Allahabad High Court ने एक महत्वपूर्ण फैसले में बांदा की फैमिली कोर्ट द्वारा मुस्लिम महिला को दिया गया तलाक रद्द कर दिया है। कोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने अपने निर्णय में ऐसे कानून का हवाला दिया, जो भारतीय कानून में अस्तित्व में ही नहीं है।
यह मामला ‘हाफिज बनाम परवीन खातून’ से जुड़ा है, जिसमें हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को कानून और तथ्यों दोनों के आधार पर गलत ठहराया।
गैर-मौजूद कानून पर फैसला, हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
बांदा फैमिली कोर्ट ने 28 जनवरी को अपने आदेश में कहा था कि निकाह ‘मुस्लिम स्त्री विवाह विच्छेद अधिनियम, 1986’ के तहत समाप्त हो गया है। हालांकि Allahabad High Court की बेंच, जिसमें Justice Atul Sreedharan और Justice Vivek Saran शामिल थे, ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई कानून भारत में मौजूद ही नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि संभवतः फैमिली कोर्ट ‘मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939’ का उल्लेख करना चाहती थी, लेकिन पूरे फैसले में बार-बार गलत कानून का हवाला दिया गया।
‘काफी कैजुअल’ रवैया, कोर्ट की फटकार
हाई कोर्ट ने इसे गंभीर लापरवाही करार देते हुए कहा कि एक वरिष्ठ जिला जज द्वारा इस तरह की गलती करना “काफी कैजुअल” रवैया दर्शाता है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि यह सुनिश्चित करना ट्रायल कोर्ट की जिम्मेदारी है कि जिस कानून का वह उल्लेख कर रहा है, वह वास्तव में अस्तित्व में हो।
मामला वापस फैमिली कोर्ट को भेजा
हाई कोर्ट ने पति की अपील पर सुनवाई करते हुए तलाक के आदेश को रद्द कर दिया और मामले को दोबारा फैसले के लिए फैमिली कोर्ट को भेज दिया है।
हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नए सिरे से ट्रायल की आवश्यकता नहीं है। फैमिली कोर्ट उपलब्ध साक्ष्यों और रिकॉर्ड के आधार पर सही कानून के तहत नया निर्णय दे सकती है।
3 महीने में फैसला देने का निर्देश
Allahabad High Court ने निर्देश दिया है कि फैमिली कोर्ट इस मामले में तीन महीने के भीतर अंतिम आदेश पारित करे।
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