दिल्ली हाईकोर्ट में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर बुधवार को महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ के समक्ष दोनों नेताओं की ओर से पेश वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिका वापस लेने की अनुमति देते समय मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की गई है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रदर्शन करने के अधिकार, कानून-व्यवस्था, शांति बनाए रखने के लिए भरे जाने वाले बॉन्ड और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करना नागरिकों का अधिकार है, लेकिन यदि किसी प्रदर्शन का उद्देश्य सत्ता परिवर्तन है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह प्रक्रिया चुनावों के माध्यम से पूरी होती है।
इस दौरान अदालत ने दोनों नेताओं की उम्र भी पूछी और Gen Z तथा मिलेनियल्स को लेकर टिप्पणी की। वहीं, दिल्ली पुलिस की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने जमानत बॉन्ड के लिए वकीलों को जमानती बनाए जाने पर आपत्ति जताई।
दिल्ली हाईकोर्ट में CJP नेताओं की याचिका वापस, अदालत ने दी अनुमति
कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका ने अपनी न्यायिक हिरासत की अवधि बढ़ाए जाने के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था। दोनों ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) द्वारा जारी आदेश को चुनौती देते हुए तत्काल राहत की मांग की थी।
बुधवार को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत से याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। हाईकोर्ट ने अनुरोध स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने हिरासत की वैधता या मामले के अन्य कानूनी पहलुओं पर कोई अंतिम निष्कर्ष दिया है।
अदालत की अनुमति के बाद याचिका वापस ले ली गई। इसके साथ ही दोनों नेताओं की रिहाई और बॉन्ड से जुड़ी आगे की प्रक्रिया संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष जारी रहने का रास्ता खुला रहा।
जज ने पूछी सौरव दास और आशुतोष रांका की उम्र, Gen Z पर की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने दोनों याचिकाकर्ताओं की उम्र के बारे में जानकारी मांगी। उनके वकील ने अदालत को बताया कि सौरव दास की उम्र 27 वर्ष है, जबकि आशुतोष रांका 31 वर्ष के हैं।
इस पर न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि दोनों Gen Z नहीं हैं। इसके बाद अदालत में Gen Z और मिलेनियल्स की उम्र को लेकर भी चर्चा हुई। यह टिप्पणी उस समय सामने आई, जब अदालत प्रदर्शनकारियों की पहचान, उनकी पृष्ठभूमि और विरोध प्रदर्शन के उद्देश्य से संबंधित सवालों पर विचार कर रही थी।
‘विरोध प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन सत्ता परिवर्तन चुनाव से होता है’ – हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान नागरिकों के विरोध प्रदर्शन के अधिकार को स्वीकार करते हुए सार्वजनिक शांति और कानून-व्यवस्था के महत्व पर भी जोर दिया।
अदालत ने कहा कि विरोध प्रदर्शन करना लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों का अधिकार है। हालांकि, जब किसी मामले में शांति भंग होने की आशंका सामने आती है, तो संबंधित मजिस्ट्रेट को परिस्थितियों का आकलन करना पड़ता है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में यह देखना महत्वपूर्ण हो सकता है कि प्रदर्शन में शामिल लोग कौन हैं, उनका उद्देश्य क्या है और वे किन गतिविधियों से जुड़े हुए हैं।
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि यदि किसी प्रदर्शन का उद्देश्य सरकार या सत्ता में बदलाव लाना है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसा बदलाव चुनावों के माध्यम से होता है। यह टिप्पणी सुनवाई के दौरान की गई थी। इसे विरोध प्रदर्शन के अधिकार पर अदालत के किसी अंतिम कानूनी निर्णय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
बॉन्ड की शर्तों के उल्लंघन पर हाईकोर्ट ने उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने शांति बनाए रखने के लिए भरे गए बॉन्ड की शर्तों और उनके कथित उल्लंघन को लेकर कई सवाल किए। अदालत ने उल्लेख किया कि 11 अक्टूबर को संबंधित बॉन्ड भरा गया था। इसके बाद आरोप लगाया गया कि बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन किया गया। कोर्ट ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन होने पर कार्रवाई की निर्धारित कानूनी प्रक्रिया मौजूद है।
इस प्रक्रिया में जमानती की राशि जब्त करने से पहले संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर देना और यह स्पष्ट करना शामिल हो सकता है कि उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जानी चाहिए। अदालत ने यह संभावना भी जताई कि अधिकारियों ने दोबारा नोटिस जारी करके याचिकाकर्ताओं के प्रति कुछ नरमी बरती हो।
दूसरी बार बॉन्ड तोड़ने पर सख्त शर्तें क्यों नहीं? अदालत का सवाल
दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी पूछा कि यदि कोई व्यक्ति दूसरी बार बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन करता है, तो क्या संबंधित अधिकारियों को उससे अधिक कठोर शर्तों पर नया बॉन्ड भरवाने का अधिकार नहीं होना चाहिए? अदालत ने याचिकाकर्ताओं के वकील से मामले की वर्तमान स्थिति के बारे में जानकारी मांगी।
इसके बाद कोर्ट ने सुझाव दिया कि दोनों नेता अपनी याचिका वापस लेकर संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष होने वाली सुनवाई का इंतजार कर सकते हैं। हाईकोर्ट ने वकील को आगाह करते हुए कहा कि वे अदालत को ऐसी कानूनी बहस में उलझा रहे हैं, जिसका परिणाम जरूरी नहीं कि उनके पक्ष में ही आए।
दिल्ली पुलिस ने जमानती बनाए जाने पर जताई आपत्ति
दिल्ली पुलिस की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने जमानत बॉन्ड के लिए वकीलों को जमानती बनाए जाने पर आपत्ति जताई। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पूछा कि क्या जमानत के लिए प्रस्तुत जमानती को अस्वीकार करने वाले आदेश के खिलाफ अपील की जा सकती है।
इस पर याचिकाकर्ताओं के वकील ने बताया कि ऐसे आदेश को चुनौती देने का कानूनी विकल्प उपलब्ध है। इसके बाद अदालत ने सवाल उठाया कि जब वैकल्पिक कानूनी उपाय मौजूद है, तो संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत सीधे हाईकोर्ट में याचिका क्यों दाखिल की गई। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या दोनों याचिकाकर्ता आवश्यक दो जमानती प्रस्तुत नहीं कर सकते।
SEM कोर्ट में पेशी, मुंबई पुलिस नहीं बल्कि दिल्ली पुलिस से जुड़ा मामला
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत को बताया कि पुलिस ने दोनों नेताओं की हिरासत बढ़ाने की मांग को लेकर एक और आवेदन दाखिल किया है। इस पर हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस के वकील से पूछा कि संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष पुलिस किस प्रकार की राहत मांगने वाली है।
दिल्ली पुलिस की ओर से बताया गया कि न्यायिक हिरासत की अवधि पूरी होने के बाद दोनों को अदालत के समक्ष पेश किया जाएगा और उनसे जमानत के लिए आवश्यक जमानती प्रस्तुत करने को कहा गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, सौरव दास और आशुतोष रांका को दोपहर दो बजे मंदिर मार्ग स्थित विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया जाना था।
जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़ा है पूरा विवाद
सौरव दास और आशुतोष रांका के खिलाफ कार्रवाई का मामला दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है। पुलिस के अनुसार, प्रदर्शन के लिए निर्धारित पाबंदियों और शांति बनाए रखने से संबंधित शर्तों के कथित उल्लंघन के बाद दोनों नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की गई। इसके बाद विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष मामले की सुनवाई हुई और दोनों को न्यायिक हिरासत में भेजा गया।
बाद में न्यायिक हिरासत की अवधि बढ़ाए जाने के आदेश को लेकर विवाद शुरू हुआ। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि उन्हें कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना हिरासत में रखा जा रहा है।
न्यायिक हिरासत बढ़ाने के आदेश को दी थी चुनौती
प्राप्त विवरण के अनुसार, दोनों नेताओं को अक्टूबर के मध्य में शुरुआती तौर पर पांच दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजा गया था। इसके बाद मंदिर मार्ग पुलिस थाने में नियुक्त विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने दोनों की न्यायिक हिरासत दो दिन और बढ़ाने का आदेश दिया। इसी आदेश को चुनौती देते हुए सौरव दास और आशुतोष रांका ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।
दोनों ने अपनी याचिका में कहा कि हिरासत बढ़ाने का आदेश कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है और इससे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन होता है। याचिकाकर्ताओं ने इस आदेश को अवैध और मनमाना बताते हुए रद्द करने की मांग की थी।
जमानत प्रक्रिया में जानबूझकर देरी करने का CJP का आरोप
कॉकरोच जनता पार्टी ने आरोप लगाया कि सौरव दास और आशुतोष रांका की रिहाई रोकने के उद्देश्य से जमानत की प्रक्रिया में जानबूझकर देरी की जा रही है। पार्टी का दावा था कि आवश्यक जमानती कई बार प्रस्तुत किए जाने के बावजूद दोनों नेताओं को हिरासत में रखा गया। याचिकाकर्ताओं ने अदालत में तर्क दिया कि इस प्रकार हिरासत जारी रखना व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार के खिलाफ है।
AISA अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका पर 22 अक्टूबर को सुनवाई
दिल्ली हाईकोर्ट में इस विवाद से संबंधित एक अन्य मामले की भी सुनवाई निर्धारित है। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से जारी नोटिस को चुनौती दी है। नोटिस में उन्हें शांति बनाए रखने के लिए ₹10,000 का बॉन्ड भरने और जमानती प्रस्तुत करने को कहा गया था।
नेहा बोरा ने इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, उनकी याचिका पर 22 अक्टूबर 2026 को सुनवाई निर्धारित की गई है।
अनुच्छेद 21 और 226 को लेकर अदालत में हुई कानूनी चर्चा
इस मामले में भारतीय संविधान के दो महत्वपूर्ण अनुच्छेद भी चर्चा के केंद्र में रहे। संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा प्रदान करता है। इसके तहत किसी व्यक्ति को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा उसकी स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता।
वहीं, अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को मौलिक अधिकारों और अन्य कानूनी अधिकारों के संरक्षण के लिए उपयुक्त आदेश तथा रिट जारी करने की शक्ति देता है।
हालांकि, जब किसी विवाद में वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध होते हैं, तो अदालतें मामले की परिस्थितियों के आधार पर यह विचार कर सकती हैं कि सीधे रिट याचिका पर सुनवाई करना उचित है या नहीं। सौरव दास और आशुतोष रांका के मामले में भी हाईकोर्ट ने इसी पहलू पर सवाल उठाए।
दिल्ली हाईकोर्ट की सुनवाई के बाद अब SEM कोर्ट की कार्यवाही महत्वपूर्ण
दिल्ली हाईकोर्ट से याचिका वापस लेने की अनुमति मिलने के बाद सौरव दास और आशुतोष रांका के मामले में आगे की कानूनी कार्यवाही विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष महत्वपूर्ण होगी। इस मामले में बॉन्ड की शर्तों, जमानतदारों की स्वीकार्यता और हिरासत से संबंधित कानूनी प्रक्रियाओं पर आगे निर्णय लिया जाना है।
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