नेपाल में हिंसा का व्यापक दौर जारी है। सड़क पर सेना उतारने के बावजूद प्रदर्शनकारी उग्र हो गए हैं। अब तक पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प में 2 लोगों की मौत हो गई है। इसके बाद 100 लोगों की गिरफ्तारी की गई है। अब हिंसा में आंशिक कमी आती दिख रही है। यह देखते हुए नेपाल के प्राधिकारियों ने काठमांडू के पूर्वी हिस्से में सुरक्षाकर्मियों और राजशाही समर्थक प्रदर्शनकारियों के बीच हुई हिंसक झड़पों के बाद लगाया गया कर्फ्यू क्षेत्र में तनाव कम होने के बाद शनिवार को हटा दिया।
क्या हो रहा है नेपाल में? — पूरी स्थिति संक्षेप में
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हिंसा की वजह:
प्रदर्शनकारी राजशाही की बहाली और नेपाल को दोबारा हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग कर रहे हैं। -
यह आंदोलन तब और तेज़ हुआ जब पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह ने लोकतंत्र दिवस पर अपने संदेश में जनता से समर्थन माँगा।
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आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं दुर्गा प्रसाई, जो फिलहाल पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं।
अब तक क्या-क्या हुआ?
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प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प में 2 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें एक टीवी कैमरामैन भी शामिल है।
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100 से ज्यादा प्रदर्शनकारी गिरफ्तार किए गए हैं।
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53 पुलिसकर्मी, 22 सशस्त्र पुलिसकर्मी और 35 प्रदर्शनकारी घायल हुए हैं।
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प्रदर्शनकारियों ने:
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14 इमारतों में आग लगाई।
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9 सरकारी वाहन फूंके।
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मीडिया हाउस (कांतिपुर टीवी और अन्नपूर्णा मीडिया) पर हमला किया।
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स्थिति काबू में करने के लिए सेना तैनात करनी पड़ी।
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कर्फ्यू लगाया गया था, जिसे अब हटा लिया गया है, लेकिन माहौल अभी भी तनावपूर्ण है।
हिंसा की पृष्ठभूमि: क्यों उग्र हुए प्रदर्शनकारी?
2008 में नेपाल से राजशाही खत्म कर, इसे धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बना दिया गया था।
लेकिन देश में आज भी एक बड़ा तबका है जो:
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राजा ज्ञानेंद्र शाह की वापसी चाहता है।
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नेपाल को हिंदू राष्ट्र के रूप में पुनः स्थापित करना चाहता है।
इस आंदोलन को राजनीतिक दलों के कुछ नेताओं और आम जनता का समर्थन मिल रहा है, क्योंकि बहुत से लोग मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से निराश हैं।
नेपाल की सरकार की प्रतिक्रिया
नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ ने हिंसा प्रभावित इलाकों का दौरा किया और शांति बनाए रखने की अपील की है।
पुलिस की ओर से आंदोलन के संयोजक दुर्गा प्रसाई की तलाश जारी है। कई राजशाही समर्थक नेताओं की गिरफ्तारी भी हुई है।
इस आंदोलन का भविष्य क्या हो सकता है?
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अगर जनता का एक बड़ा वर्ग इसमें जुड़ता है, तो यह आंदोलन नेपाल की राजनीति को झकझोर सकता है।
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सरकार पर राजशाही और हिंदू राष्ट्र पर जनमत संग्रह की मांग बढ़ सकती है।
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लेकिन फिलहाल, सरकार इसे कानून-व्यवस्था का मुद्दा मानकर कड़ा रुख अपना रही है।