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राष्ट्रीय शिक्षा नीति का कार्यान्वयन: टूटेगा अंग्रेजी का वर्चस्व – दलित, आदिवासी, पिछड़े, महिलाओं के लिए नई संभावनाओं का द्वार

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में क्षेत्रीय भाषा या मातृभाषा को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ स्थानीय भाषा अब शिक्षण का माध्यम। इससे दलित, आदिवासी, पिछड़े और महिलाओं के लिए खुल रहे नई संभावनाओं के द्वार।

Last updated: 2023/11/28 at 11:11 AM
One India News Team
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नई शिक्षा नीति 1968 और 1986 का लक्ष्य शिक्षा के क्षेत्र में समता और समानता को बढ़ावा देना था। शिक्षा नीति 1968 में जहाँ शैक्षिक ढाँचे में सुधार पर जोर था; वहीं 1986 की शिक्षा नीति में शैक्षिक असमानताओं का उन्मूलन चिंता के केंद्र में था। इसके विपरीत नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP: National Education Policy) अधुनातन शैक्षिक साधनों और नवोन्मेष के माध्यम से समानता और समावेशन को बढ़ावा देती है।

जुलाई 2020 से लागू की गई नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति मुख्यतः उच्च शिक्षण संस्थानों में महत्वपूर्ण सुधारों और विनियमन ढाँचे के सरलीकरण की बात करती है। यह सार्वजनिक और निजी संस्थाओं के लिए एक समान, संतुलित एवं संवेदनशील नियमन की प्रस्तावना करने के साथ-साथ शिक्षा क्षेत्र में लाभरहित निजी भागीदारी को भी प्रोत्साहन देती है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य के प्रति समर्पित है। समृद्ध और उन्नत भारतीय ज्ञान परंपरा की सूक्ष्म समझ, गाँधीजी एवं पंडित दीनदयाल उपाध्याय के दृष्टिकोण से प्रेरित एवं आत्मनिर्भर भारत की आकांक्षा से लैस यह शिक्षा नीति विविध शिक्षण-अधिगम सिद्धांतों का सामंजस्यपूर्ण समावेशन है। जीवनोपयोगी सैद्धांतिक ज्ञान को अपनाते हुए सामाजिक मूल्यों के साथ बहुभाषावाद को प्रतिष्ठापित करती है। इसने पिछले तीन वर्षों में एक उल्लेखनीय परिवर्तन की पीठिका तैयार करते हुए उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार और पुनरुद्धार की शुरुआत की है।

इसके अंतर्गत पिछले तीन वर्षों में निम्न आवश्यक तत्वों पर ध्यान दिया गया है:

  • हर विद्यार्थी के लिए निष्पक्ष एवं समावेशी शैक्षिक वातावरण का निर्माण।
  • एक बहुमुखी बुनियादी शैक्षिक ढाँचे का निर्माण जो प्रत्येक छात्र के हितों, आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को पूरा करते हुए सर्वसुलभ भी है।
  • महाविद्यालाओं और विश्वविद्यालयों की ढाँचागत क्षमता को क्रमशः विकसित किया जा रहा है।
  • विनियमन व्यवस्था में संगठनात्मक परिवर्तन करते हुए एकीकृत उपक्रम बनाया जा रहा है। उच्च शिक्षा आयोग और राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन ऐसी ही पहल है।
  • एक व्यापक, संस्कारपरक, कौशल आधारित और अंतःविषयी (इंटरडिसिप्लिनरी) शिक्षा प्रदान की जा रही है।
  • बहुभाषावाद को प्रोत्साहित करते हुए मातृभाषा विशेष रूप से भारतीय भाषाओं में शिक्षण-अधिगम क्रिया को संचालित किया जा रहा है। अभियांत्रिकी , चिकित्सा और प्रबंधन जैसे विषयों की पाठ्य-सामग्री हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में तैयार की जा रही है।
  • शिक्षकों को निरन्तर प्रेरित और प्रोत्साहित करने के लिए समयबद्ध नियुक्ति और प्रोन्नति की जा रही है।
  • व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा देने के नए व्यावसायिक संस्थान खोलने पर विशेष बल दिया जा रहा है। चिकित्सा शिक्षा संस्थान इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं।
  • राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन के लिए 50000 करोड़ की राशि आवंटित की गई है। इसके माध्यम से गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान को प्रोत्साहन देना और शोध को समाज और उद्योग जगत से प्रत्यक्षतः जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
  • गुणवत्तापूर्ण दूरस्थ और मुक्त शिक्षा को बढ़ावा देते हुए सकल नामांकन अनुपात (GER) को निरन्तर बढ़ाया जा रहा है।
  • सकल घरेलू उत्पादन का 6% शिक्षा पर व्यय करने की दिशा में भी विचार-विमर्श हो रहा है। भारत का आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरना और GST कर की निरन्तर बढ़ती राशि ने आशान्वित किया है कि भारत सरकार शिक्षा बजट बढ़ाकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लिए आवश्यक भौतिक ढाँचा तैयार करेगी।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू होने के परिणामस्वरूप समावेशी शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई तरह के प्रयास किये जा रहे हैं, जैसे- अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट (ABC), जिसमें उच्च शिक्षा संस्थान (HEIs) छात्रों द्वारा प्राप्त क्रेडिट्स को डिजिटल रूप में जमा कर रहे हैं। छात्र त्रिवर्षीय ऑनर्स प्रोग्राम या चतुर्वर्षीय ऑनर्स प्रोग्राम, अनुसन्धान के साथ चतुर्वर्षीय ऑनर्स प्रोग्राम का चयन कर रहे हैं।

ऑनर्स प्रोग्राम के चयन के साथ ही, छात्र प्रोग्राम के किसी भी वर्ष में प्रवेश ले या छोड़ सकते हैं। उन्हें अध्ययन अवधि के अनुसार प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। अब उनका समय, श्रम और संसाधन निष्फल नहीं जाएगा। उच्च शिक्षा में बहु-प्रवेश और निकास प्रणाली के साथ-साथ बहुविषयक पठन-पाठन भी अकादमिक बैंक ऑफ़ क्रेडिट (ABC) के माध्यम से पूरा किया जा रहा है।

भारत सरकार शिक्षा के माध्यम के साथ-साथ भारतीय भाषा, कला और संस्कृति को प्रोत्साहन दे रही है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति इसे संभव कर रही है। इसके अंतर्गत कई उच्च शिक्षण संस्थान क्षेत्रीय भाषा या मातृभाषा को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ स्थानीय भाषा को शिक्षण का माध्यम बना रहे हैं। इससे वंचित वर्ग- दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यक और महिलाओं के लिए नई संभावनाओं के द्वार खुल रहे हैं।

अध्ययन-अध्यापन में अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व ने इन वर्गों की वंचना को कई गुना बढ़ाते हुए उसे स्थायित्व प्रदान किया है। औपनिवेशिक पाठ्यचर्या ने भारतीय मेधा को कुंठित करते हुए अपनी जड़ों से काट डाला है। अब स्थानीयता और अंतरराष्ट्रीयता का समन्वयन करते हुए जिम्मेदार और जागरूक नागरिक बनाने पर जोर दिया जा रहा है।

प्रतिभा पलायन और पूँजी प्रवाह को रोकने के लिए नामी-गिरामी विदेशी विश्वविद्यालयों के परिसर भारत में खोले जा रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया ने इस दिशा में काम शुरू कर दिया है।

सभी वर्गों को समान अवसर प्रदान करने के लिए वित्तीय सहायता, विशेष ऋण, छात्रवृत्तियाँ और पुरस्कार आदि सुनिश्चित किए गए हैं। शिक्षकों को अपनी शिक्षण विधियों को बेहतर बनाने के लिए निरंतर प्रशिक्षण और प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

सूचना-तकनीक यंत्रों और माध्यमों से शिक्षण और अधिगम प्रक्रिया को अधिक प्रभावी, समावेशी और सरल बनाया जा रहा है। नवाचार और नवोन्मेष शिक्षा परिदृश्य का वर्तमान है। आज राष्ट्रीय शिक्षा नीति के आलोक में प्रत्येक कक्षाकक्ष वह सुन्दर उपवन है, जहाँ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की रोशनी में क्षमता, प्रतिभा, आकांक्षा और संभावना के बहुरंगी फूल खिल रहे हैं।

भारत के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में से एक, दिल्ली विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (एनईपी) के कार्यान्वयन में अग्रणी भूमिका है। यह कई अंतरराष्ट्रीय समझौता ज्ञापनों, सहयोगी सम्बन्धों को धरातल पर उतार रहा है। यह वसुधैव कुटुंबकम् की भावना के साथ-साथ सर्वजनीनता और सार्वभौमिकता को साकार करने की दिशा में निर्णायक पहल कर रहा है। विश्व के प्रमुख विश्वविद्यालयों के साथ की जा रही रणनीतिक साझेदारियाँ पारस्परिक आदान-प्रदान के साथ-साथ शिक्षण परिदृश्य को गतिशील और समृद्ध बना रही हैं।

देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति की भावना के अनुरूप पाठ्यक्रमों में आधारभूत परिवर्तन और विषयों के चयन में लचीलापन, बहुविषयकता, गुणवत्तापूर्ण शोध और नवाचार, कॉलेजों की स्वायत्तता और शिक्षक प्रशिक्षण आदि को अपनाया है। सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों और अनेक राज्य विश्वविद्यालयों ने अपने स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों को सीबीसीएस (CBCS: Choice Based Credit System) और एलओसीएफ (LOCF: Learning Outcomes-based Curriculum Framework) फ्रेमवर्क के अंतर्गत परिवर्तित करते हुए अधुनातन कर लिया है।

सीबीसीएस और एलओसीएफ प्रणाली छात्रों को अपने पसंदीदा पाठ्यक्रम चुनने और बुनने की स्वतंत्रता प्रदान करती है। पाठ्यक्रमों के अलावा शिक्षण प्रविधियों और पद्धतियों में भी निर्णायक बदलाव हुए हैं। ये बदलाव यूजीसीएफ पाठ्यक्रम 2022 (UGCF: Undergraduate Curriculum Framework 2022) के अनुरूप हैं। इसका उद्देश्य समग्र शिक्षा सुनिश्चित करना है। यह बदलाव छात्रों के करियर लक्ष्यों के अनुसार कौशल विकास और संस्कार निर्माण में सहयोगी सिद्ध होगा।

बहुविषयक और अंतरविषयक अनुसंधान और पठन-पाठन को प्रोत्साहन देने के लिए अनेक विश्वविद्यालयों ने कई बहुविषयक कार्यक्रमों की शुरुआत की है, जैसे बी.ए (ऑनर्स) इन लिबरल आर्ट्स और एम.ए. इन इंटरडिस्प्लिनरी स्टडीज़। यह कार्यक्रम छात्रों को विभिन्न विषयों का अध्ययन एक साथ करने की अनुमति देते हैं। साथ ही, विचार-विमर्श, समस्या-समाधान क्षमता और संवाद कौशल विकसित करने के उद्देश्य से डिज़ाइन किए गए हैं। ये 21वीं सदी की आवश्यकताओं और चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए बनाए गए हैं।

विश्वविद्यालयों में इन्नोवेशन सेंटर, इन्क्यूबेशन सेंटर, स्टार्ट-अप फंड, उद्यमोदय फाउंडेशन, विश्वविद्यालय फाउंडेशन और रिसर्च पार्क आदि की स्थापना जैसी महत्वपूर्ण पहल की जा रही है।

निष्कर्षतः पिछले तीन वर्षों में देश के उच्च शिक्षा तंत्र में महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है। इन बदलावों ने उच्च शिक्षा प्रणाली को अधिक छात्र-केंद्रित, शोध-केंद्रित एवं नवाचारी बना दिया है। साथ ही, कई विश्वविद्यालयों को विश्वस्तरीय शैक्षिक प्रतिष्ठा की प्राप्ति हेतु प्रतिस्पर्धी बना दिया है। लेकिन इस लक्ष्य की प्राप्ति और राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के कार्यान्वयन की सबसे बड़ी बाधा आर्थिक संसाधनों और ढाँचागत सुविधाओं का अभाव है। सरकार को शिक्षा में निवेश बढ़ाना चाहिए। ऐसा करके ही भारत को एक ज्ञान अर्थ-व्यवस्था (विश्वगुरु) और विश्व शक्ति बनाया जा सकता है।

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