विश्व हिंदू परिषद (VHP) के पूर्व अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष और राम जन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे अशोक सिंहल की जन्मशताब्दी वर्ष की शुरुआत 27 सितंबर से हो रही है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अशोक सिंहल के साथ बिताए अपने वर्षों, उनके संगठनात्मक कौशल, सामाजिक कार्यों, राम जन्मभूमि आंदोलन में उनकी भूमिका और शिक्षा-संगीत के प्रति उनके लगाव को याद किया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने अशोक सिंहल के जीवन को लोक कल्याण के लिए समर्पित जीवन का उदाहरण बताते हुए कहा कि उन्होंने आध्यात्मिक साधना, सांस्कृतिक जागरण और समाज एवं संगठन के कार्यों को आगे बढ़ाने में दशकों लगाए।
PM मोदी ने सुभाषित के जरिए किया अशोक सिंहल को याद
अशोक सिंहल को याद करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने एक प्रसिद्ध पंक्ति का उल्लेख किया— “वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर। परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर।”
इसका भावार्थ बताते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रकार वृक्ष स्वयं अपने फल नहीं खाता और नदी अपना पानी अपने पास नहीं रखती, उसी तरह संत स्वभाव के लोग अपने जीवन में स्वयं को प्राथमिकता देने के बजाय दूसरों की सेवा और लोक कल्याण के लिए समर्पित रहते हैं।
पीएम मोदी के मुताबिक, भारतीय ऋषि परंपरा ने सदियों से यही संदेश दिया है कि मानवता के कल्याण के लिए समर्पित जीवन का महत्व व्यक्तिगत उपलब्धियों से कहीं अधिक होता है। उन्होंने अशोक सिंहल के जीवन को इसी भावना का उदाहरण बताया।

27 सितंबर से अशोक सिंहल का जन्मशताब्दी वर्ष
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि 27 सितंबर से अशोक सिंहल का जन्मशताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है। उन्होंने इसे एक महान व्यक्तित्व के सम्मान का महत्वपूर्ण अवसर बताया।
मोदी ने कहा कि अशोक सिंहल ने आध्यात्मिक साधना और सांस्कृतिक जागरण के साथ समाज तथा संगठन के कार्यों को दशकों तक समर्पित भाव से आगे बढ़ाया। उनके मुताबिक, अशोक सिंहल का पूरा जीवन राष्ट्र, संस्कृति और समाज के लिए काम करने में बीता।
श्री अशोक सिंहल जी का व्यक्तित्व दृढ़ संकल्प और सादगी का अद्भुत संगम था।
संगठन के कार्यों के प्रति उनकी निष्ठा, आध्यात्मिक आस्था और सामाजिक एकता के लिए समर्पण हर किसी को प्रेरित करता रहेगा।
उनके जीवन और विचारों को समर्पित मेरा यह आलेख…https://t.co/rTqJLxE0Uu
— Narendra Modi (@narendramodi) September 28, 2026
PM मोदी ने याद किया 1981 में मिला अशोक सिंहल का पत्र
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अशोक सिंहल के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उन्हें लंबे समय तक सिंहल के साथ काम करने, उनसे सीखने, संवाद करने और उनका स्नेह प्राप्त करने का अवसर मिला।
मोदी ने 1981 की एक घटना को याद करते हुए बताया कि उस समय वह एक युवा कार्यकर्ता के रूप में संगठन की ओर से मिली जिम्मेदारियां निभा रहे थे। इसी दौरान उन्हें अशोक सिंहल का हाथ से लिखा एक पत्र मिला था।
पत्र में अशोक सिंहल ने एक महत्वपूर्ण आगामी कार्यक्रम की जानकारी देने के साथ उन्हें कुछ जिम्मेदारियां भी सौंपी थीं। मोदी ने कहा कि उस दौर में अशोक सिंहल का पत्र मिलना उनके लिए बेहद खास और यादगार क्षण था।
दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचते थे अशोक सिंहल
पीएम मोदी ने कहा कि उन्होंने अशोक सिंहल को कई दशकों तक लगातार काम करते देखा। सिंहल देश के दूर-दराज के इलाकों की लंबी और कई बार कठिन यात्राएं करते थे।
मोदी के अनुसार, अशोक सिंहल को गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों में जाना विशेष रूप से पसंद था। वह लगातार इस बात पर विचार करते थे कि समाज के वंचित और अंतिम पंक्ति में खड़े लोगों के लिए और क्या किया जा सकता है।
प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी सिंहल की सक्रियता का उल्लेख करते हुए मोदी ने कहा कि देश के किसी हिस्से में आपदा आने पर वह प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचने वाले शुरुआती लोगों में शामिल रहते या कार्यकर्ताओं को राहत कार्य के लिए मार्गदर्शन देते थे।
प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से 2001 के कच्छ भूकंप के बाद अशोक सिंहल के साथ अपने अनुभव को अविस्मरणीय बताया।
संपन्न परिवार में जन्म, लेकिन समाज सेवा का चुना रास्ता
अशोक सिंहल एक प्रतिष्ठित परिवार से आते थे। प्रधानमंत्री के अनुसार, उनके पिता महावीर सिंहल की पहचान एक प्रशासक के रूप में थी। उनके भाई बी.पी. सिंहल पुलिस अधिकारी रहे और बाद में संसद सदस्य भी बने, जबकि वी.पी. सिंहल त्रिपुरा के मुख्य सचिव रहे।
परिवार के अन्य सदस्यों ने भी अलग-अलग क्षेत्रों में सफलता हासिल की, लेकिन अशोक सिंहल का झुकाव छोटी उम्र से ही समाज और राष्ट्र से जुड़े कार्यों की ओर था।
प्रयागराज में पले-बढ़े सिंहल का संगम और वहां आने वाले साधु-संतों से विशेष जुड़ाव था। प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार, इस वातावरण ने भारत के सांस्कृतिक लोकाचार के प्रति उनकी समझ को और समृद्ध किया।
RSS से जुड़े और संगठन के कार्यों में हुए सक्रिय
समाज के लिए काम करने की इच्छा अशोक सिंहल को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) तक ले गई। पीएम मोदी के मुताबिक, उन्हें संगठन में जो भी जिम्मेदारी मिली, उसे उन्होंने अनुशासन, उत्साह और कर्तव्यभाव से निभाया।
बाद में वह विश्व हिंदू परिषद के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए। उनकी ओजस्वी वक्तृत्व शैली, संगठनात्मक क्षमता और देशभर के संत समाज के साथ संबंधों ने उन्हें हिंदू संगठनों के बीच एक प्रभावशाली व्यक्तित्व बनाया।
मोदी ने कहा कि देशभर के साधु-संतों के बीच अशोक सिंहल का काफी सम्मान था और उनके परामर्श को महत्व दिया जाता था।
1993 के अमेरिका सम्मेलन को PM मोदी ने किया याद
प्रधानमंत्री ने अशोक सिंहल की संगठनात्मक क्षमता से जुड़ी दो महत्वपूर्ण घटनाओं का भी उल्लेख किया।
पहली घटना 1993 की थी, जब विश्व हिंदू परिषद ने स्वामी विवेकानंद के शिकागो संबोधन के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर अमेरिका में एक सम्मेलन आयोजित किया था। मोदी के अनुसार, विदेश में इतने बड़े सम्मेलन की कल्पना, योजना और विभिन्न समूहों को एक मंच पर लाने का प्रयास अशोक सिंहल की संगठनात्मक क्षमता को दर्शाता था।
दूसरी घटना वर्ष 2000 में त्रिनिदाद और टोबैगो के पोर्ट ऑफ स्पेन में आयोजित विश्व हिंदू सम्मेलन की थी। प्रधानमंत्री मोदी भी उस कार्यक्रम में मौजूद थे। उन्होंने याद किया कि अशोक सिंहल की उपस्थिति ने वहां मौजूद प्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं में उत्साह भर दिया था।
राम जन्मभूमि आंदोलन में अशोक सिंहल की भूमिका
प्रधानमंत्री मोदी ने अशोक सिंहल को याद करते हुए राम जन्मभूमि आंदोलन में उनकी भूमिका को विशेष रूप से रेखांकित किया।
उन्होंने 1991 की बोट क्लब रैली में सिंहल के संबोधन और राम मंदिर आंदोलन के दौरान उनकी सक्रियता को याद किया। मोदी ने कहा कि अयोध्या में आज भव्य राम मंदिर के पीछे उन अनेक लोगों का समर्पण है, जिन्होंने इस उद्देश्य के लिए स्वयं को पूरी तरह लगा दिया था और अशोक सिंहल भी उनमें प्रमुख थे।
प्रधानमंत्री ने कहा कि यदि अशोक सिंहल आज जीवित होते तो अयोध्या में राम मंदिर देखकर बेहद भावुक और प्रसन्न होते।
सामाजिक समरसता को लेकर क्या सोचते थे अशोक सिंहल?
प्रधानमंत्री मोदी के मुताबिक, अशोक सिंहल सामाजिक समरसता और समानता के समर्थक थे। उनका मानना था कि समाज में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए और प्रत्येक व्यक्ति समान गरिमा एवं सम्मान का अधिकारी है।
मोदी ने अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन के दौरान कामेश्वर चौपाल से शिलान्यास की पहली ईंट रखवाए जाने के प्रसंग का भी उल्लेख किया। कामेश्वर चौपाल बिहार से आने वाले VHP कार्यकर्ता थे और वंचित समुदाय से ताल्लुक रखते थे।
इसके अलावा काशी में आयोजित एक धर्म संसद के दौरान डोम राजा को सम्मानित करने और विभिन्न सामुदायिक अभियानों में साथ काम करने के अशोक सिंहल के प्रयासों का भी उल्लेख किया गया।
वैदिक शिक्षा और संगीत से था विशेष लगाव
राष्ट्र और संगठन से जुड़े कार्यों के अलावा शिक्षा और संगीत अशोक सिंहल के पसंदीदा विषयों में शामिल थे। विशेष रूप से वैदिक शिक्षा के प्रति उनकी गहरी रुचि थी।
अशोक सिंहल ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से शिक्षा प्राप्त की थी। वह एकल विद्यालय अभियान से भी गहराई से जुड़े रहे, जिसका उद्देश्य दूर-दराज और विशेष रूप से जनजातीय क्षेत्रों तक बुनियादी शिक्षा पहुंचाना रहा है।
पीएम मोदी ने उन्हें एक गंभीर अध्येता और उत्साही पाठक बताते हुए कहा कि वह युवा कार्यकर्ताओं को पुस्तकें पढ़ने के लिए लगातार प्रेरित करते थे।
गायन से भी लोगों को कर देते थे मंत्रमुग्ध
अशोक सिंहल की एक और प्रतिभा उनके गायन से जुड़ी थी। प्रधानमंत्री मोदी ने नागपुर में होने वाली बैठकों का जिक्र करते हुए कहा कि अशोक सिंहल वहां ‘एकल गीत’ गाया करते थे और उनका गायन पूरी बैठक में नई ऊर्जा भर देता था।
उन्होंने वर्ष 2015 में सिंहल के 90वें जन्मदिन समारोह को भी याद किया, जिसमें उन्होंने ‘हे मातृभूमि मेरी, हे पितृभूमि मेरी’ गीत गाया था।
युवाओं तक अशोक सिंहल के विचार पहुंचाने का आह्वान
अशोक सिंहल के जन्मशताब्दी वर्ष पर प्रधानमंत्री मोदी ने उनके जीवन और विचारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि अशोक सिंहल ने अपने जीवन का हर क्षण राष्ट्र के उत्कर्ष का सपना देखते हुए बिताया। जन्मशती के अवसर पर अधिक से अधिक युवाओं को उनके व्यक्तित्व, विचारों और कार्यों से परिचित कराया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री ने लोगों से राष्ट्र और देशवासियों के लिए अशोक सिंहल के सपनों को साकार करने के संकल्प को दोहराने का आह्वान किया।
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