कि हल्दीघाटी युद्ध को लेकर लंबे समय तक गलत धारणाएँ फैलायी गईं। उन्होंने कहा कि मुगल इतिहासकारों के विवरणों में भी उल्लेख मिलता है कि शुरुआती संघर्ष में मुगल सेना को पीछे हटना पड़ा था।
भागवत ने कहा कि महाराणा प्रताप की जयंती स्वयं इस बात का प्रमाण है कि जनता ने उन्हें अपने आदर्श और प्रेरणा स्रोत के रूप में स्वीकार किया। उनके अनुसार, यह संघर्ष भारत की आत्मा, स्वतंत्रता और अस्मिता की रक्षा का प्रतीक था।
भारतीय संस्कृति की विशेषता पर भी बोले भागवत
अपने संबोधन के दौरान मोहन भागवत ने भारतीय संस्कृति और सभ्यता की वैश्विक भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत ने दुनिया को हमेशा ज्ञान, सेवा, चिकित्सा, शिक्षा और संस्कृति का संदेश दिया है।
उन्होंने कहा,
“भारत जब दुनिया में गया तो सेना लेकर नहीं गया। हम ज्ञान, चिकित्सा, शिक्षा और संस्कृति लेकर गए। हमने मित्रता स्थापित की और मानवता के हित में अपने अनुभव साझा किए।”
भागवत ने कहा कि भारतीय परंपरा सभी विचारों और मान्यताओं का सम्मान करती है। भारत की शक्ति उसकी विविधता, सहिष्णुता और समावेशी दृष्टिकोण में निहित है।
#WATCH | Udaipur, Rajasthan: RSS Chief Mohan Bhagwat attends the Haldighati Vijay 450th anniversary commemoration event.
He says, “…Today is Maharana Pratap's birth anniversary. Yesterday marked four hundred and fifty years since the battle. Why was the Battle of Haldighati a… pic.twitter.com/JBiy2B7X0B
— ANI MP/CG/Rajasthan (@ANI_MP_CG_RJ) June 17, 2026
“कठिन समय में भी भारत ने अपनी पहचान नहीं खोई”
RSS प्रमुख ने कहा कि इतिहास में भारत ने अनेक आक्रमण, चुनौतियाँ और संघर्ष देखे हैं, लेकिन देश ने कभी अपनी सांस्कृतिक पहचान, जीवन मूल्य और राष्ट्रीय एकता को नहीं खोया।
उन्होंने कहा कि समाज ने अच्छे और बुरे दोनों दौर देखे हैं, लेकिन भारतीय सभ्यता की मूल आत्मा आज भी जीवित है। यही कारण है कि भारत आज भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा हुआ है और विश्व मंच पर एक विशिष्ट पहचान रखता है।
महाराणा प्रताप की विरासत आज भी प्रेरणास्रोत
कार्यक्रम में उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि महाराणा प्रताप का जीवन साहस, त्याग, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है। उनकी संघर्षगाथा आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रहित और आत्मसम्मान के लिए समर्पित रहने की प्रेरणा देती रहेगी।
हल्दीघाटी विजय की 450वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में सामाजिक, धार्मिक और ऐतिहासिक विषयों से जुड़े लोग उपस्थित रहे।
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