BRICS Summit 2026 कई मायनों में ऐतिहासिक होने जा रहा है। करीब 10 साल बाद भारत में एक बार फिर दुनिया की तीन बड़ी ताकतों भारत, रूस और चीन के शीर्ष नेता BRICS के मंच पर एक साथ दिखाई देंगे। 12 और 13 सितंबर को होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी मौजूद रहेंगे।
इससे पहले अक्टूबर 2016 में गोवा में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान नरेंद्र मोदी, व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग भारत में एक ही मंच पर मौजूद थे। लेकिन 2016 से 2026 के बीच वैश्विक राजनीति, सुरक्षा और अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव आ चुके हैं। यही वजह है कि इस बार की बैठक को केवल एक बहुपक्षीय सम्मेलन के तौर पर नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था के महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
2016 से 2026 तक बदल गई वैश्विक तस्वीर
2016 में BRICS की चर्चाओं में वैश्विक आर्थिक विकास, व्यापार, निवेश और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भूमिका प्रमुख मुद्दे थे। लेकिन 2026 तक अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां कहीं अधिक जटिल हो चुकी हैं।
अब BRICS के एजेंडे में आर्थिक विकास के साथ युद्ध, सीमा विवाद, आर्थिक प्रतिबंध, ऊर्जा सुरक्षा, डॉलर पर निर्भरता, वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था, वैश्विक सप्लाई चेन और बदलते शक्ति संतुलन जैसे मुद्दे भी शामिल हो गए हैं।
पिछले एक दशक में दुनिया ने कोविड महामारी, रूस-यूक्रेन संघर्ष, पश्चिम एशिया में तनाव और अमेरिका-चीन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा जैसी कई बड़ी घटनाएं देखी हैं। ऐसे में BRICS की भूमिका भी केवल आर्थिक समूह तक सीमित न रहकर व्यापक भू-राजनीतिक मंच के रूप में बढ़ी है।
रूस-यूक्रेन संघर्ष के बीच पुतिन की भारत यात्रा अहम
रूस भारत का दशकों पुराना रणनीतिक साझेदार रहा है। रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच लंबे समय से मजबूत सहयोग रहा है।
हालांकि फरवरी 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किए जाने के बाद रूस की वैश्विक स्थिति में बड़ा बदलाव आया। अमेरिका और यूरोप ने रूस के खिलाफ कई आर्थिक और वित्तीय प्रतिबंध लगाए।
इन परिस्थितियों के बावजूद भारत ने रूस के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक रिश्तों को बनाए रखा। भारत ने रूस से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की खरीद भी जारी रखी और लगातार यह रुख अपनाया कि बातचीत और कूटनीति के जरिए संघर्ष का समाधान होना चाहिए।
BRICS Summit 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात पर इसलिए भी विशेष नजर रहेगी, क्योंकि दोनों नेता ऊर्जा, रक्षा, व्यापार और वैश्विक राजनीति से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा कर सकते हैं।
पिछले 10 साल में बढ़ा भारत का वैश्विक प्रभाव
2016 की तुलना में 2026 में भारत की वैश्विक भूमिका काफी अधिक प्रभावशाली दिखाई देती है। भारत ने पिछले एक दशक में अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया है, लेकिन साथ ही रूस के साथ अपने पुराने रणनीतिक रिश्तों को भी बरकरार रखा है।
चीन के साथ सीमा तनाव के बावजूद भारत ने बातचीत के रास्ते बंद नहीं किए। यही संतुलन भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
भारत की भूमिका ग्लोबल साउथ के देशों में भी मजबूत हुई है। 2023 में भारत की G20 अध्यक्षता के दौरान विकासशील देशों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता दी गई। इसी दौरान अफ्रीकी संघ को G20 का स्थायी सदस्य बनाए जाने में भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
BRICS Summit 2026 भारत के लिए एक बार फिर ग्लोबल साउथ की आवाज को प्रमुखता देने और बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था की अपनी सोच को आगे बढ़ाने का अवसर है।
भारत-चीन संबंधों के लिए भी अहम होगा सम्मेलन
भारत और चीन के संबंधों में पिछले एक दशक के दौरान बड़ा बदलाव देखने को मिला है। 2016 में शी जिनपिंग गोवा BRICS Summit में शामिल हुए थे और 2019 में भी भारत की यात्रा पर आए थे। उस समय दोनों देशों के संबंध अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में थे।
लेकिन 2020 में पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर तनाव ने भारत-चीन संबंधों को गंभीर रूप से प्रभावित किया। गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक झड़प के बाद दोनों देशों के रिश्तों में लंबे समय तक तनाव बना रहा।
इसके बाद दोनों देशों के सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर कई दौर की बातचीत हुई। कई इलाकों में डिसइंगेजमेंट की प्रक्रिया आगे बढ़ी और सैनिकों को आमने-सामने की स्थिति से पीछे हटाया गया। हालांकि सीमा क्षेत्रों में दोनों पक्षों की सैन्य तैनाती अब भी महत्वपूर्ण स्तर पर बनी हुई है।
भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि सीमा पर शांति और स्थिरता दोनों देशों के व्यापक द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने के लिए जरूरी है। ऐसे में BRICS Summit 2026 के दौरान नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की मौजूदगी भारत-चीन संबंधों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
पांच देशों से बढ़कर बड़ा वैश्विक समूह बना BRICS
करीब 10 साल पहले BRICS में केवल पांच सदस्य देश थे- ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका। अब इस समूह का काफी विस्तार हो चुका है।
इंडोनेशिया, मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के जुड़ने के बाद BRICS का आर्थिक और भौगोलिक प्रभाव बढ़ा है। खाड़ी और पश्चिम एशिया के देशों की भागीदारी से ऊर्जा बाजार में भी समूह की भूमिका महत्वपूर्ण हुई है।
BRICS के विस्तार से यह समूह दुनिया की बड़ी आबादी, ऊर्जा संसाधनों और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला मंच बन गया है।
विस्तार के साथ BRICS की चुनौतियां भी बढ़ीं
BRICS का विस्तार उसके लिए अवसर के साथ चुनौती भी लेकर आया है। नए सदस्य देशों के अपने रणनीतिक हित, क्षेत्रीय विवाद और विदेश नीति की प्राथमिकताएं हैं।
BRICS में ऐसे देश भी शामिल हैं जिनके अमेरिका और यूरोप के साथ मजबूत संबंध हैं, वहीं कुछ सदस्य पश्चिमी प्रतिबंधों या भू-राजनीतिक संघर्षों से जुड़े हुए हैं।
ऐसे में महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर सभी सदस्य देशों को एक साझा रुख पर लाना आसान नहीं है। पश्चिम एशिया की स्थिति, रूस-यूक्रेन संघर्ष और वैश्विक आर्थिक प्रतिबंध जैसे मुद्दों पर सदस्यों की प्राथमिकताओं में अंतर देखा जा सकता है।
साझा बयान तैयार करना हो सकता है चुनौतीपूर्ण
इस बार सम्मेलन के दौरान पश्चिम एशिया की मौजूदा परिस्थितियों को लेकर भी विभिन्न देशों के रुख सामने आ सकते हैं। ईरान और खाड़ी देशों के अपने क्षेत्रीय हित हैं, जबकि भारत सहित कई सदस्य स्थिरता, संवाद और ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं।
इस वजह से BRICS के साझा घोषणापत्र या संयुक्त बयान में सभी सदस्य देशों के हितों के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण चुनौती होगी।
मोदी-पुतिन-जिनपिंग की मौजूदगी पर दुनिया की नजर
BRICS Summit 2026 का सबसे बड़ा राजनीतिक आकर्षण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की एक ही मंच पर मौजूदगी होगी।
तीनों देशों के बीच कई मुद्दों पर अलग-अलग रणनीतिक प्राथमिकताएं हैं। भारत और चीन के बीच सीमा से जुड़े मतभेद हैं, रूस और चीन के रिश्ते लगातार मजबूत हुए हैं, जबकि भारत अमेरिका और पश्चिम के साथ भी अपने संबंधों का विस्तार कर रहा है।
इन जटिल समीकरणों के बीच दिल्ली में होने वाला BRICS Summit इस बात का संकेत देगा कि उभरती अर्थव्यवस्थाएं भविष्य की वैश्विक व्यवस्था में किस तरह की भूमिका निभाना चाहती हैं।
हमारी यूट्यूब चैनल को लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करे
Like, Share and Subscribe our YouTube channel