राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शुक्रवार, 28 अगस्त 2026 को अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित ऐतिहासिक ISKCON केंद्र का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना की, ISKCON के संस्थापक श्रील ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद को श्रद्धांजलि अर्पित की और श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए दुनिया में बढ़ते संघर्षों के बीच ‘कृष्ण चेतना’ को शांति और मानव एकता का महत्वपूर्ण मार्ग बताया।
भागवत ने कहा कि दुनिया आज अलग-अलग प्रकार के संघर्षों, मतभेदों और द्वंद्वों से गुजर रही है। ऐसे समय में मनुष्य को उस चेतना को पहचानने की आवश्यकता है, जो सभी को एक-दूसरे से जोड़ती है। उन्होंने श्रीकृष्ण की चेतना को इसी एकत्व से जोड़ते हुए कहा कि जब मनुष्य ईश्वर से अपने संबंध और पूरी मानवता की एकता को समझेगा, तभी समाज में स्थायी शांति की दिशा में आगे बढ़ा जा सकेगा।
‘कृष्ण चेतना पूरी दुनिया को जोड़ सकती है’
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि संसार में लोगों की परिस्थितियां, जिम्मेदारियां और काम करने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन इसके बावजूद सभी एक व्यापक उद्देश्य से जुड़े हुए हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि किसी संस्था में मालिक, अधिकारी और कर्मचारियों की जिम्मेदारियां अलग होती हैं, लेकिन जब सभी को यह समझ होती है कि वे एक ही उद्देश्य के लिए कार्य कर रहे हैं, तो उनका सामूहिक प्रयास अधिक प्रभावी हो जाता है।
इसी तरह दुनिया में अलग-अलग समुदायों, संस्कृतियों और जीवन पद्धतियों के बीच विविधता होने के बावजूद उनके बीच एक मूलभूत एकता मौजूद है। भागवत के संदेश का केंद्र यही रहा कि विविधता को विभाजन का कारण नहीं, बल्कि व्यापक मानवीय एकता का हिस्सा समझा जाना चाहिए।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कृष्ण चेतना मनुष्य को स्वयं से आगे बढ़कर ईश्वर और दूसरे मनुष्यों के साथ अपने संबंध का बोध कराती है। दुनिया में दिखाई दे रहे संघर्षों और विभाजनों को दूर करने के लिए आध्यात्मिक चेतना की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
ऐतिहासिक 26 Second Avenue पहुंचे RSS प्रमुख
न्यूयॉर्क में जिस स्थान पर मोहन भागवत पहुंचे, उसका ISKCON के इतिहास में विशेष महत्व है। मैनहट्टन के 26 Second Avenue स्थित इसी स्थान से श्रील ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने 1966 में International Society for Krishna Consciousness यानी ISKCON की शुरुआत की थी।
एक छोटे से केंद्र से शुरू हुआ ISKCON आज विश्वव्यापी आध्यात्मिक आंदोलन बन चुका है। वर्ष 2026 संस्था की स्थापना का 60वां वर्ष भी है।
मोहन भागवत ने ऐतिहासिक केंद्र पर श्रील प्रभुपाद को पुष्पमाला अर्पित कर श्रद्धांजलि दी और दुनिया भर में श्रीकृष्ण भक्ति, भगवद्गीता तथा भारतीय आध्यात्मिक विचारों के प्रसार के लिए ISKCON के प्रयासों की सराहना की।
अपनी यात्रा के दौरान भागवत ने ISKCON को दुनिया तक ‘श्रीकृष्ण चेतना’ पहुंचाने वाला प्रेरणादायक मंच भी बताया।
बेघर और जरूरतमंद लोगों के लिए भोजन वितरण में लिया हिस्सा
मोहन भागवत के ISKCON दौरे का एक अहम पहलू सेवा भी रहा। उन्होंने न्यूयॉर्क में जरूरतमंद और बेघर लोगों के लिए चलाए जा रहे भोजन वितरण कार्यक्रम में भाग लिया।
इस दौरान ‘Zero Hunger New York’ पहल के तहत एक लाखवें भोजन के वितरण का पड़ाव पूरा किया गया। ISKCON से जुड़े प्रतिनिधियों के अनुसार, इस अभियान के माध्यम से जरूरतमंद लोगों को शाकाहारी भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है।
भागवत की मौजूदगी में हुए इस कार्यक्रम ने आध्यात्मिकता के साथ सेवा के संदेश को भी प्रमुखता से सामने रखा।
ISKCON की स्थापना के 60 वर्ष
वर्ष 1966 में न्यूयॉर्क में श्रील प्रभुपाद द्वारा शुरू किए गए ISKCON ने 2026 में अपनी स्थापना के 60 वर्ष पूरे किए हैं। 26 Second Avenue स्थित केंद्र को ISKCON आंदोलन के जन्मस्थान के रूप में जाना जाता है।
पिछले छह दशकों में संस्था ने दुनिया के विभिन्न हिस्सों में श्रीकृष्ण भक्ति, भक्ति योग, भगवद्गीता और वैदिक दर्शन को पहुंचाने का काम किया है।
मोहन भागवत ने ISKCON के कार्यकर्ताओं और श्रद्धालुओं से आध्यात्मिक चेतना, सेवा, एकता और विश्व शांति के संदेश को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।
‘सिर्फ बाहरी व्यवस्थाओं से नहीं आएगी स्थायी शांति’
मोहन भागवत के संबोधन का प्रमुख संदेश यह रहा कि दुनिया में स्थायी शांति केवल राजनीतिक या बाहरी व्यवस्थाओं से हासिल नहीं की जा सकती। इसके लिए मनुष्य के भीतर भी बदलाव और एकत्व की चेतना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति अपने भीतर उस चेतना को जागृत करेगा, जो उसे ईश्वर के साथ-साथ पूरी मानवता से जोड़ती है, तभी दुनिया के संघर्षों को कम करने और समाज में वास्तविक शांति स्थापित करने की दिशा में प्रगति हो सकेगी।
न्यूयॉर्क के उसी ऐतिहासिक स्थान से, जहां करीब छह दशक पहले श्रील प्रभुपाद ने कृष्ण चेतना को विश्व स्तर पर पहुंचाने की यात्रा शुरू की थी, मोहन भागवत ने आज के संघर्षों से जूझते विश्व के सामने कृष्ण चेतना, एकत्व और सेवा का संदेश रखा।
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