भारत में नक्सलवाद अब अपने अंतिम चरण में पहुँच चुका है, और इसका बड़ा श्रेय मोदी सरकार की सख्त नीतियों, आधुनिक सुरक्षा रणनीतियों और विकास आधारित मॉडल को जाता है। हाल ही में CPI (माओवादी) की महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ (MMC) ज़ोनल कमेटी की ओर से जारी पत्र इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। 22 नवंबर 2025 को जारी इस पत्र में संगठन ने पहली बार औपचारिक रूप से सरकार के सामने आत्मसमर्पण की इच्छा जताई है। इस पत्र को तीन राज्यों — छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, महाराष्ट्र के CM देवेंद्र फडणवीस और मध्यप्रदेश के CM मोहन यादव के नाम लिखा गया है, जो मोदी सरकार के “ज़ीरो-टॉलरेंस” एप्रोच की ऐतिहासिक सफलता मानी जा रही है।
पत्र में संगठन के प्रवक्ता अनंत ने स्वीकार किया है कि वर्तमान परिस्थितियों में सशस्त्र संघर्ष जारी रखना संभव नहीं रहा। उन्होंने बताया कि केंद्रीय कमेटी के वरिष्ठ नेता सोनू दादा ने हालात की समीक्षा के आधार पर यह निर्णय लिया, जिसे CCM सतीश दादा और चंद्रन्ना सहित अन्य माओवादी नेताओं ने भी समर्थन दिया है। संगठन ने यह भी स्पष्ट किया कि यह कदम स्थायी नहीं बल्कि प्रारंभिक शांति प्रस्ताव है, ताकि माहौल संवाद के लिए अनुकूल हो सके। पत्र में सामूहिक निर्णय प्रक्रिया पूरी करने के लिए 15 फरवरी 2026 तक समय भी माँगा गया है, क्योंकि दूर-दराज के इलाकों में फैले सदस्यों तक संदेश पहुँचाने में समय लगेगा और वे आधुनिक संचार साधनों का उपयोग नहीं करते।
सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इस बार माओवादी संगठन ने अपना वार्षिक PLGA सप्ताह आयोजित न करने का निर्णय लिया है, जो इस बात का संकेत है कि वे अपने अंदर संघर्ष और नेतृत्व संकट का सामना कर रहे हैं। संगठन ने सरकार से अनुरोध किया है कि इस अवधि में सुरक्षा बलों को ऑपरेशंस में नरमी बरतनी चाहिए ताकि विश्वास का माहौल तैयार हो सके। इसी के साथ उन्होंने यह भी आग्रह किया कि मीडिया, पत्रकारों और यूट्यूब रिपोर्टर्स को मिलने की अनुमति दी जाए, ताकि मध्यस्थों के माध्यम से आत्मसमर्पण की प्रक्रिया पारदर्शी रह सके।
पत्र की एक और दिलचस्प मांग यह है कि इसे रेडियो पर मुख्य समाचार से पहले प्रसारित किया जाए, क्योंकि नक्सल प्रभावित इलाकों में उनके साथियों के लिए रेडियो ही एकमात्र सूचना माध्यम है। माना जा रहा है कि हिडमा समेत कई शीर्ष कमांडरों के मारे जाने के बाद संगठन में मनोबल गिरा है और सुरक्षा बलों द्वारा लगातार चलाए गए ऑपरेशन प्रहार, सामरिक ड्रोन सर्विलांस, सड़क संपर्क और मोबाइल नेटवर्क विस्तार जैसी सरकारी रणनीतियों ने उनकी जमीनी पकड़ को कमजोर कर दिया है।
राजनीतिक और सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि यह पत्र न केवल नक्सलवाद की वैचारिक हार का प्रतीक है बल्कि भारत की आंतरिक सुरक्षा नीति में एक ऐतिहासिक मोड़ भी है। यदि यह आत्मसमर्पण प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो 31 मार्च 2026 की सरकार की माओवाद समाप्ति की समय सीमा अब वास्तविकता में बदल सकती है और भारत के सबसे लंबे आंतरिक विद्रोह का अंत निकट माना जा रहा है।
हमारी यूट्यूब चैनल को लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करे
Like, Share and Subscribe our YouTube channel