गुजरात के भावनगर जिले के महुवा तालुका स्थित प्रसिद्ध बगदाना धाम पिछले 27 वर्षों से पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा बचत का ऐसा उदाहरण पेश कर रहा है, जिसकी देशभर में चर्चा हो रही है। यहां प्रतिदिन 10 हजार से अधिक श्रद्धालुओं के लिए भोजन तैयार किया जाता है, लेकिन इसके लिए न तो एलपीजी गैस का उपयोग होता है और न ही पेड़ों की लकड़ी काटी जाती है।
बगदाना धाम के विशाल रसोईघर में कपास के डंठल, पराली और अन्य कृषि अवशेषों से तैयार बायोमास ईंधन का उपयोग किया जाता है। इस अनूठी व्यवस्था से न केवल पर्यावरण संरक्षण हो रहा है, बल्कि करोड़ों रुपये की गैस की बचत भी हो रही है।
खेती के कचरे से बनता है बायोमास ईंधन
बगदाना आश्रम के अनुसार, महुवा, तलाजा, पालिताना और जेसर क्षेत्र के 50 से अधिक गांवों के किसान कपास के डंठल और कृषि अवशेष उपलब्ध कराते हैं। किसान खेतों में ही इन डंठलों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर बायोमास तैयार करते हैं।
इसके बाद पूरे वर्ष के उपयोग के लिए इसे आश्रम के स्टोरेज केंद्रों में सुरक्षित रखा जाता है। आवश्यकता पड़ने पर ट्रैक्टरों के माध्यम से यह बायोमास रसोई तक पहुंचाया जाता है, जहां इसका उपयोग भोजन पकाने में किया जाता है।
रोजाना 12 गैस सिलेंडर के बराबर बचत
आश्रम प्रबंधन के अनुसार, यदि प्रतिदिन 10 हजार लोगों के लिए भोजन एलपीजी गैस पर तैयार किया जाए तो लगभग 12 व्यावसायिक गैस सिलेंडर की आवश्यकता पड़ेगी।
एक 19 किलोग्राम के कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की औसत कीमत लगभग ₹1,850 मानी जाए तो प्रतिदिन करीब ₹21,500 की गैस बचत होती है।
अनुमानित बचत
- प्रतिदिन गैस बचत: ₹21,500
- मासिक बचत: लगभग ₹6.45 लाख
- वार्षिक बचत: लगभग ₹79 लाख
- 27 वर्षों में कुल बचत: ₹26.80 करोड़ से अधिक
1.45 लाख से अधिक गैस सिलेंडरों की बचत
आश्रम से जुड़े पदाधिकारियों के अनुसार, पिछले 27 वर्षों में करीब 1.45 लाख एलपीजी सिलेंडरों की बचत हुई है। इस दौरान लगभग 12.50 करोड़ श्रद्धालुओं के लिए भोजन तैयार किया गया।
यह मॉडल न केवल ऊर्जा बचत का उदाहरण है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास का भी सफल नमूना माना जा रहा है।
विशेष अवसरों पर लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं
बगदाना धाम से जुड़े योगेशभाई सागर के अनुसार, सामान्य दिनों में प्रतिदिन लगभग 10 हजार श्रद्धालु भोजन ग्रहण करते हैं।
वहीं विशेष अवसरों पर श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ जाती है:
- पूनम पर: लगभग 60 हजार श्रद्धालु
- गुरु पूर्णिमा पर: 2.5 से 3 लाख श्रद्धालु
- बजरंगदास बापा पुण्यतिथि पर: 2.5 से 3 लाख श्रद्धालु
इन सभी अवसरों पर भी भोजन बायोमास आधारित ग्रीन किचन में ही तैयार किया जाता है।
पर्यावरण संरक्षण का राष्ट्रीय मॉडल
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कृषि अवशेषों को जलाने के बजाय इस तरह ऊर्जा स्रोत के रूप में उपयोग किया जाए तो प्रदूषण में बड़ी कमी लाई जा सकती है।
बगदाना धाम का यह मॉडल किसानों, धार्मिक संस्थानों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संगठनों के लिए प्रेरणास्रोत बन गया है। जहां एक ओर देश के कई हिस्सों में पराली जलाने से प्रदूषण बढ़ता है, वहीं बगदाना धाम उसी कृषि अवशेष को ऊर्जा में बदलकर समाज सेवा और पर्यावरण संरक्षण दोनों का कार्य कर रहा है।
आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश
बगदाना धाम का यह ग्रीन किचन केवल भोजन बनाने की व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह सतत विकास, स्वच्छ ऊर्जा और पर्यावरण संरक्षण का जीवंत उदाहरण बन चुका है। पिछले 27 वर्षों से बिना गैस और बिना लकड़ी के हजारों लोगों के लिए भोजन तैयार कर यह धाम देशभर के धार्मिक और सामाजिक संस्थानों के लिए एक प्रेरणादायक मॉडल प्रस्तुत कर रहा है।
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