शिक्षा मंत्री आशीष सूद के आरोपों की प्रमुख बातें:
1. क्लासरूम निर्माण का दावा झूठा
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दावा: आम आदमी पार्टी की सरकार ने कहा था कि 20,000 क्लासरूम बनाए गए हैं।
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हकीकत: जाँच में सामने आया कि सिर्फ 7,000 कमरे बने।
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इनमें से भी कई कमरे स्टोर रूम, किचन या शौचालय थे, जिन्हें “क्लासरूम” बताया गया।
2. प्रचार पर अधिक खर्च
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हैप्पीनेस करिकुलम के लिए असली खर्च: ₹4 करोड़
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प्रचार पर खर्च: ₹20 करोड़
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देशभक्ति करिकुलम पर: असल खर्च ₹49 लाख
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प्रचार पर खर्च: ₹10 करोड़ के आसपास
3. भाजपा सरकार की कार्रवाई
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अब दिल्ली की भाजपा सरकार ने PWD (लोक निर्माण विभाग) को निर्देश देने का निर्णय लिया है कि वे केवल वास्तविक क्लासरूम की गिनती करें, अन्य कमरों को इसमें शामिल न करें।
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इस पूरे मामले की पुनः ऑडिट और मूल्यांकन कराए जाने की संभावना है।
दिल्ली के स्कूलों में कमरों को निर्माण को लेकर यह पहला खुलासा नहीं है। इससे पहले केजरीवाल सरकार पर स्कूल कमरों के निर्माण में हजारों करोड़ के घोटाले का आरोप लगा था। मनीष सिसोदिया और सत्येन्द्र जैन पर आरोप है कि उन्होंने ₹1300 करोड़ का घोटाला स्कूल के कमरों के निर्माण में किया।
"एक दिन तुम्हारे कर्म तुमसे मिलने आएंगे
बस तुम उस दिन हैरान मत होना "
"शिक्षा क्रांति" और "सपनों का स्कूल" बनाने वालों ने टॉयलेट और स्टोर रूम की भी गिनती क्लास रूम में ही की है।
20,000 क्लास रूम गिनाने वालों की जब जांच हुई तो सिर्फ 7,000 क्लास रूम ही निकले।
ये है आम आदमी पार्टी… pic.twitter.com/S2VGCQ94st
— Ashish Sood (@ashishsood_bjp) March 27, 2025
आरोप है कि उन्होंने उन एजेंसियों को भी पैसे दे दिए जिन्होंने कमरे बनाए ही नहीं। इसको लेकर दर्ज की गई शिकायत के बाद उन पर मुकदमा चलाने की मंजूरी भी राष्ट्रपति मुर्मू ने हाल ही में दे दी थी। अब इस मामले में आगे कार्रवाई होनी है।
शिक्षा मॉडल पर चिल्लाने वाली केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में स्कूल पर कुछ ख़ास काम नहीं किया था। एक रिपोर्ट बताती है कि आम आदमी पार्टी के शासन के दौरान दिल्ली के भीतर मात्र 75 नए स्कूल बनाए गए थे। पुराने स्कूलों को नया नाम देकर या उनमें मरम्मत का काम करवा कर केजरीवाल लाइमलाईट लूटना चाहते थे।
बड़ा राजनीतिक संदेश:
मंत्री आशीष सूद के इन खुलासों का मकसद साफ था — आम आदमी पार्टी द्वारा प्रचारित “दिल्ली मॉडल ऑफ एजुकेशन” की सच्चाई उजागर करना।
इससे भाजपा यह दिखाना चाहती है कि दिल्ली में शिक्षा सुधारों को असली जमीन पर नहीं, बल्कि विज्ञापनों और प्रचार अभियानों में ज़्यादा बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया।