भारत में गैर-लाभकारी संस्थाओं (Non-Profits), ट्रस्ट्स औरAssociations को मिलने वाले विदेशी चंदे को नियंत्रित करने वाले कानून फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट (FCRA) को लेकर देश में एक बार फिर बड़ी चर्चा शुरू हो गई है। साल 2026 में पेश किए गए प्रस्तावित FCRA संशोधन बिल ने सिविल सोसाइटी, एनजीओ और राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। इस नए संशोधन के तहत सरकार का नियंत्रण इन संस्थाओं पर और अधिक मजबूत होने जा रहा है।
आइए विस्तार से समझते हैं कि FCRA फ्रेमवर्क क्या है, 2026 के नए बिल में क्या बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं और इसके क्या दूरगामी असर हो सकते हैं।
1. क्या है FCRA और यह कैसे काम करता है?
फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट (FCRA) भारत का एक आंतरिक सुरक्षा कानून है, जिसे गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) द्वारा लागू किया जाता है।
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मुख्य उद्देश्य: इसका मुख्य मकसद यह सुनिश्चित करना है कि देश के गैर-लाभकारी संगठनों, ट्रस्ट्स और एसोसिएशन को मिलने वाला विदेशी चंदा देश की आंतरिक सुरक्षा, संप्रभुता और सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ इस्तेमाल न हो।
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प्रमुख नियम: इसके तहत गैर-लाभकारी संस्थाओं को हर पांच साल में अपना रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होता है। इसके अलावा, सारा विदेशी फंड नई दिल्ली में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की एक निर्धारित शाखा के जरिए ही मंगाया जा सकता है।
2. FCRA संशोधन बिल 2026: क्या हैं मुख्य बदलाव?
मार्च 2026 में पेश किए गए इस नए बिल में विदेशी फंडिंग और उससे जुड़ी संपत्तियों को लेकर कड़े प्रावधान जोड़े गए हैं:
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तय अथॉरिटी (Designated Authority) का गठन: यदि किसी NGO का FCRA रजिस्ट्रेशन रद्द हो जाता है, उसकी समय-सीमा समाप्त हो जाती है (बिना रिन्यू हुए खत्म हो जाता है), या समय पर बहाल नहीं किया जाता है, तो सरकार द्वारा नियुक्त ‘तय अथॉरिटी’ उन संस्थाओं की संपत्तियों (जैसे विदेशी ग्रांट से बने स्कूल, अस्पताल या इंफ्रास्ट्रक्चर) को अपने कब्जे में ले सकती है।
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मिश्रित फंडिंग (Mixed Funding) पर नियम: यदि किसी संपत्ति को घरेलू और विदेशी दोनों तरह के फंड्स से बनाया गया है, तो भी विदेशी फंड से जुड़ी संपत्तियों या आंशिक हिस्से को सरकार अपने कब्जे में ले सकती है। हालांकि, गैर-विदेशी हिस्से को वापस पाने के लिए अलग से आवेदन का प्रावधान है, लेकिन प्रक्रिया जटिल हो सकती है।
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समय सीमा तय करना: बिल की धारा 12 के तहत ‘पहले से अनुमति’ (prior permission) से मिलने वाले फंड के इस्तेमाल के लिए भी समय-सीमा तय की गई है, जिससे विदेशी फंडिंग अब लंबे समय के निवेश की बजाय शॉर्ट-टर्म प्रोग्राम-आधारित गतिविधियों की ओर शिफ्ट हो रही है।
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सज़ा में बदलाव: राहत की बात यह है कि नियमों के मामूली उल्लंघन के लिए जेल की अधिकतम सजा को पांच साल से घटाकर एक साल कर दिया गया है, जिससे पूरा ध्यान अब प्रशासनिक नियंत्रण और संपत्तियों पर केंद्रित हो गया है।
3. सरकार का पक्ष और उद्देश्य
सरकार का दावा है कि ये कड़े कदम देशहित में बेहद जरूरी हैं:
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राष्ट्रीय सुरक्षा: विदेशी पैसे का इस्तेमाल देश की संप्रभुता या सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों में न हो, इसे सुनिश्चित करना।
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पारदर्शिता और जवाबदेही: बिना निगरानी वाले फर्जी या “शेल NGO” पर लगाम कसना और फंड के अंतिम इस्तेमाल की सटीक ट्रैकिंग करना।
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लावारिस संपत्तियों का प्रबंधन: बंद हो चुकी या लावारिस संपत्तियों के लिए स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया देना, जिसमें पूजा स्थलों के धार्मिक स्वरूप की रक्षा करने के भी स्पष्ट नियम हैं।
4. विपक्ष और आलोचकों की चिंताएं
दूसरी तरफ, विपक्षी दलों, आलोचकों और नागरिक समाज (Civil Society) के समूहों का तर्क है कि यह बिल गैर-लाभकारी संस्थाओं के कामकाज में बहुत अधिक सरकारी हस्तक्षेप बढ़ा देगा। उनका मानना है कि अदालत में दोष साबित होने से पहले ही सामुदायिक संपत्तियों, स्कूलों और अस्पतालों को ज़ब्त करने के इस प्रावधान से स्वतंत्र सामाजिक कार्यों पर बुरा असर पड़ सकता है। हालांकि, सरकार ने धार्मिक आधार पर किसी संस्था को निशाना बनाए जाने के दावों को पूरी तरह से खारिज किया है और कहा है कि ये नियम सभी पर समान रूप से लागू होते हैं।