राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी शताब्दी यात्रा के द्वार पर खड़ा है। सौ वर्षों की इस लंबी और तपःपूर्ण यात्रा में असंख्य लोगों का सहयोग और सहभागिता रही है। यह मार्ग चुनौतियों और संकटों से भरा रहा, परंतु समाज के सामान्य जनों का अटूट समर्थन सदैव इस कार्य की शक्ति बनता गया। जब शताब्दी वर्ष में पीछे मुड़कर देखा जाता है तो वे सभी प्रेरणादायी प्रसंग और महान हस्तियाँ स्मरण में आती हैं, जिन्होंने संघ कार्य के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।
संघ के प्रारंभिक दिनों में युवा कार्यकर्ता राष्ट्रप्रेम से ओत-प्रोत होकर पूरे देश में संघ का संदेश लेकर निकले। अप्पाजी जोशी जैसे गृहस्थ कार्यकर्ता हों या प्रचारक जीवन अपनाने वाले दादाराव परमार्थ, भाऊराव और बालासाहब देवरस, यादवराव जोशी, एकनाथ रानडे – सभी ने डॉ. हेडगेवार के सान्निध्य में संघ कार्य को राष्ट्र सेवा का व्रत मानकर आजीवन उसका पालन किया। इनकी तपस्या और त्याग ने संगठन की नींव मजबूत की।
समाज के सहयोग से संघ शताब्दी यात्रा सुगम बनी
दत्तात्रेय होसबाले
सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य को अभी सौ वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। इस सौ वर्ष की यात्रा में कई लोग सहयोगी और सहभागी रहे हैं। यह यात्रा परिश्रम पूर्ण और कुछ संकटों से अवश्य घिरी… pic.twitter.com/nzPEnqSlGC
— VSK BHARAT (@editorvskbharat) October 1, 2025
संघ कार्य की निरंतरता का मूल कारण समाज का सहज समर्थन रहा। यह कार्य सामान्य जन की भावनाओं और आकांक्षाओं से जुड़ा हुआ था, इसलिए धीरे-धीरे इसकी स्वीकार्यता पूरे समाज में बढ़ती गई। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि जैसे चींटियों को शक्कर पहचानने के लिए किसी भाषा की आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही भारत का जनमानस सात्विक कार्य को सहज ही पहचान लेता है। यही कारण रहा कि संघ का कार्य समाज में लगातार जड़ें जमाता गया और लोगों का सहयोग स्वयंसेवकों तक पहुँचता रहा। विशेष रूप से परिवारों की माताओं और भगिनीयों ने संघ कार्य को पोषित करने में मौन लेकिन अत्यंत प्रभावी भूमिका निभाई।
समय के साथ दत्तोपंत ठेंगड़ी, यशवंतराव केलकर, बालासाहेब देशपांडे, एकनाथ रानडे, दीनदयाल उपाध्याय और दादासाहेब आपटे जैसे अनेक प्रखर व्यक्तित्वों ने संघ प्रेरणा से समाज के विविध क्षेत्रों में संगठनों की स्थापना की। ये संगठन आज भी व्यापक स्तर पर समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला रहे हैं। इसी प्रकार, राष्ट्र सेविका समिति के माध्यम से मौसी जी केलकर और प्रमिलाताई मेढ़े जैसी मातृसमान हस्तियों ने राष्ट्र कार्य को नई दिशा दी।
संघ ने समय-समय पर राष्ट्रहित के कई मुद्दों को उठाया और समाज के विभिन्न वर्गों से समर्थन प्राप्त किया। कई बार ऐसे लोग भी सहयोगी बने, जो सार्वजनिक रूप से विरोधी माने जाते थे। तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में हुए मतांतरण के विरुद्ध आयोजित विशाल सम्मेलन हो या 1964 में विश्व हिंदू परिषद की स्थापना – हर अवसर पर संत, संन्यासी और विभिन्न मत-पंथों के नेता साथ खड़े रहे। गुरूजी गोलवलकर की पहल पर उडुपी में आयोजित विश्व हिंदू सम्मेलन में सभी धर्माचार्यों ने “हिंदवः सोदराः सर्वे” का उद्घोष करके हिन्दू एकता का संदेश दिया।
स्वाधीनता के पश्चात लगे प्रतिबंध हों या आपातकाल का संकट, हर बार समाज और प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों ने संघ कार्य को संबल दिया। इन कठिन समयों में स्वयंसेवकों के साथ-साथ परिवारों की माता-भगिनियों ने संगठन को संभालने का दायित्व निभाया। यही कारण है कि अनेक बाधाओं के बावजूद संघ कार्य निरंतर आगे बढ़ता रहा और आज शताब्दी वर्ष तक पहुँचा है।
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