पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद शुरू हुई तृणमूल कांग्रेस की अंदरूनी सियासी लड़ाई अब पार्टी कार्यालय तक पहुँच गई है। शुक्रवार, 3 जुलाई 2026 को पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने कोलकाता के ईएम बाईपास के पास मेट्रोपॉलिटन बिल्डिंग में स्थित पार्टी के संगठनात्मक कार्यालय पर अपना दावा ठोक दिया।
बागी गुट के नेता कार्यालय पहुँचे, भीतर बैठक की, नए बैनर लगाए और बाद में मुख्य गेट पर नया ताला लगा दिया। गुट ने दावा किया कि वही “असली तृणमूल कांग्रेस” है और यह कार्यालय पार्टी का होने के कारण अब उनके नियंत्रण में रहेगा।
यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले दोनों खेमों के बीच पार्टी संगठन, नेतृत्व, अधिकृत पदाधिकारियों और चुनाव चिह्न को लेकर चुनाव आयोग के सामने विवाद चल रहा है।
ऋतब्रत बनर्जी के साथ कई वरिष्ठ नेता पहुँचे कार्यालय
रिपोर्टों के अनुसार, ऋतब्रत बनर्जी के साथ फिरहाद हकीम, जावेद खान, संदीपन साहा, अख्रुज्जमां और कई अन्य नेता पार्टी कार्यालय पहुँचे। बागी गुट के नेताओं ने परिसर के भीतर बैठक भी की।
कार्यालय के बाहर एक नया बैनर लगाया गया, जिसमें अरूप रॉय को तृणमूल कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में पेश किया गया। इससे यह साफ संकेत दिया गया कि बागी गुट अब केवल विधानसभा में अलग नेतृत्व का दावा नहीं कर रहा, बल्कि पार्टी के पूरे संगठन पर अपने अधिकार की लड़ाई तेज कर चुका है।
रिपोर्टों के मुताबिक, बागी गुट ने परिसर के मालिक के साथ नया समझौता करने का भी दावा किया है। उनका कहना है कि अब यह कार्यालय उनके खेमे के संगठनात्मक कामकाज का केंद्र बनेगा। दूसरी ओर, कार्यालय पर नियंत्रण के इस तरीके को ममता समर्थक खेमे ने चुनौती दी है।
Rebel AITC camp of MLAs take over TMC’s party office in Kolkata. pic.twitter.com/igr6uIklip
— Abir Ghoshal (@abirghoshal) July 3, 2026
22 जून की बैठक में अरूप रॉय को अध्यक्ष बनाने का दावा
ऋतब्रत गुट का कहना है कि 22 जून 2026 को हुई एक विशेष बैठक में पार्टी की नई 30 सदस्यीय कार्यसमिति बनाई गई थी। इसी बैठक में अरूप रॉय को अध्यक्ष चुने जाने और ममता बनर्जी को सलाहकार की भूमिका देने का दावा किया गया।
बागी खेमे के मुताबिक, पार्टी के संगठनात्मक ढाँचे में बड़े बदलाव किए गए हैं। रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि इस गुट ने अभिषेक बनर्जी को राष्ट्रीय महासचिव के पद से हटाने का दावा किया है। हालांकि, इन संगठनात्मक बदलावों की वैधता को ममता बनर्जी का खेमा स्वीकार नहीं करता और अब यही विवाद चुनाव आयोग के सामने है।
‘हम ही असली तृणमूल’ का दावा
बागी गुट के नेताओं ने साफ कहा कि वे खुद को असली तृणमूल कांग्रेस मानते हैं। अख्रुज्जमां ने दावा किया कि कार्यालय तृणमूल कांग्रेस का है और उनका गुट ही पार्टी का वास्तविक प्रतिनिधित्व करता है।
ऋतब्रत गुट का कहना है कि पार्टी का ‘जोड़ा फूल’ चुनाव चिह्न भी उसी का है और संगठन पर अधिकार का फैसला विधायकों एवं संगठनात्मक समर्थन के आधार पर होना चाहिए। कार्यालय में लगे ममता बनर्जी के फोटो और कटआउट नहीं हटाए गए। इसके पीछे बागी गुट का तर्क है कि वह ममता बनर्जी को पूरी तरह पार्टी से अलग करने के बजाय उन्हें सलाहकार की भूमिका देना चाहता है।
ममता बनर्जी की तस्वीरें कार्यालय में बनी रहीं
पूरे घटनाक्रम का एक दिलचस्प पहलू यह भी रहा कि बागी गुट ने कार्यालय के भीतर लगी ममता बनर्जी की तस्वीरों को नहीं हटाया।
हालांकि नए बैनर में अरूप रॉय को अध्यक्ष के रूप में पेश किया गया, लेकिन ममता बनर्जी की तस्वीरें कार्यालय के भीतर मौजूद रहीं। इससे बागी खेमे की रणनीति का संकेत मिलता है—एक ओर वह संगठन और नेतृत्व पर अपना दावा मजबूत कर रहा है, तो दूसरी ओर ममता बनर्जी को एक प्रतीकात्मक या सलाहकार भूमिका में बनाए रखना चाहता है।
दफ्तर में नया ताला, चाबी बागी गुट के पास
बैठक के बाद बागी गुट ने कार्यालय के मुख्य गेट पर नया ताला लगा दिया। गुट के नेताओं का कहना है कि मुख्य गेट की चाबी अब उनके पास रहेगी।
यह कदम तृणमूल कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई में एक प्रतीकात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। अब तक दोनों खेमों के बीच संघर्ष विधायकों, संगठनात्मक पदों और चुनाव आयोग तक सीमित दिखाई दे रहा था, लेकिन पार्टी कार्यालय पर नियंत्रण की लड़ाई ने टकराव को एक नए स्तर पर पहुँचा दिया है।
कुनाल घोष पहुँचे, लेकिन बंद मिला गेट
घटनाक्रम की जानकारी मिलने के बाद ममता बनर्जी समर्थक नेता कुनाल घोष पार्टी कार्यालय पहुँचे, लेकिन मुख्य गेट पर नया ताला लगा होने के कारण वे अंदर नहीं जा सके।
इसके बाद पुलिस भी मौके पर पहुँची। संभावित टकराव को रोकने के लिए सुरक्षा व्यवस्था की गई। ममता समर्थक खेमे ने कार्यालय पर कथित जबरन नियंत्रण का आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई।
कुनाल घोष ने आरोप लगाया कि यह पूरी कार्रवाई राज्य प्रशासन और पुलिस की मदद से हुई है। दूसरी ओर, बागी गुट का कहना है कि उसने परिसर के मालिक से बात कर कानूनी रूप से कार्यालय के इस्तेमाल की व्यवस्था की है। दोनों पक्षों के इन दावों के कारण विवाद अब राजनीतिक के साथ-साथ कानूनी रूप भी ले सकता है।
चुनाव आयोग से मुलाकात के अगले दिन बड़ा कदम
पार्टी कार्यालय पर दावा ठोकने का यह कदम ऋतब्रत गुट की चुनाव आयोग से मुलाकात के ठीक एक दिन बाद उठाया गया।
2 जुलाई 2026 को ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और अन्य चुनाव आयुक्तों से मुलाकात कर पार्टी संगठन और नेतृत्व पर अपना दावा पेश किया था।
इसके बाद चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी के दोनों गुटों को एक-दूसरे के दावों पर जवाब देने को कहा है। दोनों पक्षों से संगठनात्मक चुनाव, अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं और पार्टी पर नियंत्रण से जुड़े दस्तावेज 6 जुलाई 2026 को शाम 5:30 बजे तक जमा करने को कहा गया है।
पार्टी के नाम और ‘जोड़ा फूल’ चिह्न पर असली लड़ाई
तृणमूल कांग्रेस के मौजूदा संकट का सबसे बड़ा सवाल यह है कि चुनाव आयोग आखिर किस गुट को असली पार्टी मानेगा।
ऋतब्रत गुट संख्या बल और नई संगठनात्मक संरचना के आधार पर दावा कर रहा है। दूसरी ओर, ममता बनर्जी का खेमा यह कह रहा है कि पार्टी से निकाले गए नेताओं को संगठन के नाम और चुनाव चिह्न पर दावा करने का अधिकार नहीं है।
चुनाव आयोग को अब दोनों गुटों के संगठनात्मक समर्थन, पदाधिकारियों, विधायकों और अन्य उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर मामले पर विचार करना है।
58 विधायकों के समर्थन ने बढ़ाई ममता खेमे की मुश्किल
तृणमूल कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा संकट विधानसभा में पैदा हुआ है। जून 2026 में 80 TMC विधायकों में से 58 ने ऋतब्रत बनर्जी के समर्थन में दावा पेश किया था।
इसके बाद ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता मिली। यह घटनाक्रम ममता बनर्जी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना गया, क्योंकि इससे पार्टी के विधायक दल पर उनके नियंत्रण को गंभीर चुनौती मिली।
80 में से 58 विधायकों के बागी गुट के साथ होने की रिपोर्ट के आधार पर विधानसभा में ममता खेमे के पास 22 विधायक बचते हैं। हालांकि, दोनों गुटों के बीच राजनीतिक और कानूनी विवाद अभी जारी है।
संसद तक भी पहुँची TMC की टूट
तृणमूल कांग्रेस का संकट केवल पश्चिम बंगाल विधानसभा तक सीमित नहीं रहा। जून 2026 में पार्टी के कई लोकसभा सांसदों ने भी अलग रुख अपनाया।
बागी खेमे ने शुरुआत में लगभग 20 और बाद में 22 लोकसभा सांसदों के समर्थन का दावा किया। हालांकि, इन दावों और सांसदों की औपचारिक स्थिति को लेकर विभिन्न रिपोर्टों में अलग-अलग विवरण सामने आए हैं। इसी कारण संसदीय संख्या को लेकर अंतिम तस्वीर अभी सावधानी से देखी जानी चाहिए।
अब चुनाव आयोग और अदालतों पर नजर
पार्टी कार्यालय की लड़ाई के बाद तृणमूल कांग्रेस का संकट अब तीन मोर्चों पर पहुँच गया है—विधानसभा, चुनाव आयोग और अदालत।
एक तरफ ऋतब्रत गुट विधायकों और संगठनात्मक बदलावों के आधार पर खुद को असली तृणमूल बता रहा है। दूसरी ओर ममता बनर्जी समर्थक खेमा बागी नेताओं के दावों को अवैध और संगठन के खिलाफ बता रहा है।
पार्टी कार्यालय पर नियंत्रण के बाद संघर्ष और तेज हो गया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि चुनाव आयोग पार्टी के नाम और ‘जोड़ा फूल’ चिह्न को लेकर क्या फैसला करता है और कार्यालय पर नियंत्रण का मामला किस कानूनी दिशा में आगे बढ़ता है।
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