प्रशांत किशोर और भारत में नॉर्वे की राजदूत एलिन स्टेनर की हालिया मुलाकात ने बिहार की राजनीति में हलचल मचा दी है और इसे लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यह मुलाकात पहली नजर में एक सामान्य कूटनीतिक संवाद लग सकती है, लेकिन इसके पीछे छिपे संभावित अंतरराष्ट्रीय प्रभावों और “डीप स्टेट” टूलकिट की भूमिका को लेकर आशंका जताई जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नॉर्वे जैसे देशों की दिलचस्पी केवल निवेश या पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि वे लोकतंत्र और मानवाधिकार की आड़ में रणनीतिक रूप से अस्थिरता फैलाने की कोशिश कर सकते हैं। अतीत में शाहीन बाग, किसान आंदोलन, पहलवान आंदोलन, और केजरीवाल के उदय जैसे घटनाक्रमों में विदेशी फंडिंग और टूलकिट की भूमिका पहले ही जांच के घेरे में आ चुकी है।
Pleased to meet @PrashantKishor and hear about his ambition for #Bihar and the newly founded @jansuraajonline party. pic.twitter.com/c0d8VO7Jrj
— Ambassador May-Elin Stener (@NorwayAmbIndia) July 7, 2025
प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकार, जिनकी जन सुराज पार्टी बिहार में राजनीतिक विकल्प बनने की कोशिश कर रही है, अब डीप स्टेट टूलकिट के संभावित नए मोहरे के रूप में देखे जा रहे हैं। आशंका है कि अरबों डॉलर के ऑयल फंड का इस्तेमाल कर अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ भारत के संवेदनशील राज्यों में प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर सकती हैं। नॉर्वे का इतिहास भी इसकी पुष्टि करता है – श्रीलंका, लीबिया, सीरिया और इथियोपिया जैसे देशों में हस्तक्षेप के उदाहरण इसके सामने हैं। भारत सरकार और एजेंसियों को इस संदर्भ में न केवल विदेशी फंडिंग की पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए बल्कि यह भी देखना चाहिए कि भारत के लोकतांत्रिक और संघीय ढांचे पर कोई बाहरी खतरा न मंडराए। बिहार का भविष्य केवल बिहार के लोग तय करेंगे, न कि कोई अंतरराष्ट्रीय ‘सॉवरेन ऑयल फंड’ या छुपी हुई टूलकिट रणनीतियाँ।