मेघालय की तुरा लोकसभा सीट से कांग्रेस सांसद सालेंग ए. संगमा के प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर दिए बयान ने नई राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। संगमा ने विधेयक को लेकर अपनी चिंताओं के समर्थन में भारत के बाहर के समूहों और व्यक्तियों से भारत सरकार के समक्ष अपील करने का अनुरोध करने की बात कही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि किसी भारतीय कानून में प्रस्तावित बदलाव को लेकर विदेशी प्रतिनिधियों का समर्थन मांगना कितना उचित है और क्या इस मुद्दे पर अंतिम राजनीतिक तथा विधायी बहस भारतीय संसद के भीतर ही नहीं होनी चाहिए?
कांग्रेस सांसद ने विदेशी प्रतिनिधियों से मांगा समर्थन
सालेंग संगमा के मुताबिक, उन्होंने FCRA में प्रस्तावित संशोधनों को लेकर केंद्र सरकार के मंत्रियों के साथ-साथ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन के समक्ष भी अपनी चिंताएं रखी हैं।
संगमा ने कहा कि उन्होंने अमेरिका, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, मैक्सिको और अफ्रीकी देशों से जुड़े कुछ लोगों से भी संपर्क किया है। उनका कहना है कि इन लोगों से भारत सरकार के पास FCRA संशोधन विधेयक को लेकर अपील भेजने का अनुरोध किया गया है। संगमा का तर्क है कि विदेश से आने वाले ऐसे प्रतिनिधित्व प्रस्तावित बदलावों से जुड़ी चिंताओं की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित करने में मदद कर सकते हैं।
यहीं से राजनीतिक सवाल खड़ा होता है। जब एक निर्वाचित सांसद के पास संसद में अपनी बात रखने, सरकार से सवाल पूछने, संसदीय प्रक्रिया के माध्यम से संशोधनों का विरोध करने और राजनीतिक सहमति बनाने जैसे संवैधानिक मंच उपलब्ध हैं, तब भारतीय कानून को प्रभावित करने के लिए विदेशी समर्थन जुटाने की जरूरत क्यों महसूस हुई?
VERY SHOCKING! Meghalaya Congress MP Saleng Sangma seeks FOREIGN INTERVENTION against India’s proposed FCRA Bill amendments, asking delegates from the US, Australia, UK, & Africa to lobby the GoI.
=> Is our Parliament NOT SUPREME enough for Congress anymore?
— Megh Updates 🚨™ (@MeghUpdates) September 28, 2026
क्या कांग्रेस के लिए संसद की सर्वोच्चता पर्याप्त नहीं?
भारत में कानून बनाने और उसमें संशोधन करने का अधिकार संवैधानिक व्यवस्था के तहत संसद के पास है। किसी प्रस्तावित कानून से असहमति लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा है। विपक्षी सांसदों को सरकार की नीति और विधेयकों का विरोध करने, संशोधन प्रस्तावित करने और संसद के भीतर बहस करने का पूरा अधिकार है।
लेकिन कांग्रेस सांसद द्वारा विदेशी समूहों और प्रतिनिधियों से भारत सरकार पर अपनी चिंताएं रखने का आग्रह एक अलग राजनीतिक बहस को जन्म देता है। आलोचक सवाल उठा सकते हैं कि क्या किसी घरेलू विधायी मुद्दे पर विदेशी समर्थन जुटाना संसद के भीतर उपलब्ध लोकतांत्रिक रास्तों पर पर्याप्त भरोसा न होने का संकेत देता है?
हालांकि, संगमा के पक्ष को भी समझना जरूरी है। उनका कहना है कि उनका उद्देश्य विदेशी प्रतिनिधित्व के जरिए प्रस्तावित संशोधनों से प्रभावित होने वाले संस्थानों की चिंताओं की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करना है। इसलिए इसे सीधे विदेशी हस्तक्षेप साबित करने के बजाय उनके द्वारा अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की राजनीतिक रणनीति के रूप में देखना अधिक सटीक होगा।
आखिर FCRA क्या है?
FCRA का पूरा नाम Foreign Contribution (Regulation) Act यानी विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम है। यह भारत में विदेशों से आने वाले चंदे या आर्थिक योगदान को नियंत्रित करने वाला कानूनी ढांचा है।
इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेश से मिलने वाला पैसा भारत की संप्रभुता, राष्ट्रीय हित, सुरक्षा, चुनावी प्रक्रिया और सार्वजनिक हित के खिलाफ इस्तेमाल न हो। FCRA के तहत विदेशी योगदान प्राप्त करने वाले पात्र संगठनों को निर्धारित पंजीकरण, बैंकिंग, रिकॉर्ड रखने और अनुपालन संबंधी नियमों का पालन करना पड़ता है।
यही कारण है कि FCRA को केवल NGO फंडिंग का मामला मानना पर्याप्त नहीं है। इसका सीधा संबंध विदेशी धन के प्रवाह की पारदर्शिता और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।
मेघालय में क्यों हो रहा FCRA को लेकर विरोध?
इस विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष मेघालय के चर्च, सामाजिक और सामुदायिक संस्थानों की चिंता है। राज्य के चर्च और सामुदायिक नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने आशंका जताई है कि FCRA के नियम अधिक सख्त होने पर विदेशी योगदान पर निर्भर स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों, छात्रावासों और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों के कामकाज पर असर पड़ सकता है।
विशेष रूप से मेघालय जैसे पहाड़ी और दूरदराज के इलाकों वाले राज्य में कई गैर-सरकारी और धार्मिक-सामाजिक संस्थान शिक्षा, स्वास्थ्य तथा कल्याणकारी सेवाएं उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि केंद्र को कानून बनाते समय राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों और दूरदराज की आबादी तक इन संस्थानों की पहुंच को भी ध्यान में रखना चाहिए।
इसलिए विवाद के दो स्पष्ट पहलू हैं—एक तरफ विदेशी फंडिंग की पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय हित सुनिश्चित करने की आवश्यकता है, जबकि दूसरी तरफ वास्तविक सामाजिक संस्थाओं को अत्यधिक अनुपालन बोझ से बचाने की मांग है।
मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा ने चुना बातचीत का रास्ता
इस मुद्दे पर मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा का रुख कांग्रेस सांसद के तरीके से अलग दिखाई देता है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि राज्य FCRA से जुड़ी चिंताओं को लेकर केंद्र सरकार के साथ रचनात्मक बातचीत कर रहा है ताकि राज्य के संगठनों की समस्याओं का समाधान निकाला जा सके।
उन्होंने राज्य के गृह विभाग के अंतर्गत एक FCRA सेल स्थापित करने की घोषणा भी की है। इसका उद्देश्य संगठनों को आवेदन, नवीनीकरण और अनुपालन संबंधी प्रक्रियाओं में मदद करना तथा वास्तविक कल्याणकारी संस्थाओं के मामलों को सुगम बनाना है।
ऐसे में एक राजनीतिक तुलना भी सामने आती है—जहां राज्य सरकार केंद्र के साथ संस्थागत बातचीत और प्रशासनिक समाधान तलाश रही है, वहीं कांग्रेस सांसद ने घरेलू मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर से समर्थन जुटाने की कोशिश की है।
सवाल FCRA के साथ राजनीतिक तरीके का भी
FCRA में किसी प्रस्तावित बदलाव का विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है। यदि किसी संशोधन से स्कूलों, अस्पतालों या सामाजिक संस्थाओं पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है तो संसद में उस पर व्यापक चर्चा भी होनी चाहिए। प्रभावित पक्षों की चिंताओं को सुनना सरकार और विधायिका दोनों की जिम्मेदारी है।
लेकिन कांग्रेस सांसद सालेंग संगमा के बयान के बाद बहस अब केवल FCRA तक सीमित नहीं रह गई है। बड़ा सवाल यह बन गया है कि भारत की घरेलू विधायी प्रक्रिया से जुड़े विवाद में विदेशी समूहों और व्यक्तियों से राजनीतिक समर्थन मांगना उचित रणनीति है या नहीं।
संसद में जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को कानून पर बहस, विरोध और संशोधन का संवैधानिक अधिकार मिला हुआ है। ऐसे में कांग्रेस सांसद की विदेश से अपील मंगाने की कोशिश विपक्ष की रणनीति और संसद की भूमिका को लेकर राजनीतिक सवाल खड़े करती है।
हमारी यूट्यूब चैनल को लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करे
Like, Share and Subscribe our YouTube channel