तेलंगाना के श्रीशैलम लेफ्ट बैंक कैनाल (SLBC) सुरंग में फंसे 8 श्रमिकों को बचाने का अभियान उत्तराखंड के सिल्कयारा सुरंग हादसे से भी अधिक चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। बचाव कार्य में जुटे विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार स्थिति और कठिन है, क्योंकि सुरंग में लगातार पानी और कीचड़ भर रहा है, जिससे राहत कार्य धीमा हो गया है।
उत्तरकाशी के सिल्कयारा सुरंग हादसे में 17 दिनों तक चले ऑपरेशन के दौरान फंसे श्रमिकों की आवाजें सुनी जा सकती थीं, लेकिन तेलंगाना में फंसे मजदूरों से कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है, जिससे उनकी स्थिति को लेकर चिंता बढ़ गई है। बचाव कार्य में जुटे विशेषज्ञों के अनुसार, इस बार सुरंग केवल 33 फीट चौड़ी है और भूस्खलन की संभावना बनी हुई है।
बचाव दल में शामिल शशी भूषण चौहान, जो सिल्कयारा बचाव अभियान में भी शामिल थे, ने कहा कि वहां टीमवर्क और सुनाई देने वाली आवाजों से बचाव अभियान को दिशा मिल रही थी, लेकिन यहां स्थिति अलग है—न कोई आवाज, न संकेत। इससे स्थिति अधिक जटिल हो गई है।
इसके अलावा, जिस मशीन का उपयोग सिल्कयारा में किया गया था, उसे यहां इस्तेमाल नहीं किया जा सकता क्योंकि पानी और कीचड़ लगातार बाधा बन रहे हैं। पानी निकालने के बावजूद नया पानी भर जाता है, और कीचड़ हटाने पर फिर से जमा हो जाता है। बचाव कर्मियों के अनुसार, हर कदम आगे बढ़ाने पर वे फिर से पहले जैसी स्थिति में पहुंच जाते हैं, जिससे ऑपरेशन और मुश्किल हो रहा है।
मुख्य चुनौतियाँ:
- संक्रमण की कमी: उत्तरकाशी में फंसे श्रमिकों से आवाज के माध्यम से संपर्क बना हुआ था, जिससे उम्मीद बनी रही थी, लेकिन एसएलबीसी सुरंग में कोई संकेत नहीं मिल रहा है।
- संकीर्ण मार्ग: यह सुरंग केवल 33 फीट चौड़ी है, जिससे खुदाई और बचाव कार्य सीमित हो जाता है।
- पानी और कीचड़: लगातार पानी और कीचड़ भरने के कारण बचाव दल की हर कोशिश मुश्किल होती जा रही है।
- भूगर्भीय अस्थिरता: मिट्टी की अनिश्चित प्रकृति के कारण पारंपरिक मशीनों का उपयोग संभव नहीं हो पा रहा है।
बचावकर्मियों का कहना है कि वे सिल्कयारा जैसी टीम भावना और समर्पण के साथ काम कर रहे हैं, लेकिन इस बार स्थिति और जटिल है। सरकार और स्थानीय प्रशासन इस अभियान को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं, जबकि पूरे देश की निगाहें इस ऑपरेशन पर टिकी हुई हैं।