उत्तर प्रदेश के कानपुर में पुलिस ने एक बड़े अंतरराज्यीय फर्जी डिग्री और मार्कशीट रैकेट का पर्दाफाश किया है। पुलिस कार्रवाई में इस गिरोह के कथित मास्टरमाइंड जियाउल हसन, उसके भाई आमिर अहमद, हसन आसिफ और नूरुद्दीन समेत चार आरोपितों को गिरफ्तार किया गया है। शुरुआती जांच में सामने आया है कि यह नेटवर्क पिछले करीब 13 वर्षों से सक्रिय था और देश-विदेश तक फैले संपर्कों के माध्यम से हाईस्कूल से लेकर पीएचडी तक की फर्जी डिग्रियां और शैक्षणिक दस्तावेज तैयार कर रहा था।
पुलिस को इस पूरे नेटवर्क से जुड़े करोड़ों रुपये के लेनदेन के सबूत भी मिले हैं। अधिकारियों का मानना है कि जांच आगे बढ़ने पर कई और चौंकाने वाले खुलासे हो सकते हैं।
बिना परीक्षा दिलाए तैयार होती थीं डिग्रियां
पुलिस के अनुसार यह गिरोह ऐसे छात्रों, नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं और विदेश जाने की तैयारी कर रहे लोगों को निशाना बनाता था, जो कम समय में शैक्षणिक योग्यता हासिल करना चाहते थे।
आरोपित कथित रूप से बिना किसी परीक्षा या वैध प्रक्रिया के हाईस्कूल, इंटरमीडिएट, ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन और यहां तक कि पीएचडी स्तर तक की फर्जी डिग्रियां और मार्कशीट तैयार कर देते थे। इसके अलावा माइग्रेशन सर्टिफिकेट, ट्रांसफर सर्टिफिकेट और अन्य शैक्षणिक दस्तावेज भी उपलब्ध कराए जाते थे।
धोखाधड़ी के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस—
फर्जी मार्कशीट/डिग्री बनाने वाले संगठित गिरोह का पर्दाफाश करते हुए @kanpurnagarpol द्वारा 04 अभियुक्तों को गिरफ्तार कर उनके कब्जे से फर्जी मार्कशीट, लैपटॉप, कंप्यूटर, हार्ड डिस्क, मोहर व प्रिंटर बरामद किये गए हैं।
अभियुक्त फर्जी मार्कशीट… pic.twitter.com/pCHPsoRxcD
— UP POLICE (@Uppolice) June 9, 2026
छापेमारी में मिला फर्जीवाड़े का पूरा सेटअप
पुलिस की छापेमारी के दौरान भारी मात्रा में फर्जी शैक्षणिक दस्तावेज और उपकरण बरामद किए गए। इनमें विभिन्न विश्वविद्यालयों और शिक्षा बोर्डों के नाम पर तैयार की गई मार्कशीट, डिग्रियां, सील, होलोग्राम, कंप्यूटर सिस्टम, प्रिंटर, हार्ड डिस्क और डिजिटल रिकॉर्ड शामिल हैं।
अधिकारियों का कहना है कि बरामद सामग्री से यह स्पष्ट होता है कि गिरोह अत्यंत संगठित तरीके से काम कर रहा था और दस्तावेजों को वास्तविक दिखाने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करता था।
सोशल मीडिया और एजेंटों के जरिए बनाते थे ग्राहक
जांच में सामने आया है कि गिरोह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, व्हाट्सऐप नेटवर्क और एजेंटों के माध्यम से ग्राहकों तक पहुंचता था। डिग्री की श्रेणी, विश्वविद्यालय और दस्तावेज के प्रकार के आधार पर ग्राहकों से हजारों से लेकर लाखों रुपये तक वसूले जाते थे।
पुलिस का दावा है कि कई मामलों में विदेश जाने के इच्छुक लोगों को भी फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्र उपलब्ध कराए गए, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस नेटवर्क की गतिविधियों के संकेत मिले हैं।
कनाडा और लंदन तक जुड़े होने के मिले संकेत
जांच एजेंसियों को इस रैकेट के कुछ विदेशी कनेक्शन भी मिले हैं। प्रारंभिक जांच में कनाडा और लंदन तक नेटवर्क के जुड़े होने के संकेत सामने आए हैं।
पुलिस अब डिजिटल रिकॉर्ड, ईमेल, बैंकिंग ट्रांजेक्शन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की मदद से यह पता लगाने में जुटी है कि इस नेटवर्क का दायरा कितना बड़ा था और इसमें कितने लोग शामिल थे।
बैंक खातों और संपत्तियों की हो रही जांच
अधिकारियों के अनुसार आरोपितों के बैंक खातों, चल-अचल संपत्तियों और डिजिटल लेनदेन की विस्तृत जांच की जा रही है। करोड़ों रुपये के वित्तीय लेनदेन की जांच के जरिए पूरे नेटवर्क की आर्थिक गतिविधियों का पता लगाया जा रहा है।
पुलिस का कहना है कि केवल फर्जी दस्तावेज बनाने वालों के खिलाफ ही नहीं, बल्कि ऐसे दस्तावेज हासिल करने और इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
और बड़े खुलासों की संभावना
जांच एजेंसियों का मानना है कि यह केवल एक फर्जी डिग्री गिरोह नहीं, बल्कि शिक्षा प्रणाली से जुड़ा एक बड़ा संगठित नेटवर्क हो सकता है। आने वाले दिनों में कई अन्य राज्यों और संस्थानों से जुड़े नाम भी सामने आ सकते हैं।
फिलहाल सभी आरोपितों से पूछताछ जारी है और पुलिस पूरे मामले की गहराई से जांच कर रही है।
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