विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने राज्यसभा में श्रीलंका की जेलों में कैद भारतीय मछुआरों की स्थिति पर चर्चा करते हुए कहा कि यह समस्या 1974 और 1976 की घटनाओं के परिणामस्वरूप मौजूदा सरकार को विरासत में मिली है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह स्थिति भारत-श्रीलंका के बीच हुई समुद्री सीमा निर्धारण संधियों का परिणाम है, जिनके कारण भारतीय मछुआरों को श्रीलंकाई जलक्षेत्र में जाने से रोक दिया गया।
मुख्य बिंदु:
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समस्या की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
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1974: भारत और श्रीलंका के बीच अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा रेखा (IMBL) निर्धारित की गई।
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1976: दोनों देशों के बीच मछली पकड़ने के अधिकार क्षेत्र को परिभाषित करने के लिए पत्रों का आदान-प्रदान हुआ।
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इन फैसलों के कारण भारतीय मछुआरों को अब समुद्री सीमा उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है।
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श्रीलंका के कठोर कानून
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मत्स्य पालन और जलीय संसाधन अधिनियम, 1996
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विदेशी मछली पकड़ने वाली नौकाओं का विनियमन अधिनियम, 1979
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इन कानूनों में 2018 और 2023 में संशोधन कर सजा, जुर्माना और हिरासत को और कठोर बना दिया गया है।
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बार-बार उल्लंघन करने वाले नाव मालिक, कैप्टन और अन्य मछुआरों को सख्त कार्रवाई का सामना करना पड़ता है।
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तमिलनाडु और पुद्दुचेरी के मछुआरे अधिक प्रभावित
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भौगोलिक निकटता के कारण गिरफ्तार भारतीय मछुआरों में अधिकतर तमिलनाडु और पुद्दुचेरी से होते हैं।
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श्रीलंका में भारतीय मछुआरों की अद्यतन संख्या (26 मार्च 2025 तक)
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कुल हिरासत में: 97 भारतीय मछुआरे
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सजा काट रहे: 83 मछुआरे
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मुकदमे का इंतजार कर रहे: 3 मछुआरे
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आज पकड़े गए: 11 मछुआरे (एक ट्रॉलर के साथ)
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भारत सरकार का रुख:
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सरकार श्रीलंकाई अधिकारियों से राजनयिक माध्यमों से संवाद कर रही है ताकि गिरफ्तार मछुआरों की शीघ्र रिहाई सुनिश्चित हो।
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यह मुद्दा भारत-श्रीलंका द्विपक्षीय वार्ताओं में प्रमुखता से उठाया जाता है।
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भारत सरकार लगातार तमिलनाडु सरकार और मछुआरा संगठनों के साथ संपर्क में है।
भारतीय मछुआरों की गिरफ्तारी का मूल कारण 1974 और 1976 के समझौते हैं, जिसके कारण भारत सरकार को यह समस्या विरासत में मिली। श्रीलंका के कठोर कानूनों और बार-बार उल्लंघन के मामलों से स्थिति और जटिल हो गई है। भारत सरकार राजनयिक प्रयासों के माध्यम से इस मुद्दे को हल करने की कोशिश कर रही है।