भारत की प्राचीन वास्तुकला और जल-प्रबंधन तकनीक के कई उदाहरण आज भी इतिहास की समृद्ध विरासत की कहानी सुनाते हैं। इन्हीं में से एक तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली के पास तिरुवेल्लारई (Thiruvellarai) में स्थित करीब 1200 साल पुराना मारपिडुगु पेरुंगिनार (Marpidugu Perunginar) है, जिसे अपनी अनोखी बनावट के कारण आम तौर पर ‘स्वास्तिक कुआं’ (Swastika Well) कहा जाता है।
हाल में इस ऐतिहासिक कुएं के ड्रोन दृश्य चर्चा में आए हैं। ऊपर से देखने पर इसकी अनूठी ज्यामितीय संरचना साफ दिखाई देती है। चार दिशाओं से नीचे उतरती सीढ़ियों की व्यवस्था इसे स्वास्तिक जैसी आकृति प्रदान करती है। यह संरचना पल्लव काल की वास्तुकला और जल प्रबंधन कौशल का महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जाती है।
पल्लव राजा दंतिवर्मन के शासनकाल में हुआ था निर्माण
स्वास्तिक कुएं का इतिहास पल्लव राजवंश के शासनकाल से जुड़ा है। इसका निर्माण पल्लव राजा दंतिवर्मन के शासनकाल के दौरान कराया गया माना जाता है।
ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इस कुएं का निर्माण कंबन अरायन (Kamban Arayan) ने कराया था। वह पल्लव काल से जुड़े एक महत्वपूर्ण व्यक्ति और निर्माण कार्यों के संरक्षक माने जाते हैं। सदियों पहले तैयार की गई इसकी जटिल संरचना आज भी उस दौर की इंजीनियरिंग और वास्तुकला की उन्नत समझ को प्रदर्शित करती है।
क्यों कहा जाता है इसे ‘स्वास्तिक कुआं’?
इस ऐतिहासिक कुएं की सबसे बड़ी खासियत इसका डिजाइन है। सामान्य कुओं के विपरीत इसमें चार दिशाओं से पानी तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां बनाई गई हैं।
ऊपर से देखने पर चारों ओर की सीढ़ियां और उनके रास्ते मिलकर स्वास्तिक जैसी ज्यामितीय आकृति बनाते हैं। इसी विशेष डिजाइन के कारण इसे लोकप्रिय रूप से स्वास्तिक कुआं कहा जाता है। इसकी संरचना केवल सुंदरता या वास्तुकला तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके पीछे व्यावहारिक उद्देश्य भी था।
एक साथ कई लोग भर सकते थे पानी
प्राचीन समय में कुएं स्थानीय आबादी के लिए पानी का महत्वपूर्ण स्रोत हुआ करते थे। ऐसे में एक ही स्थान पर बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने से भीड़ की समस्या हो सकती थी।
स्वास्तिक कुएं में चार अलग-अलग दिशाओं से नीचे उतरने के रास्ते बनाए जाने से कई लोग एक साथ पानी तक पहुंच सकते थे। इससे एक ही मार्ग पर अत्यधिक भीड़ होने की समस्या कम होती थी। इस डिजाइन को उस समय की जल-प्रबंधन प्रणाली और सार्वजनिक उपयोग को ध्यान में रखकर की गई इंजीनियरिंग के उदाहरण के रूप में देखा जाता है।
ऐसा डिजाइन कि एक तरफ के लोग दूसरी ओर आसानी से नहीं दिखते
स्वास्तिक कुएं की ज्यामितीय संरचना की एक और दिलचस्प विशेषता इसके अलग-अलग सीढ़ीदार हिस्से हैं। डिजाइन के कारण अलग दिशाओं से नीचे उतरने वाले लोगों के रास्ते अलग रहते हैं।
इससे यह संरचना आधुनिक इंजीनियरिंग के ‘क्राउड मैनेजमेंट’ जैसे सिद्धांतों की याद दिलाती है। करीब 1200 साल पहले सार्वजनिक जलस्रोत को उपयोगी बनाने के लिए अपनाया गया यह डिजाइन आज भी लोगों को आकर्षित करता है।
पुंडरीकाक्ष पेरुमल मंदिर के पास मौजूद है ऐतिहासिक कुआं
यह ऐतिहासिक संरचना तमिलनाडु के तिरुवेल्लारई में स्थित प्रसिद्ध पुंडरीकाक्ष पेरुमल मंदिर (Pundarikaksha Perumal Temple) के पास मौजूद है।
तिरुवेल्लारई स्वयं तमिलनाडु का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल है। मंदिर परिसर और आसपास मौजूद प्राचीन संरचनाएं दक्षिण भारत के विभिन्न ऐतिहासिक कालखंडों की वास्तुकला और धार्मिक परंपराओं की झलक पेश करती हैं।
शिलालेख भी बताते हैं कुएं का इतिहास
स्वास्तिक कुएं से संबंधित शिलालेख इसके इतिहास को समझने के लिए महत्वपूर्ण स्रोत माने जाते हैं। इनसे इसके निर्माण और बाद के समय में हुए रखरखाव तथा जीर्णोद्धार जैसी गतिविधियों के बारे में जानकारी मिलती है।
ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, बाद के कालखंडों में स्थानीय व्यापारियों और अन्य संपन्न लोगों ने भी ऐसी सार्वजनिक एवं धार्मिक संरचनाओं के संरक्षण में योगदान दिया।
आधुनिक संदर्भ में इसकी तुलना सामाजिक उत्तरदायित्व या Corporate Social Responsibility (CSR) से की जा सकती है, हालांकि प्राचीन समय में इसके लिए आज का ‘CSR’ शब्द या आधुनिक कॉरपोरेट व्यवस्था मौजूद नहीं थी।
प्राचीन भारत के जल प्रबंधन का अनोखा उदाहरण
भारत में बावड़ियों, तालाबों, कुंडों और सीढ़ीदार जलस्रोतों की लंबी परंपरा रही है। अलग-अलग क्षेत्रों की जलवायु और स्थानीय जरूरतों के मुताबिक इनका निर्माण किया जाता था।
तिरुवेल्लारई का स्वास्तिक कुआं इस परंपरा का एक अनूठा उदाहरण है। इसकी ज्यामितीय संरचना यह दिखाती है कि प्राचीन निर्माणकर्ता केवल जल संग्रह पर ही नहीं, बल्कि पानी तक लोगों की आसान पहुंच और सार्वजनिक उपयोग पर भी ध्यान देते थे।
करीब 1200 साल बाद भी इसकी बनावट और इंजीनियरिंग लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। ड्रोन से ऊपर से देखने पर इसकी पूरी ज्यामितीय संरचना और अधिक प्रभावशाली नजर आती है, जिसने एक बार फिर इस प्राचीन धरोहर को चर्चा में ला दिया है।
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