‘स्वदेशी ज्ञान परंपरा और धारणक्षम विकास’ सम्मेलन का आयोजन
नई दिल्ली में ‘स्वदेशी ज्ञान परंपरा और धारणक्षम विकास’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें 27 राज्यों से 711 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसका उद्घाटन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने किया।
मुख्य बिंदु:
🔹 भारत की बौद्धिक विरासत पर बल: शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि हर भाषा एक राष्ट्रीय भाषा है और भारतीय ज्ञान प्रणाली को प्रभावी ढंग से लागू करने में सभी भाषाएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
🔹 शिक्षा में परंपरागत ज्ञान की आवश्यकता: अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. नारायण लाल गुप्ता ने स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों को आधुनिक शिक्षा प्रणाली में शामिल करने पर जोर दिया।
🔹 प्रकृति संरक्षण का संदेश: समापन सत्र में केंद्रीय पर्यावरण, जल और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा, “यदि हम प्रकृति की रक्षा करेंगे, तो प्रकृति हमारी रक्षा करेगी।”
सम्मेलन की मुख्य गतिविधियाँ:
✅ शोध पत्रों का संकलन जारी: शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों और धारणक्षम विकास पर शोध पत्रों के संकलन का विमोचन किया।
✅ शैक्षिक सत्रों का आयोजन: विभिन्न शैक्षिक सत्रों में प्रसिद्ध शिक्षाविद, शोधकर्ता और नीति-निर्माता शामिल हुए।
✅ प्रमुख वक्ता:
- प्रो. अशोक के. नागावत (कुलपति, दिल्ली स्किल यूनिवर्सिटी)
- प्रो. आर.के. मित्तल (कुलपति, बाबासाहब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ)
सिंधी भाषा को बढ़ावा
सम्मेलन के दौरान राष्ट्रीय सिंधी भाषा संवर्धन परिषद और राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान द्वारा कक्षा 1 से 12 तक की सिंधी भाषा की पाठ्यपुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया।
आयोजन संस्थाएँ
इस सम्मेलन का आयोजन शैक्षिक फाउंडेशन, शिवाजी कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) और राष्ट्रीय सिंधी भाषा संवर्धन परिषद के सहयोग से किया गया।
यह सम्मेलन स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों की आधुनिक प्रासंगिकता, शिक्षा में पारंपरिक ज्ञान के समावेश और धारणक्षम विकास पर गंभीर विमर्श का मंच बना। इससे नीतिगत सुधारों और शिक्षा क्षेत्र में नवाचारों को बढ़ावा मिलने की संभावना है।