सांस्कृतिक विरासत केवल कला या संग्रहालयों में सजी वस्तुएँ नहीं होती, बल्कि वह किसी देश के इतिहास, धर्म और पहचान की जीवित अभिव्यक्ति होती है। दशकों से तमिलनाडु के प्राचीन मंदिरों से चोरी हुई पवित्र कांस्य मूर्तियों की कहानी इस बात की याद दिलाती रही है कि कला और आस्था के प्रतीकों की अवैध तस्करी कितनी गंभीर वैश्विक समस्या है। इसी क्रम में अमेरिका के वाशिंगटन स्थित स्मिथसोनियन नेशनल म्यूजियम ऑफ एशियन आर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए भारत सरकार को तीन दक्षिण भारतीय कांस्य मूर्तियाँ लौटाने की घोषणा की है।
ये मूर्तियाँ—शिव नटराज, सोमस्कंद और संत सुंदरार विद परवई—तमिलनाडु के मंदिरों से दशकों पहले अवैध रूप से हटाई गई थीं और बाद में अंतरराष्ट्रीय कला बाजार के ज़रिये अमेरिका पहुँचीं। स्मिथसोनियन का यह कदम न सिर्फ भारत की सांस्कृतिक धरोहर की वापसी की दिशा में अहम माना जा रहा है, बल्कि दुनिया भर में लूटी गई विरासत को उनके मूल देशों तक लौटाने की वैश्विक मुहिम को भी मज़बूती देता है।
जिन तीन मूर्तियों की पहचान की गई है, वे दक्षिण भारतीय कांस्य कला की उत्कृष्ट मिसाल हैं। इनमें चोल काल की प्रसिद्ध ‘शिव नटराज’ प्रतिमा शामिल है, जो लगभग 990 ईस्वी की मानी जाती है। संग्रहालय के निदेशक चेस एफ. रॉबिन्सन के अनुसार, यह प्रतिमा तंजावुर ज़िले के श्री भाव औषधेश्वर मंदिर से जुड़ी थी, जहाँ इसकी तस्वीर 1957 में ली गई थी। बाद में वर्ष 2002 में न्यूयॉर्क स्थित डोरिस वीनर गैलरी के माध्यम से इसे संग्रहालय ने अधिग्रहित किया।
दूसरी प्रतिमा ‘सोमस्कंद’ है, जो 12वीं शताब्दी की चोलकालीन कृति है और इसमें शिव को पार्वती के साथ दर्शाया गया है। शोध में पुष्टि हुई कि इस मूर्ति की तस्वीर 1959 में थिरुवारूर ज़िले के अलत्तूर गाँव के विश्वनाथ मंदिर में ली गई थी। तीसरी प्रतिमा ‘संत सुंदरार विद परवई’ विजयनगर काल की 16वीं शताब्दी की है, जिसकी तस्वीर 1956 में वीरसोलापुरम गाँव के एक शिव मंदिर में दर्ज की गई थी।
ये तीनों मूर्तियाँ केवल कलात्मक धरोहर नहीं थीं, बल्कि मंदिरों में पूजनीय और पवित्र प्रतिमाएँ थीं, जिन्हें धार्मिक उत्सवों के दौरान बाहर निकाला जाता था। इसलिए इनका मंदिरों से चोरी होना धार्मिक और सांस्कृतिक—दोनों दृष्टियों से गंभीर अपराध माना जाता है। संग्रहालय अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि जब ये मूर्तियाँ हटाई गईं, उस समय भी भारत में पुरावशेष संरक्षण कानून लागू थे, यानी इनका निर्यात और बिक्री पहले से ही अवैध थी।
जाँच में सामने आया कि मूर्तियों को चोरी-छिपे अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुँचाया गया और फर्जी दस्तावेजों के सहारे निजी कलेक्शनों व संग्रहालयों में शामिल किया गया। शिव नटराज को 2002 में खरीदा गया, जबकि सोमस्कंद और संत सुंदरार विद परवई 1987 में आर्थर एम. सैकलर द्वारा दान किए गए संग्रह के साथ संग्रहालय पहुँची थीं। इन सभी मामलों में विस्तृत प्रोवेनेंस रिसर्च की गई, जिसमें अधिग्रहण रिकॉर्ड, लेन-देन का इतिहास, शिपिंग और कस्टम दस्तावेज, पुरानी तस्वीरें और संग्रहालय अभिलेखों की गहन समीक्षा की गई।
The National Museum of Asian Art is returning three bronzes to the Indian government after extensive provenance research indicated that the objects were removed from their original sites illegally. https://t.co/Q71IViyLXI pic.twitter.com/uFOPUsGPE2
— The Washington Post (@washingtonpost) January 29, 2026
इस प्रक्रिया में कई गंभीर ‘रेड फ्लैग’ सामने आए, जैसे 1973 से पहले मूर्तियों का स्पष्ट इतिहास न होना, अधिग्रहण की तारीखों में हेरफेर और कुछ कस्टम दस्तावेजों में मूर्ति का स्रोत ‘थाईलैंड’ तक लिखा जाना। वर्ष 2023 में स्मिथसोनियन ने फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ पांडिचेरी के फोटो आर्काइव्स के साथ मिलकर काम किया, जहाँ से पुष्टि हुई कि ये मूर्तियाँ 1956 से 1959 के बीच तमिलनाडु के सक्रिय मंदिरों में मौजूद थीं।
इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इन निष्कर्षों की समीक्षा कर आधिकारिक रूप से माना कि मूर्तियों को भारतीय कानूनों का उल्लंघन करते हुए हटाया गया था। इसी आधार पर स्मिथसोनियन ने इन्हें भारत लौटाने का निर्णय लिया। हालाँकि, इनमें से ‘शिव नटराज’ प्रतिमा को एक विशेष समझौते के तहत दीर्घकालिक ऋण पर संग्रहालय में प्रदर्शित रहने की अनुमति दी गई है, ताकि इसकी पूरी कहानी—मंदिर से चोरी, अवैध तस्करी और भारत वापसी—दुनिया के सामने रखी जा सके।
यह प्रतिमा संग्रहालय की प्रदर्शनी ‘The Art of Knowing in South Asia, Southeast Asia, and the Himalayas’ में प्रदर्शित रहेगी। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि मंदिर की मूर्तियाँ पवित्र और अविभाज्य संपत्ति होती हैं, इसलिए उन्हें लोन पर रखना कानूनी और नैतिक रूप से विवादास्पद है।
इसी दिन अमेरिका में सांस्कृतिक तस्करी के खिलाफ कार्रवाई भी तेज हुई। अमेरिकी आव्रजन और सीमा शुल्क प्रवर्तन (ICE) ने ‘ऑपरेशन हिडन आइडल’ के तहत कई भारतीय कांस्य मूर्तियाँ जब्त कीं, जिनमें 14वीं शताब्दी की पार्वती प्रतिमा और तमिलनाडु की चार अन्य मूर्तियाँ शामिल थीं। इनकी कुल अनुमानित कीमत 5 मिलियन डॉलर से अधिक बताई गई है।
अमेरिकी एजेंसियों ने इन मामलों को कथित तस्कर सुभाष कपूर के नेटवर्क से जोड़ा है, जिस पर 100 मिलियन डॉलर से अधिक की सांस्कृतिक संपत्ति की तस्करी का आरोप है। 2011 में उसकी गिरफ्तारी और 2012 में भारत प्रत्यर्पण के बाद से इस नेटवर्क पर कई खुलासे हुए हैं।
अमेरिका ने 2007 से अब तक 24 देशों को 6,600 से अधिक कलाकृतियाँ लौटाने में मदद की है। तमिलनाडु पुलिस की आइडल विंग–CID ने इस वापसी को बड़ी उपलब्धि बताया है। पूर्व डीजीपी के. जयनथ मुरली के अनुसार, यह भारत की MLAT आधारित रणनीति की सफलता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार लंबे समय से मंदिरों और पुरातात्विक स्थलों से चोरी हुई मूर्तियों की वापसी के प्रयास कर रही है। 2014 के बाद से अब तक 640 से अधिक चोरी की गई धरोहरें भारत वापस लाई जा चुकी हैं। स्मिथसोनियन का यह फैसला उसी दिशा में एक बड़ी कड़ी है, जो यह संदेश देता है कि अब संग्रहालयों को अपनी नैतिक जिम्मेदारी और पारदर्शिता निभानी होगी।
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