भारतीय शेयर बाजार ने नए वित्त वर्ष 2025-26 की शुरुआत कमजोर प्रदर्शन के साथ की। मंगलवार, 1 अप्रैल को, बीएसई सेंसेक्स 532.34 अंकों की गिरावट के साथ 76,882.58 पर खुला, जबकि एनएसई निफ्टी 178.25 अंकों की गिरावट के साथ 23,341.10 पर खुला। पिछले हफ्ते शुक्रवार, 28 मार्च को, सेंसेक्स 191.51 अंकों की गिरावट के साथ 77,414.92 पर और निफ्टी 72.60 अंकों की गिरावट के साथ 23,519.35 पर बंद हुआ था。
आज के शुरुआती कारोबार में, सेंसेक्स की 30 में से 20 कंपनियों के शेयर लाल निशान में थे, जबकि निफ्टी 50 की 50 में से 24 कंपनियों के शेयर गिरावट के साथ कारोबार कर रहे थे। विशेष रूप से, इंफोसिस के शेयरों में 2.03% की गिरावट देखी गई, जबकि पावर ग्रिड के शेयरों में 1.58% की बढ़त दर्ज की गई。
इस गिरावट का मुख्य कारण अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा घोषित संभावित टैरिफ को लेकर वैश्विक बाजारों में उत्पन्न चिंता है। विशेष रूप से आईटी कंपनियों के शेयरों पर इसका प्रभाव पड़ा है, क्योंकि उनकी आय का एक बड़ा हिस्सा अमेरिकी बाजार से आता है.
Nifty, Sensex open with big dips in anticipation of Trump's tariff announcement on April 2nd
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— ANI Digital (@ani_digital) April 1, 2025
भारतीय शेयर बाजार की इस कमजोर शुरुआत के पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं। कुछ मुख्य कारणों में शामिल हो सकते हैं:
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वैश्विक बाजारों का प्रभाव – अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कमजोरी का असर भारतीय बाजार पर भी देखने को मिल सकता है। अगर अमेरिकी और एशियाई बाजारों में गिरावट रही हो, तो भारतीय निवेशकों का मनोबल भी प्रभावित हो सकता है।
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ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता – अमेरिकी फेडरल रिजर्व और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की आगामी नीतिगत बैठकें निवेशकों की धारणा को प्रभावित कर सकती हैं, खासकर अगर ब्याज दरों में कटौती को लेकर अनिश्चितता बनी हुई हो।
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मुनाफावसूली (Profit Booking) – वित्त वर्ष के अंत में निवेशक आमतौर पर अपने मुनाफे को बुक करने के लिए बड़े पैमाने पर शेयरों की बिक्री करते हैं, जिससे बाजार में गिरावट आ सकती है।
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आईटी और बैंकिंग सेक्टर में गिरावट – इंफोसिस, टीसीएस, एचडीएफसी बैंक जैसी बड़ी कंपनियों के शेयरों में गिरावट बाजार को कमजोर कर सकती है, क्योंकि ये सेंसेक्स और निफ्टी दोनों में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखती हैं।
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चुनावी अनिश्चितता – भारत में लोकसभा चुनाव 2024 के कारण राजनीतिक अस्थिरता और नीतिगत स्पष्टता की कमी भी निवेशकों की धारणा को प्रभावित कर सकती है।