भारत ने स्वदेशी रक्षा निर्माण के क्षेत्र में एक और बड़ी छलांग लगाई है। डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (DRDO) की व्हीकल रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट (VRDE) द्वारा विकसित माउंटेड गन सिस्टम अब पूरी तरह तैयार है और जल्द ही इसका ट्रायल भारतीय सेना करने जा रही है। यह सिस्टम 155 मिमी, 52 कैलिबर की ATAGS (Advanced Towed Artillery Gun System) तोप को एक व्हीकल प्लेटफॉर्म पर माउंट करता है, जिससे यह कहीं भी तैनात की जा सके, वह भी सिर्फ 85 सेकेंड में फायरिंग के लिए रेडी होकर। यह गन 1 मिनट में 6 गोले दाग सकती है और 45 किमी तक दुश्मन को निशाना बना सकती है।
इसका सबसे बड़ा सामरिक लाभ यह है कि यह तेज़ी से लोकेशन बदल सकती है, जिससे दुश्मन इसकी सटीक जगह ट्रैक नहीं कर पाता। रेगिस्तान, पहाड़, उत्तर पूर्व, या सियाचिन — यह हर इलाके में कार्य करने में सक्षम है। इसके ट्रांसपोर्टेशन के लिए रेल और C-17 ग्लोबमास्टर एयरक्राफ्ट का उपयोग भी संभव है।
इस माउंटेड गन की गति भी प्रभावशाली है — समतल इलाकों में यह 90 किमी/घंटा और उबड़-खाबड़ क्षेत्रों में 60 किमी/घंटा की रफ्तार पकड़ सकती है। इसका कुल वजन 30 टन है (15 टन व्हीकल + 15 टन गन)। सिस्टम में 7 क्रू मेंबर्स के लिए बुलेटप्रूफ केबिन है, जो युद्ध के समय उन्हें सुरक्षित रखता है। यह पूरी तरह ऑटोमैटिक है — केवल निर्देश मिलते ही तुरंत गोलाबारी शुरू कर देता है और 50 वर्ग मीटर के क्षेत्र को तबाह कर सकता है।
इस प्रोजेक्ट को सिर्फ ढाई साल में तैयार किया गया है और इसकी लागत केवल 15 करोड़ रुपये प्रति यूनिट है, जो विदेशों से खरीदे जाने वाले सिस्टम की तुलना में 50% से भी कम है। विदेशी विकल्पों की कीमत 30–35 करोड़ रुपये तक जाती है। फिलहाल भारतीय सेना के पास ऐसी कोई माउंटेड गन नहीं है, जबकि 700–800 यूनिट की आवश्यकता बताई गई है।
यह उपलब्धि भारत को उन चुनिंदा देशों के क्लब में शामिल करती है जो अत्याधुनिक माउंटेड गन सिस्टम बनाते हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध ने दिखाया है कि कैसे ऐसे सिस्टम युद्ध की दिशा को पलट सकते हैं। भारत का यह स्वदेशी हथियार प्रणाली अब हर मोर्चे पर दुश्मन को करारा जवाब देने में सक्षम है — तेज़, घातक और सटीक।