दिल्ली में सीजेपी की अगुवाई में हुए विरोध-प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर कथित बल प्रयोग को लेकर कांग्रेस लगातार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा सरकार पर हमलावर है। इस बीच गुजरात भाजपा के मीडिया विभाग के प्रमुख प्रशांत वाला ने कांग्रेस पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाते हुए 1974 के ऐतिहासिक गुजरात नवनिर्माण आंदोलन की याद दिलाई है।
प्रशांत वाला ने सवाल किया कि छात्र हित, लोकतंत्र और मानवाधिकारों की बात करने वाली कांग्रेस ने क्या कभी नवनिर्माण आंदोलन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई और विद्यार्थियों की मौतों के लिए आत्ममंथन किया है? उन्होंने पूछा कि क्या कांग्रेस या गांधी परिवार ने आंदोलन में जान गंवाने वाले विद्यार्थियों के परिवारों से कभी सार्वजनिक रूप से माफी मांगी?
वाला ने कहा कि लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार है, लेकिन राजनीतिक सुविधा के अनुसार इतिहास को याद करना या भुला देना राजनीतिक ईमानदारी नहीं मानी जा सकती। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस आज छात्र हित की बात कर रही है, लेकिन अपने शासनकाल में हुए छात्र आंदोलन और उस पर की गई कार्रवाई को लेकर जवाब देने से बचती रही है।
कांग्रेस पर छात्रों को गुमराह करने का आरोप
प्रशांत वाला ने कहा कि यदि कोई राजनीतिक दल अपने स्वार्थ के लिए छात्र हित के नाम पर विद्यार्थियों को गुमराह करने की कोशिश करता है, तो जनता का कर्तव्य है कि वह उस दल को उसका अतीत याद दिलाए।
उन्होंने दावा किया कि दिल्ली के जंतर-मंतर की घटना को लेकर कांग्रेस और उसके सहयोगी दल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा भाजपा सरकार के विरुद्ध दुष्प्रचार कर रहे हैं। हालांकि, कांग्रेस को पहले गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन के दौरान हुई घटनाओं पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
वाला के अनुसार, नवनिर्माण आंदोलन में मारे गए विद्यार्थियों के परिजनों से कांग्रेस या गांधी परिवार ने आज तक औपचारिक रूप से माफी नहीं मांगी है। उन्होंने कांग्रेस से पूछा कि जब वह अपने अतीत की घटनाओं की जिम्मेदारी स्वीकार नहीं करती, तो वर्तमान घटनाओं पर नैतिकता का उपदेश किस आधार पर दे रही है?
दिसंबर 1973 में छात्रावास की फीस से शुरू हुआ था आंदोलन
गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन देश के प्रमुख छात्र और जन आंदोलनों में गिना जाता है। इसकी शुरुआत दिसंबर 1973 में मोरबी इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रावास में भोजन शुल्क बढ़ाए जाने के विरोध से हुई थी।
इसके बाद अहमदाबाद के एल.डी. इंजीनियरिंग कॉलेज के विद्यार्थियों ने भी छात्रावास की भोजन फीस में वृद्धि के खिलाफ विरोध शुरू किया। प्रारंभ में आंदोलन विद्यार्थियों की समस्याओं तक सीमित था, लेकिन कुछ ही समय में यह महंगाई, भ्रष्टाचार और कथित कुशासन के खिलाफ व्यापक जन आंदोलन में बदल गया।
उस समय गुजरात में कांग्रेस नेता चिमनभाई पटेल मुख्यमंत्री थे और केंद्र में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार थी। आंदोलन के दौरान राज्य सरकार पर भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलता के गंभीर आरोप लगाए गए।
विद्यार्थियों के साथ व्यापारी और आम नागरिक भी जुड़े
नवनिर्माण आंदोलन को धीरे-धीरे समाज के विभिन्न वर्गों का समर्थन मिलने लगा। विद्यार्थियों के साथ व्यापारी, कर्मचारी, महिलाएं, मध्यम वर्ग और बड़ी संख्या में सामान्य नागरिक भी आंदोलन में शामिल हो गए।
स्कूलों और कॉलेजों को बंद रखने का आह्वान किया गया। कई शहरों में प्रदर्शन हुए और हजारों विद्यार्थी सड़कों पर उतर आए। आंदोलनकारियों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल के इस्तीफे की मांग तेज कर दी।
प्रशांत वाला ने दावा किया कि तत्कालीन शिक्षामंत्री आयशा बेगम ने छात्र आंदोलन को राष्ट्रविरोधी बताया था, जिसके बाद आंदोलन और अधिक उग्र हो गया। विरोध प्रदर्शन अहमदाबाद और वडोदरा सहित गुजरात के लगभग 33 शहरों तक फैल गए।
कई शहरों में लगाया गया था कर्फ्यू
आंदोलन के दौरान अहमदाबाद, वडोदरा और पालनपुर समेत अनेक शहरों में कर्फ्यू लगाया गया। विद्यार्थियों की गिरफ्तारियां की गईं और कई स्थानों पर पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ।
कुछ स्थानों पर छात्राओं ने कांग्रेस कार्यालयों के बाहर चूड़ियां फेंककर विरोध दर्ज कराया। आंदोलनकारियों का कहना था कि सरकार जनता और विद्यार्थियों की मांगों को सुनने के बजाय दमन का रास्ता अपना रही है।
वाला के मुताबिक, आंदोलन की मुख्य मांग तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल का इस्तीफा थी। मुख्यमंत्री द्वारा इस्तीफा नहीं दिए जाने के कारण आंदोलन लगातार व्यापक होता गया।
पुलिस कार्रवाई और गोलीबारी को लेकर कांग्रेस पर निशाना
प्रशांत वाला ने आरोप लगाया कि आंदोलन को नियंत्रित करने के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने बड़े पैमाने पर पुलिस बल का इस्तेमाल किया। कई स्थानों पर लाठीचार्ज, आंसू गैस और गोलीबारी की घटनाएं हुईं। स्थिति को संभालने के लिए सेना की सहायता भी ली गई थी।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस को यह स्पष्ट करना चाहिए कि विद्यार्थियों पर हुई कार्रवाई की राजनीतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी किसकी थी। उन्होंने आंदोलन के दौरान हुई मौतों और गिरफ्तारियों से जुड़े आंकड़ों का उल्लेख करते हुए इसे कांग्रेस शासन का एक काला अध्याय बताया।
प्रशांत वाला द्वारा बताए गए नवनिर्माण आंदोलन के आंकड़े
प्रशांत वाला के बयान के अनुसार:
- नवनिर्माण आंदोलन लगभग 73 दिनों तक चला।
- पुलिस गोलीबारी में 105 विद्यार्थियों की मौत हुई।
- कुल 8,053 लोगों को गिरफ्तार किया गया।
- 184 लोगों को मीसा, यानी MISA, के तहत हिरासत में लिया गया।
- पुलिस ने 1,654 बार लाठीचार्ज किया।
- 4,342 आंसू गैस के गोले छोड़े गए।
- 1,405 राउंड गोलियां चलाई गईं।
- करीब 310 लोग घायल हुए।
वाला ने कहा कि ये आंकड़े उस समय की गंभीर परिस्थितियों और सरकार द्वारा किए गए बल प्रयोग को दर्शाते हैं। उन्होंने दावा किया कि लंबे आंदोलन, व्यापक जनाक्रोश और विद्यार्थियों की मौतों के बाद अंततः चिमनभाई पटेल को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।
कांग्रेस से पूछे गए पांच कड़े सवाल
प्रशांत वाला ने कांग्रेस से पूछा:
- क्या कांग्रेस ने नवनिर्माण आंदोलन में मारे गए विद्यार्थियों के लिए कभी आत्ममंथन किया?
- क्या कांग्रेस ने तत्कालीन पुलिस कार्रवाई को सार्वजनिक रूप से दुर्भाग्यपूर्ण माना?
- क्या कांग्रेस या गांधी परिवार ने पीड़ित परिवारों से कभी माफी मांगी?
- क्या कांग्रेस ने आंदोलन के दौरान हुई मौतों और गिरफ्तारियों की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार की?
- अपने अतीत पर मौन रहने वाली कांग्रेस वर्तमान घटनाओं पर नैतिकता का दावा कैसे कर सकती है?
‘नवनिर्माण के शहीद किसी दल के नहीं, गुजरात के युवा थे’
प्रशांत वाला ने कहा कि नवनिर्माण आंदोलन के दौरान जान गंवाने वाले विद्यार्थी किसी एक राजनीतिक दल के कार्यकर्ता नहीं थे। वे गुजरात के युवा थे, जो भ्रष्टाचार, महंगाई और कथित कुशासन के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर आंदोलन में जान गंवाने वाले विद्यार्थियों को याद किया जाना चाहिए। साथ ही, उस समय सत्ता में रही कांग्रेस को भी इस ऐतिहासिक घटनाक्रम पर अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए।
वाला ने कहा कि छात्र हित और लोकतंत्र पर चर्चा करते समय सभी राजनीतिक दलों को एक समान मापदंड अपनाना चाहिए। किसी वर्तमान घटना पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन अपने राजनीतिक अतीत को नजरअंदाज करके केवल विरोधियों को कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं है।
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