भारत में ज्ञानवापी, संभल, मथुरा और अन्य धार्मिक स्थलों को लेकर जारी बहस के बीच पाकिस्तान के पूर्व हाई कमिश्नर अब्दुल बासित के एक बयान ने नई चर्चा छेड़ दी है। नई दिल्ली में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रह चुके बासित ने एक कार्यक्रम में भारत के मंदिर-मस्जिद विवादों का जिक्र करते हुए कहा कि कई जगहों पर 500-600 साल पुरानी मस्जिदों को मंदिर में बदलने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने इस संदर्भ में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात के भरूच का भी उल्लेख किया। भरूच की जामा मस्जिद को लेकर हाल के दिनों में दावा किया गया है कि इसके भीतर हिंदू-जैन स्थापत्य अवशेष या प्रतीक मौजूद हैं। इस दावे के बाद स्थानीय स्तर पर ASI सर्वे और संरक्षण की मांग उठी है।
अब्दुल बासित ने अपने बयान में कहा कि उत्तर प्रदेश में ज्ञानवापी, संभल और अन्य मस्जिदों को लेकर विवाद चल रहे हैं और अब ऐसे मामले गुजरात तक पहुंच रहे हैं। उन्होंने भरूच का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां करीब 600-700 साल पुरानी मस्जिद को लेकर वीडियो वायरल हुए हैं, जिनमें हिंदू और जैन निशान होने का दावा किया गया है। बासित ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड के आधार पर यह संभावना हो सकती है कि उस स्थान पर कभी जैन मंदिर रहा हो, लेकिन आज ऐसे पुराने मुद्दों पर धार्मिक स्थल का स्वरूप बदलने की मांग कानून के दायरे में ही देखी जानी चाहिए।
भरूच जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट पर जामा मस्जिद के बारे में दर्ज है कि यह मस्जिद भरूच किले की पहाड़ी पर स्थित है और इसका निर्माण 14वीं सदी में माना जाता है। इसी आधिकारिक विवरण में यह भी लिखा है कि इस मस्जिद का सबसे उल्लेखनीय पहलू यह है कि इसका निर्माण एक प्राचीन जैन मंदिर के अवशेषों से हुआ माना जाता है। इस कारण भरूच जामा मस्जिद का मुद्दा केवल धार्मिक विवाद नहीं, बल्कि इतिहास, पुरातत्व और विरासत संरक्षण से भी जुड़ा विषय बन गया है।
Hindus should not take back their temples even if it's proved that temples exist beneath each mosque. Hindus should be secular.
– Islamic Republic of Pakistanpic.twitter.com/p3qBUyaVMG
— Pakistan Untold (@pakistan_untold) June 28, 2026
अब्दुल बासित ने Places of Worship Act, 1991 का हवाला देते हुए कहा कि भारत में 15 अगस्त 1947 को जिस धार्मिक स्थल का जो स्वरूप था, उसे वही रहने देने का कानून बनाया गया था। गृह मंत्रालय के प्रकाशित कानून के अनुसार, इस अधिनियम का उद्देश्य किसी भी पूजा स्थल के धार्मिक स्वरूप को 15 अगस्त 1947 की स्थिति के अनुसार बनाए रखना और उसके परिवर्तन को रोकना है। कानून की धारा 3 किसी पूजा स्थल को एक धार्मिक संप्रदाय से दूसरे संप्रदाय के पूजा स्थल में बदलने पर रोक लगाती है।
Places of Worship Act, 1991 की धारा 4(1) में कहा गया है कि 15 अगस्त 1947 को किसी पूजा स्थल का जो धार्मिक स्वरूप था, वह वैसा ही बना रहेगा। इसी कानून में कुछ अपवाद भी दिए गए हैं, जिनमें प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक या वे पुरातात्विक स्थल शामिल हैं जो Ancient Monuments and Archaeological Sites and Remains Act, 1958 या अन्य लागू कानूनों के दायरे में आते हैं। यही वजह है कि कई धार्मिक स्थल विवादों में यह कानून और उसके अपवाद कानूनी बहस का केंद्र बनते हैं।
बासित के बयान का एक बड़ा हिस्सा इसी कानून पर केंद्रित रहा। उन्होंने कहा कि यदि 600-700 साल पुरानी मस्जिद को आज सर्वे के आधार पर मंदिर में बदलने की मांग की जाती है, तो यह सवाल उठता है कि 1991 के कानून का क्या अर्थ रह जाएगा। हालांकि हिंदू पक्षों का कहना है कि कई स्थानों पर ऐतिहासिक रूप से मंदिरों को तोड़कर मस्जिदें बनाई गईं और उन स्थानों की वास्तविक ऐतिहासिक पहचान सामने आनी चाहिए। वहीं मुस्लिम पक्ष आम तौर पर 1991 के कानून का हवाला देते हुए धार्मिक स्वरूप बदलने की मांगों का विरोध करता है।
भरूच में यह विवाद हाल में तब तेज हुआ जब कुछ वीडियो और दावों में जामा मस्जिद के भीतर हिंदू-जैन मूर्तियों और संरचनाओं के होने की बात कही गई। एक सामाजिक-धार्मिक संगठन ने 15 जून 2026 को भरूच कलेक्टर डॉ. नवनाथ गवहाणे को ज्ञापन सौंपा और आरोप लगाया कि ASI-संरक्षित जामा मस्जिद परिसर में कथित हिंदू-जैन मूर्तियों और संरचनाओं की उचित सुरक्षा नहीं हो रही है। संगठन ने दावा किया कि यह स्थल मूल रूप से “समडी विहार” जैन तीर्थ और श्री चक्रधर स्वामी के जन्मस्थान से जुड़ा है।
दूसरी ओर जामा मस्जिद ट्रस्ट से जुड़े लोगों ने इन दावों का विरोध किया है। रिपोर्ट के अनुसार, ट्रस्टी अब्दुल कामठी ने कहा कि यह स्मारक लगभग 700 वर्षों से मुस्लिम समुदाय से जुड़ा है और वहां नियमित नमाज अदा की जाती है। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसी रैलियां और दावे भरूच की सांप्रदायिक शांति को प्रभावित कर सकते हैं। भरूच कलेक्टर ने भी लोगों से अफवाहों या सामान्यीकृत दावों पर विश्वास न करने की अपील की और कहा कि ASI इस स्मारक पर निर्णय लेने वाली सक्षम अथॉरिटी है।
ASI ने भी इस मामले को संवेदनशील मानते हुए जिला प्रशासन को सतर्क किया था। रिपोर्ट के अनुसार, ASI ने आशंका जताई थी कि ASI-संरक्षित जामा मस्जिद स्मारक के पास बड़ी भीड़ जुटने से कानून-व्यवस्था और स्मारक की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। इसके बाद प्रशासन और पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई थी।
इस पूरे विवाद में हिंदू और जैन पक्षों का तर्क है कि यदि किसी ऐतिहासिक स्थल में प्राचीन मंदिर या जैन तीर्थ से जुड़े अवशेष हैं, तो उनका संरक्षण और वैज्ञानिक सर्वे होना चाहिए। दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष का कहना है कि धार्मिक स्थल की वर्तमान स्थिति और पूजा-पद्धति को देखते हुए शांति और कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इस वजह से भरूच जामा मस्जिद मामला अब केवल स्थानीय मुद्दा नहीं रहा, बल्कि Places of Worship Act, ASI संरक्षण, ऐतिहासिक दावों और धार्मिक अधिकारों से जुड़ी बड़ी बहस का हिस्सा बन गया है।
कानूनी रूप से इस मामले में अंतिम निर्णय किसी राजनीतिक बयान या सोशल मीडिया दावे के आधार पर नहीं, बल्कि दस्तावेज, पुरातात्विक प्रमाण, लागू कानून और सक्षम अदालत या प्राधिकरण की प्रक्रिया के आधार पर ही हो सकता है। फिलहाल भरूच जामा मस्जिद को लेकर अलग-अलग पक्षों के दावे सामने हैं, जबकि प्रशासन का मुख्य जोर शांति बनाए रखने और ASI-संरक्षित स्मारक की सुरक्षा पर है।
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