साल 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े कथित ‘लार्जर कॉन्सपिरेसी’ यानी बड़ी साजिश के मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की नई जमानत याचिकाओं पर शनिवार, 4 जुलाई 2026 को दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट में सुनवाई हुई।
एडिशनल सेशंस जज समीर बाजपेयी ने बचाव पक्ष और दिल्ली पुलिस की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। अदालत ने संकेत दिया कि आदेश शनिवार शाम तक या सोमवार, 6 जुलाई को सुनाया जा सकता है। इसलिए सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों पर दोनों की जमानत खारिज होने का दावा फिलहाल उपलब्ध न्यायिक रिपोर्टिंग से पुष्ट नहीं होता।
क्या है पूरा मामला?
उमर खालिद और शरजील इमाम दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा दर्ज FIR 59/2020 में आरोपी हैं। मामला फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा के पीछे कथित बड़ी साजिश से जुड़ा है।
दिल्ली पुलिस का आरोप है कि नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों को योजनाबद्ध तरीके से सड़क जाम और बाद में हिंसा की ओर ले जाने की बड़ी साजिश रची गई थी। आरोपियों पर UAPA और तत्कालीन भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। ये आरोप अभी न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं और किसी अंतिम दोषसिद्धि का फैसला नहीं हुआ है।
करीब छह साल की हिरासत को बनाया जमानत का बड़ा आधार
नई जमानत याचिकाओं में बचाव पक्ष ने लंबी प्री-ट्रायल हिरासत को प्रमुख आधार बनाया। दोनों पक्षों की ओर से कहा गया कि आरोपी करीब छह वर्षों से हिरासत में हैं, जबकि मुकदमे में अभी तक कोई निर्णायक प्रगति नहीं हुई है और मामला आरोप तय करने की बहस के स्तर पर है।
शरजील इमाम की ओर से दलील दी गई कि जनवरी में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के छह महीने बाद भी ट्रायल में कोई सार्थक प्रगति नहीं हुई। उनके वकील ने यह भी कहा कि मुकदमा जल्द समाप्त होने की कोई संभावना दिखाई नहीं देती।
उमर खालिद के वकील ने क्या कहा?
उमर खालिद की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता त्रिदीप पैस ने अदालत में दलील दी कि उनके मुवक्किल के खिलाफ हिंसा में प्रत्यक्ष भागीदारी का आरोप नहीं है।
बचाव पक्ष ने कहा कि उमर खालिद से कोई पैसा, हथियार या गोला-बारूद बरामद नहीं हुआ और कथित हिंसा के दौरान उनकी घटनास्थल पर मौजूदगी का आरोप भी नहीं है। वकील ने कहा कि अभियोजन का मामला मुख्य रूप से बयानों और कथित बैठकों जैसी सामग्री पर आधारित है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये बचाव पक्ष की दलीलें हैं। दूसरी ओर, अभियोजन ने उमर खालिद पर कथित साजिश की योजना, लामबंदी और रणनीतिक निर्देशन में केंद्रीय भूमिका निभाने का आरोप लगाया है। जनवरी 2026 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने जमानत के सीमित स्तर पर अभियोजन सामग्री को प्रथम दृष्टया पर्याप्त मानते हुए उन्हें राहत देने से इनकार किया था।
‘मैं लगातार हिरासत में, कानून में बदली परिस्थितियाँ’
उमर खालिद के वकील ने अदालत में यह भी कहा कि वह लगातार हिरासत में हैं और जनवरी 2026 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कानून से जुड़े महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुए हैं।
बचाव पक्ष का तर्क था कि बाद के सुप्रीम कोर्ट के आदेशों ने लंबी हिरासत और UAPA मामलों में जमानत के सवाल पर नई परिस्थितियाँ पैदा की हैं। इसी आधार पर उन्होंने ट्रायल कोर्ट से नई जमानत याचिका पर विचार करने की मांग की।
शरजील इमाम के वकील ने क्या दलील दी?
शरजील इमाम की ओर से अधिवक्ता तालिब मुस्तफा ने कहा कि उनके मुवक्किल ने लंबी अवधि हिरासत में गुजार दी है और मुकदमा जल्द पूरा होने की कोई संभावना नहीं है। बचाव पक्ष ने अन्य आरोपियों को मिली जमानत और बाद में UAPA जमानत कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हुए न्यायिक घटनाक्रमों का भी हवाला दिया।
उनका तर्क था कि एक साल तक दोबारा जमानत आवेदन नहीं करने संबंधी पहले के आदेश की वैधानिकता भी अब सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ के विचाराधीन व्यापक सवालों से जुड़ी हुई है।
दिल्ली पुलिस ने किया जमानत का कड़ा विरोध
दिल्ली पुलिस की ओर से पेश वकील ने दोनों जमानत याचिकाओं का विरोध किया।
अभियोजन का मुख्य तर्क था कि 5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित आदेश अभी भी लागू है। जब तक बड़ी पीठ उस कानूनी स्थिति को बदल नहीं देती, तब तक निचली अदालत उस आदेश में तय शर्तों की अनदेखी नहीं कर सकती।
दिल्ली पुलिस ने कहा कि दोनों आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट से स्पष्टीकरण मांगना चाहिए था और ट्रायल कोर्ट पहले के शीर्ष अदालत के आदेश से अलग रास्ता नहीं अपना सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी में क्या कहा था?
5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएँ खारिज कर दी थीं।
शीर्ष अदालत ने कहा था कि अभियोजन सामग्री को जमानत के स्तर पर देखने पर दोनों के खिलाफ कथित साजिश में योजना, लामबंदी और रणनीतिक निर्देशन की केंद्रीय भूमिका का प्रथम दृष्टया आरोप सामने आता है। अदालत ने माना था कि उनके मामले में UAPA की धारा 43D(5) की जमानत संबंधी रोक लागू होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि पांच अन्य सह-आरोपियों—गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद—को सख्त शर्तों पर जमानत दी थी।
एक साल या गवाहों की गवाही—क्या थी सुप्रीम कोर्ट की शर्त?
जनवरी के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी थी। अदालत ने कहा था कि अभियोजन के संरक्षित गवाहों की गवाही पूरी होने या 5 जनवरी 2026 से एक साल पूरा होने—इनमें से जो भी पहले हो—उसके बाद उमर खालिद और शरजील इमाम दोबारा सक्षम अदालत के सामने जमानत की मांग कर सकते हैं।
शनिवार की सुनवाई में दिल्ली पुलिस ने इसी व्यवस्था का हवाला देते हुए कहा कि निर्धारित समय से पहले नई जमानत याचिकाएँ स्वीकार नहीं की जानी चाहिए।
फिर छह महीने में नई जमानत याचिका क्यों?
इस सवाल पर बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के बाद के न्यायिक घटनाक्रमों को आधार बनाया।
मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पीठ ने लंबी प्री-ट्रायल हिरासत के बावजूद UAPA के मामलों में जमानत न देने के कानूनी दृष्टिकोण पर गंभीर सवाल उठाए थे। बाद में UAPA मामलों में ट्रायल में लंबी देरी और जमानत से जुड़े सिद्धांतों के बीच कथित टकराव को बड़ी पीठ के विचार के लिए भेजा गया।
उमर खालिद और शरजील इमाम के वकीलों का तर्क है कि यह घटनाक्रम परिस्थितियों में महत्वपूर्ण बदलाव है और उनकी नई जमानत याचिकाओं पर विचार का आधार बनता है।
‘सुप्रीम कोर्ट का आदेश अभी पत्थर की लकीर’: अभियोजन
अभियोजन ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
दिल्ली पुलिस की ओर से कहा गया कि बड़ी पीठ के अंतिम फैसले तक जनवरी का सुप्रीम कोर्ट आदेश पूरी तरह बाध्यकारी है। अभियोजन ने तर्क दिया कि केवल किसी अन्य पीठ द्वारा कानूनी सवाल उठाए जाने से पहले का फैसला स्वतः समाप्त नहीं हो जाता। सरकारी पक्ष ने यह भी याद दिलाया कि जनवरी के फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिका भी खारिज हो चुकी है।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों को अन्य आरोपियों से अलग क्यों माना था?
जनवरी के विस्तृत फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सभी आरोपियों को एक ही स्तर पर नहीं रखा जा सकता।
अदालत के अनुसार, अभियोजन का मामला उमर खालिद और शरजील इमाम को कथित साजिश के योजना और रणनीतिक स्तर पर रखता है, जबकि जमानत पाने वाले कुछ अन्य आरोपियों पर स्थानीय स्तर की सुविधा, समन्वय या क्रियान्वयन से जुड़े आरोप थे।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि यह टिप्पणी दोषसिद्धि नहीं है और अंतिम अपराध या निर्दोषता का फैसला केवल मुकदमे के दौरान सबूतों की पूरी जांच के बाद होगा।
UAPA की धारा 43D(5) क्यों महत्वपूर्ण?
इस मामले में जमानत का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू UAPA की धारा 43D(5) है।
इसके तहत अदालत यदि केस डायरी और आरोपपत्र की सामग्री के आधार पर यह मानती है कि आरोप प्रथम दृष्टया सही होने के उचित आधार हैं, तो जमानत पर सख्त कानूनी रोक लागू होती है। जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम के मामले में इसी सीमा को लागू माना था।
हालांकि, लंबी प्री-ट्रायल हिरासत और मुकदमे में असाधारण देरी होने पर संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सवाल किस स्तर पर UAPA की इस रोक पर प्रभाव डाल सकता है, यही व्यापक कानूनी विवाद अब महत्वपूर्ण बन गया है।
मामला अभी आरोप तय करने की बहस के स्तर पर
नई जमानत अर्जियों में बचाव पक्ष ने कहा है कि लगभग छह साल बाद भी मुकदमा आरोप तय करने की बहस के स्तर पर है।
इसी आधार पर दोनों आरोपियों ने कहा कि लंबी कैद स्वयं गंभीर संवैधानिक चिंता बन चुकी है। दूसरी ओर, अभियोजन का कहना है कि मामले की गंभीरता, सुप्रीम कोर्ट का पूर्व आदेश और UAPA का जमानत ढांचा राहत के खिलाफ जाता है। अब ट्रायल कोर्ट को इन्हीं प्रतिस्पर्धी कानूनी तर्कों पर फैसला देना है।
अब आगे क्या होगा?
एडिशनल सेशंस जज समीर बाजपेयी ने दोनों जमानत याचिकाओं पर अपना आदेश सुरक्षित रखा है। अदालत ने कहा कि फैसला शनिवार शाम तक देने का प्रयास किया जाएगा और ऐसा न हो पाने पर सोमवार, 6 जुलाई को आदेश सुनाया जाएगा।
इसलिए खबर प्रकाशित करते समय फिलहाल सही स्थिति यही है:
“उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत पर फैसला सुरक्षित”
न कि: “दोनों की जमानत खारिज”।
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