भारत-बांग्लादेश सीमा पर अवैध घुसपैठ और मानव तस्करी से जुड़े कथित नेटवर्क को लेकर एक विस्तृत पड़ताल सामने आई है, जिसमें एक पूर्व बिचौलिए ने कई सनसनीखेज दावे किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वर्षों तक सक्रिय रहे इस नेटवर्क का सालाना कारोबार लगभग 800 से 900 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। दावा किया गया है कि सीमा के दोनों ओर फैले एजेंटों, स्थानीय संपर्कों, फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले गिरोहों और डिजिटल भुगतान चैनलों के जरिए यह पूरा नेटवर्क संचालित होता था।
रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले से जुड़े सीमावर्ती क्षेत्रों में लंबे समय तक यह नेटवर्क सक्रिय रहा। पूर्व बिचौलिए का दावा है कि अवैध रूप से सीमा पार कराने के लिए एक संगठित व्यवस्था बनाई गई थी, जिसमें सीमा के दोनों ओर मौजूद लोगों की स्पष्ट भूमिकाएं तय थीं। कथित तौर पर लोगों को सीमा पार कराने से लेकर उन्हें देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाने के लिए अलग-अलग स्तर पर नेटवर्क काम करता था।
‘घाट’ और ‘लाइनमैन’ के जरिए संचालित होती थी गतिविधियां
पड़ताल में दावा किया गया है कि सीमा से लगे कई इलाकों में ऐसे स्थान मौजूद थे जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘घाट’ कहा जाता था। इन स्थानों का उपयोग कथित तौर पर लोगों को सीमा पार कराने के लिए किया जाता था। बताया गया कि कुछ लोग सीमा सुरक्षा गतिविधियों पर नजर रखते थे और सुरक्षित मार्गों की जानकारी नेटवर्क के अन्य सदस्यों तक पहुंचाते थे।
दावों के अनुसार, खेतों, झाड़ियों और सीमावर्ती क्षेत्रों में छिपे हुए कुछ लोग निगरानी का काम करते थे। जब उन्हें लगता था कि किसी विशेष क्षेत्र में निगरानी कम है, तब सीमा पार आवाजाही की कोशिश की जाती थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ऐसी गतिविधियां केवल रात के समय ही नहीं बल्कि अवसर मिलने पर दिन में भी की जाती थीं।
Anandabazar Investigation Exposes a Massive Bangladesh Infiltration Network
A report claims illegal infiltration across the India-Bangladesh border has evolved into a ₹900 crore annual racket.
• “Ghats” identified as key infiltration points on both sides of the border.
— Facts (@BefittingFacts) June 19, 2026
भारतीय और बांग्लादेशी सिम कार्ड से बनाए रखते थे संपर्क
पूर्व बिचौलिए के अनुसार, नेटवर्क के सदस्य भारत और बांग्लादेश दोनों देशों के मोबाइल नंबरों और सिम कार्डों का इस्तेमाल करते थे। कथित तौर पर सीमा के दोनों ओर मौजूद एजेंट लगातार संपर्क में रहते थे और विभिन्न चरणों की जानकारी साझा करते थे। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि कई मामलों में डिजिटल भुगतान माध्यमों का उपयोग कर पैसों का लेनदेन किया जाता था।
कथित तौर पर सीमा पार करने के बाद लोगों को बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन या अन्य सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी स्थानीय नेटवर्क के सदस्यों की होती थी। इसके बाद उन्हें विभिन्न राज्यों और शहरों तक भेजने के लिए अलग व्यवस्था की जाती थी।
प्रति व्यक्ति तय थी रकम, करोड़ों में पहुंचा कारोबार
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सीमा पार कराने के लिए प्रति व्यक्ति एक निश्चित रकम ली जाती थी, जिसका बंटवारा नेटवर्क से जुड़े अलग-अलग लोगों के बीच होता था। पूर्व बिचौलिए का कहना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही होती थी, जिसके कारण इस पूरे नेटवर्क का आर्थिक आकार लगातार बढ़ता गया।
हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल के वर्षों में सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी बढ़ने और सत्यापन प्रक्रियाओं के सख्त होने के कारण ऐसी गतिविधियों में कमी आई है।
फर्जी दस्तावेज तैयार कराने का समानांतर तंत्र
पड़ताल में एक और गंभीर दावा यह किया गया है कि सीमा पार आने के बाद पहचान स्थापित करने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार कराने का एक समानांतर नेटवर्क भी सक्रिय था। आरोप है कि कुछ मामलों में जन्म प्रमाणपत्र, निवास प्रमाणपत्र, आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और पैन कार्ड जैसे दस्तावेज हासिल कराने के लिए स्थानीय स्तर पर संपर्कों का इस्तेमाल किया जाता था।
रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ मामलों में स्थानीय प्रभावशाली लोगों और प्रशासनिक तंत्र से जुड़े व्यक्तियों की मदद से दस्तावेज तैयार कराए जाते थे। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और जांच एजेंसियों की ओर से इस संबंध में विस्तृत निष्कर्ष सामने आना बाकी है।
हालिया बदलावों के बाद नेटवर्क पर असर
रिपोर्ट के अनुसार, नवंबर 2025 में मतदाता सूची सत्यापन अभियान शुरू होने और हाल के प्रशासनिक बदलावों के बाद कथित नेटवर्क की गतिविधियों पर असर पड़ा है। पूर्व बिचौलिए का दावा है कि बढ़ी हुई निगरानी, दस्तावेज सत्यापन और सुरक्षा उपायों के कारण यह कारोबार लगभग ठप होने की स्थिति में पहुंच गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत-बांग्लादेश सीमा से जुड़े मुद्दे राष्ट्रीय सुरक्षा, अवैध प्रवासन और दस्तावेज सत्यापन से सीधे जुड़े हुए हैं। ऐसे मामलों में किसी भी दावे की अंतिम पुष्टि विस्तृत जांच और आधिकारिक एजेंसियों की रिपोर्ट के बाद ही संभव होती है।
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