उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में महिला और उसकी नाबालिग बेटी के अपहरण, अवैध बंधक बनाने, दुष्कर्म और जबरन धर्म परिवर्तन के दबाव के चर्चित मामले में विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने आरोपी मौलाना शाकिर हुसैन को विभिन्न गंभीर धाराओं में दोषी करार देते हुए 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। यह बदायूं जिले में उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत सजा का पहला मामला माना जा रहा है।
अदालत ने क्या फैसला सुनाया?
विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट (महिलाओं के विरुद्ध अपराध) की न्यायाधीश नेहा गर्ग ने 20 जुलाई 2026 को फैसला सुनाते हुए शाकिर हुसैन को धर्मांतरण कानून के तहत 5 वर्ष के कठोर कारावास और ₹50,000 जुर्माने की सजा दी। इसके अलावा अपहरण, अवैध बंधक बनाने, आपराधिक धमकी और दुष्कर्म सहित अन्य अपराधों में भी दोषी ठहराया गया।
दुष्कर्म के मामले में अदालत ने आरोपी को 10 वर्ष के कठोर कारावास और ₹50,000 जुर्माने की सजा सुनाई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सभी सजाएं एक साथ चलेंगी और जुर्माना जमा नहीं करने की स्थिति में अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।
कैसे शुरू हुआ पूरा मामला?
मामले के अनुसार, पीड़िता अपने मानसिक रूप से कमजोर बेटे के इलाज के लिए कई चिकित्सकों के पास जा चुकी थी। इसी दौरान उसे जानकारी मिली कि बदायूं के गढ़ी रिसौली गांव का रहने वाला शाकिर हुसैन इलाज करता है। इलाज के बहाने उसका परिवार से संपर्क बढ़ा और धीरे-धीरे उसने परिवार का विश्वास जीत लिया।
21 मार्च 2025 को महिला अपनी 10 वर्षीय बेटी के साथ मायके जाने के लिए घर से निकली थी। आरोप है कि रास्ते में शाकिर हुसैन मिला और दोनों को बहला-फुसलाकर मोटरसाइकिल पर बैठाकर कासगंज जिले के सिढ़पुरा क्षेत्र में ले गया।
तीन महीने तक बंधक बनाकर रखा
अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी ने मां-बेटी को एक घर में बंद करके रखा और महिला पर मुस्लिम धर्म अपनाने का दबाव बनाया। पीड़िता ने अदालत को बताया कि इस दौरान आरोपी ने कई बार उसके साथ दुष्कर्म किया और विरोध करने पर बेटी को जान से मारने की धमकी देता था।
महिला के अनुसार, करीब तीन महीने तक दोनों को कैद जैसी स्थिति में रखा गया। उन्हें जबरन नमाज पढ़ाई जाती थी और बेटी को आरोपी को “अब्बू” तथा मां को “अम्मी” कहने के लिए मजबूर किया जाता था। विरोध करने पर मारपीट भी की जाती थी।
पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया कि उसके हाथ पर बने टैटू को मिटाने के लिए आरोपी ने जहरीला पदार्थ लगाया, जिससे उसकी त्वचा बुरी तरह प्रभावित हो गई। आरोपी लगातार निकाह करने का दबाव भी बना रहा था।
पुलिस ने कैसे किया खुलासा?
परिजनों द्वारा गुमशुदगी दर्ज कराने के बाद पुलिस ने जांच शुरू की। जांच के दौरान पीड़िता और उसकी बेटी के बयान दर्ज किए गए। 27 जून 2025 को दोनों को बरामद किया गया और मेडिकल परीक्षण कराया गया। अगले दिन आरोपी शाकिर हुसैन को गिरफ्तार कर लिया गया।
पुलिस ने पर्याप्त साक्ष्य जुटाने के बाद अदालत में चार्जशीट दाखिल की। 18 नवंबर 2025 को आरोपी के खिलाफ आरोप तय किए गए और मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई।
मेडिकल जांच में क्या सामने आया?
मेडिकल जांच के दौरान पीड़िता के शरीर पर चोटों के निशान पाए गए। जांच में महिला गर्भवती भी पाई गई। अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में लगभग छह सप्ताह पांच दिन की गर्भावस्था की पुष्टि हुई।
वहीं नाबालिग बेटी के मेडिकल परीक्षण में किसी प्रकार की शारीरिक चोट नहीं पाई गई। मेडिकल रिपोर्ट और अन्य वैज्ञानिक साक्ष्यों को अदालत ने महत्वपूर्ण माना।
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी
फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा कि पीड़िता, उसकी बेटी और शिकायतकर्ता के बयानों में पूर्ण समानता है और जिरह के दौरान कोई ऐसा विरोधाभास सामने नहीं आया जिससे उनके बयानों पर संदेह किया जा सके।
कोर्ट ने कहा कि यदि दुष्कर्म पीड़िता का बयान विश्वसनीय और भरोसेमंद है तो केवल उसी के आधार पर भी दोषसिद्धि की जा सकती है। अदालत ने यह भी माना कि पीड़िता की गर्भावस्था की अवधि उस समय से मेल खाती है जब वह आरोपी की अवैध हिरासत में थी।
किन धाराओं में हुई सजा?
अदालत ने आरोपी को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत दोषी ठहराया। इनमें अपहरण, अवैध बंधक बनाना, आपराधिक धमकी, दुष्कर्म और जबरन धर्म परिवर्तन से संबंधित अपराध शामिल हैं।
फैसले के बाद अदालत ने आरोपी को बदायूं जेल भेजने के निर्देश दिए हैं। यह निर्णय जिले में धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत सजा का पहला मामला होने के कारण कानूनी और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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