एक पिता का दिल कितना मजबूत हो सकता है, यह उस समय साफ दिखा जब 13 साल से बेटे की पीड़ा देख रहे अशोक राणा ने आखिरकार उसे दर्द से मुक्ति दिलाने का फैसला लिया।
श्मशान घाट पर खड़े अशोक राणा की आंखों में आंसू नहीं थे, लेकिन उनके चेहरे पर गहरा दर्द साफ झलक रहा था। उनका बेटा हरीश, जो लंबे समय से गंभीर बीमारी और कोमा की स्थिति में था, अब इस दुनिया को अलविदा कह चुका है।
पिछले 13 वर्षों से अशोक राणा ने दिन-रात अपने बेटे की सेवा की। इस दौरान उन्होंने मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक हर तरह की पीड़ा को झेला। बेटे की हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी, जिसे देखना एक पिता के लिए असहनीय हो चुका था।
#WATCH | Harish Rana, the first person who was granted passive euthanasia in India, died at AIIMS on March 24, cremated in Delhi pic.twitter.com/sHWG7xYQrC
— ANI (@ANI) March 25, 2026
करीबी लोग उन्हें ढाढस बंधाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उनकी पथराई आंखें मानो शून्य में खो गई थीं। बेटे के दर्द को खत्म करने के लिए उन्होंने कानूनी रास्ता अपनाया और अंततः Supreme Court of India से अनुमति प्राप्त की।
यह फैसला आसान नहीं था। एक तरफ पिता का दिल था, तो दूसरी तरफ बेटे की असहनीय पीड़ा। अंततः उन्होंने अपने बेटे की मुक्ति को प्राथमिकता दी।
श्मशान में जहां एक तरफ मां का रो-रोकर बुरा हाल था, वहीं पिता शांत खड़े अपने जिगर के टुकड़े को आखिरी बार देख रहे थे। यह दृश्य हर किसी को भावुक कर देने वाला था।
यह घटना न सिर्फ एक परिवार के दर्द को बयां करती है, बल्कि उन जटिल भावनाओं को भी सामने लाती है, जहां प्रेम, पीड़ा और मुक्ति एक साथ खड़े होते हैं।
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