यह आयोजन भारतीय संस्कृति और शास्त्र परंपरा के गौरवशाली इतिहास को पुनर्जीवित करने वाला एक ऐतिहासिक क्षण बन गया। हरिद्वार के पावन तट पर स्थित हर की पौड़ी ने इस आयोजन को और अधिक दिव्यता प्रदान की। इस भव्य शास्त्रोत्सव का मुख्य उद्देश्य केवल वेदों, उपनिषदों और अन्य शास्त्रों का पाठ करना ही नहीं था, बल्कि उनके संदेश को जीवन में अपनाने का संकल्प लेना भी था।
आयोजन की पृष्ठभूमि और महत्व
केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के तत्वावधान में यह 62वां अखिल भारतीय शास्त्रोत्सव आयोजित हुआ। इस आयोजन की मेजबानी पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार ने की, जिसका उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा को न केवल संरक्षित करना, बल्कि इसे वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाना था। यह आयोजन भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण का प्रतीक बन गया, जहां हजारों विद्वानों, छात्रों और श्रद्धालुओं ने भाग लिया और एक अभूतपूर्व आध्यात्मिक संगम का साक्षी बने।
गंगा की पवित्र धारा और वेदों की दिव्य ध्वनि
हर की पौड़ी, जो गंगा आरती के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है, उस दिन एक नई ऊर्जा और भक्ति भाव से ओतप्रोत थी। सूर्यास्त का समय, गंगा की कलकल धारा, आकाश में स्वर्णिम आभा और घाटों पर एकत्र हजारों श्रद्धालु—सब मिलकर एक अद्वितीय आध्यात्मिक वातावरण का निर्माण कर रहे थे।
जैसे ही आयोजन का शुभारंभ हुआ, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद की ऋचाएँ गूंजने लगीं। वेदों के मंत्रों की दिव्य ध्वनि गंगा की तरंगों के साथ लयबद्ध हो उठी। इस दौरान भगवद्गीता के श्लोक, उपनिषदों के गूढ़ वचन, योगसूत्रों के सूत्र और आयुर्वेद के सिद्धांतों का भी पाठ किया गया। यह सब मिलकर एक दिव्य महासंगीत प्रस्तुत कर रहे थे, जिसमें भक्ति, दर्शन और अध्यात्म का त्रिवेणी संगम स्पष्ट झलक रहा था।
विश्व कीर्तिमान स्थापित हुआ
इस ऐतिहासिक आयोजन में एक विशेष क्षण तब आया जब हजारों विद्वानों और श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से शास्त्र पाठ किया। यह अपने आप में एक विश्व कीर्तिमान बन गया, जिसे केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने विशेष रूप से सराहा। उन्होंने कहा कि यह आयोजन संस्कृत भाषा, वेद और शास्त्रों को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस रिकॉर्ड ने यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय ज्ञान परंपरा आज भी न केवल प्रासंगिक है, बल्कि वैश्विक समाज को दिशा देने की क्षमता रखती है।
गंगा आरती और भक्तिमय माहौल
शास्त्र श्रवण के उपरांत, जैसे ही संध्या गंगा आरती का शुभारंभ हुआ, संपूर्ण वातावरण मंत्रमुग्ध हो गया। गंगा तट पर हजारों श्रद्धालु दीप प्रज्वलित किए खड़े थे। विशाल दीपमालाओं से सुसज्जित आचार्यों और संतों ने गंगा माता की आरती की। चारों ओर घंटे-घड़ियालों की ध्वनि, ‘हर हर गंगे’ और ‘गंगा मैया की जय’ के गगनभेदी उद्घोष, तथा गंगा जल में तैरते असंख्य दीपों की झिलमिलाती छवि—यह एक ऐसा दृश्य था जो केवल नेत्रों से नहीं, बल्कि हृदय से अनुभव करने योग्य था।
ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं गंगा माता अपने भक्तों की श्रद्धा को स्वीकार कर रही हों और इस दिव्य आयोजन का आशीर्वाद दे रही हों।
वेदों और भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व पर विचार
इस शुभ अवसर पर योग गुरु स्वामी रामदेव ने कहा,
“शास्त्र केवल शब्द नहीं, यह अमृत ज्ञान है। जब तक भारत अपनी संस्कृति और सनातन परंपरा को अपनाएगा, तब तक विश्व में आध्यात्मिकता और शांति का प्रवाह बना रहेगा। वेद हमारा इतिहास भी है और वर्तमान भी।”
उन्होंने वेदों और योग के ज्ञान को जीवन का आधार बताते हुए ‘विकसित भारत’ की संकल्पना प्रस्तुत की। इसी क्रम में आचार्य बालकृष्ण ने भी वेदों और शास्त्रों को केवल धार्मिक ग्रंथ न मानकर जीवन जीने की सर्वोत्तम कला बताया। उन्होंने कहा,
“वेदों में निहित ज्ञान केवल आध्यात्म तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें विज्ञान, चिकित्सा और दर्शन का ऐसा अनंत भंडार है, जो संपूर्ण विश्व को मार्गदर्शन देने की क्षमता रखता है।”
इस आयोजन में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने भी पतंजलि विश्वविद्यालय की इस पहल को विश्व स्तरीय बताया और संस्कृत भाषा व भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करने के महत्व पर जोर दिया।
संस्कृति पुनर्जागरण की दिशा में ऐतिहासिक पहल
यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक या आध्यात्मिक उत्सव नहीं था, बल्कि यह भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करने का एक महत्त्वपूर्ण कदम था। इस कार्यक्रम ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत आज भी अपने वेदों, उपनिषदों, योग और आयुर्वेद के माध्यम से पूरे विश्व को मार्गदर्शन दे सकता है।
इस अवसर पर पतंजलि विश्वविद्यालय की कुलानुशासिका प्रो. साध्वी देवप्रिया ने कहा,
“यह आयोजन भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगा और वेदों, उपनिषदों, आयुर्वेद और योग के प्रचार-प्रसार को नई गति देगा।”
हरिद्वार में हुआ यह दिव्य आयोजन भारतीय संस्कृति और शास्त्र परंपरा के पुनर्जागरण की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल बन गया। जब-जब गंगा बहेगी, जब-जब वेदों की ऋचाएँ गूंजेंगी, तब-तब इस अखिल भारतीय शास्त्रोत्सव के इस स्वर्णिम अध्याय को स्मरण किया जाएगा। इस अनोखे आयोजन ने केवल एक आध्यात्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के जागरण की एक नई लहर को जन्म दिया।