राज्यसभा में गुरुवार देर रात दो बड़े फैसले हुए—एक, वक्फ संशोधन विधेयक पारित हुआ, और दूसरा, मणिपुर में राष्ट्रपति शासन की पुष्टि करने वाला सांविधिक संकल्प पास किया गया। ये दोनों ही फैसले राजनीतिक और संवैधानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
मणिपुर में राष्ट्रपति शासन की पुष्टि: मुख्य बातें
राज्यसभा में संकल्प पारित
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गृह मंत्री अमित शाह ने मणिपुर पर सांविधिक संकल्प सदन में पेश किया, जिसे शुक्रवार तड़के 4 बजे ध्वनिमत से पारित कर दिया गया।
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इससे पहले यह लोकसभा में भी पारित हो चुका था।
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मणिपुर में 13 फरवरी 2025 से राष्ट्रपति शासन लागू है।
गृह मंत्री अमित शाह के बयान के मुख्य अंश
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राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा मणिपुर के मुख्यमंत्री के इस्तीफे और सरकार न बना पाने की स्थिति के बाद की गई।
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260 लोगों की मौत को स्वीकार किया, लेकिन कहा कि पिछले 4 महीने से कोई मौत नहीं हुई—यानी अब हालात नियंत्रण में हैं।
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हिंसा की जड़ एक अदालती आदेश को बताया गया जिसमें एक समुदाय को आरक्षण मिला था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बाद में रोक दिया।
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शांति, पुनर्वास और संवाद को प्राथमिकता देने की बात दोहराई।
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विपक्ष से आग्रह किया कि इस मुद्दे पर राजनीति न करें, बल्कि समाधान में सहयोग करें।
विपक्ष का तीखा हमला: मल्लिकार्जुन खरगे
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प्रधानमंत्री के मणिपुर न जाने को लेकर सवाल उठाया।
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कहा, डबल इंजन सरकार पूरी तरह विफल हुई है।
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हिंसा की जांच और श्वेत पत्र की मांग की।
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मुख्यमंत्री के इस्तीफे को दबाव की राजनीति का नतीजा बताया।
वक्फ संशोधन विधेयक भी पास
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इस विधेयक के जरिए वक्फ संपत्तियों से संबंधित नियमों में बदलाव किया गया है।
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यह कदम वक्फ बोर्ड की भूमिका, नियंत्रण और पारदर्शिता से जुड़ा है।
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बिल को पहले ही लोकसभा में मंजूरी मिल चुकी थी।
विश्लेषण
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मणिपुर का मुद्दा सिर्फ एक राज्य की कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि जातीय संतुलन, संवैधानिक प्रक्रिया और राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ा विषय है।
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राष्ट्रपति शासन की संवैधानिक पुष्टि आवश्यक थी क्योंकि यह दो महीने के अंदर संसद से अनुमोदन की शर्त के तहत आता है (अनुच्छेद 356 के तहत)।
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विपक्ष के हमले और सरकार की सफाई दोनों से यह स्पष्ट है कि यह मामला आने वाले समय में संसद से लेकर सड़क तक चर्चा में बना रहेगा।