महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित प्रसिद्ध श्री त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर परिसर से एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व की खबर सामने आई है। मंदिर परिसर के भीतर बने प्राचीन ‘अमृत कुंड’ की सफाई के दौरान कुंड की तलहटी में एक प्राचीन शिवलिंग दिखाई दिया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI की ओर से चल रहे संरक्षण और सफाई कार्य के दौरान यह शिवलिंग सामने आया।
रिपोर्ट्स के अनुसार, यह शिवलिंग 65 फीट गहरे अमृत कुंड के तल में दशकों से पानी, गाद और मलबे के नीचे दबा हुआ था। जब ASI की टीम ने संरक्षण कार्य के तहत कुंड का पानी निकाला और तलहटी की सफाई शुरू की, तब काले पत्थर का शिवलिंग स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा। इस दुर्लभ दृश्य के सामने आने के बाद मंदिर प्रशासन और श्रद्धालुओं में उत्साह का माहौल है।
अमृत कुंड की सफाई के दौरान सामने आया शिवलिंग
त्र्यंबकेश्वर मंदिर परिसर में स्थित अमृत कुंड को अत्यंत पवित्र माना जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, इस कुंड के पानी का उपयोग मुख्य श्री त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की दैनिक पूजा, अर्चना और महाभिषेक के लिए किया जाता है। सुरक्षा और पवित्रता के कारण आम श्रद्धालुओं को इस कुंड में प्रवेश की अनुमति नहीं होती।
ASI की टीम मंदिर परिसर में संरक्षण कार्य कर रही थी। इसी प्रक्रिया के तहत अमृत कुंड को खाली कर उसकी गाद और जमा मलबा हटाया गया। जैसे-जैसे सफाई आगे बढ़ी, तलहटी से शिवलिंग का आकार सामने आने लगा। स्थानीय स्तर पर इसे कई वर्षों बाद शिवलिंग के दर्शन के रूप में देखा जा रहा है।
कितना पुराना है यह शिवलिंग?
इस शिवलिंग की सटीक उम्र को लेकर अभी कोई आधिकारिक वैज्ञानिक रिपोर्ट सामने नहीं आई है। इसकी उम्र तय करने के लिए पेट्रोग्राफिक स्टडी, पत्थर की संरचना, तलछट विश्लेषण और पुरातात्विक परीक्षण जैसे अध्ययन जरूरी होंगे। इसलिए फिलहाल इसे “प्राचीन” या “पेशवाकालीन माने जाने वाले कुंड से मिला शिवलिंग” कहा जा रहा है।
इतिहास के आधार पर माना जा रहा है कि यह शिवलिंग कम से कम मराठा-पेशवा काल से जुड़ा हो सकता है, क्योंकि श्री त्र्यंबकेश्वर देवस्थान ट्रस्ट के अनुसार वर्तमान त्र्यंबकेश्वर मंदिर का निर्माण तीसरे पेशवा बालाजी बाजीराव ने एक पुराने मंदिर के स्थान पर कराया था। ट्रस्ट की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, वर्तमान मंदिर 18वीं सदी के मराठा काल से जुड़ा है।
During the ongoing conservation works by ASI at the Trimbakeshwar Temple, Nashik, a stone Shivalinga was discovered during the desilting of the temple’s historic water tank, locally known as Amrit Kund.
The Shivalinga was found at the bottom of the tank while removing… pic.twitter.com/34KcEk3AUb
— Archaeological Survey of India (@ASIGoI) July 1, 2026
240 साल या उससे भी ज्यादा पुराना होने की संभावना
अगर यह शिवलिंग वर्तमान मंदिर परिसर के निर्माण काल से जुड़ा है, तो इसकी उम्र करीब 240 साल या उससे अधिक हो सकती है। हालांकि, कुछ स्थानीय मान्यताओं और मौखिक परंपराओं में इसे इससे भी पुराना बताया जा रहा है। लेकिन जब तक ASI या किसी अधिकृत प्रयोगशाला की वैज्ञानिक जांच पूरी नहीं होती, तब तक इसकी निश्चित उम्र को प्रमाणित रूप से नहीं कहा जा सकता।
ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से यह खोज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मंदिर भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। त्र्यंबकेश्वर देवस्थान ट्रस्ट के अनुसार, यह क्षेत्र पवित्र गोदावरी नदी के उद्गम स्थल के पास स्थित है और त्र्यंबकेश्वर को भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में विशेष स्थान प्राप्त है।
औरंगजेब काल से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं पर चर्चा
इस खोज के बाद स्थानीय स्तर पर एक और चर्चा तेज हुई है। कुछ स्थानीय कथाओं और मौखिक इतिहास में दावा किया जाता है कि पुराने समय में आक्रमणों से धार्मिक प्रतीकों को बचाने के लिए मंदिर से जुड़े शिवलिंग और मूर्तियों को जल निकायों या सुरक्षित स्थानों में छिपाया जाता था। इसी आधार पर कुछ लोग इस शिवलिंग को और भी प्राचीन मान रहे हैं।
हालांकि, इस दावे का अभी तक कोई पुख्ता लिखित या वैज्ञानिक प्रमाण सामने नहीं आया है। इसलिए इसे ऐतिहासिक तथ्य के बजाय स्थानीय मान्यता और जांच का विषय माना जाना चाहिए। आने वाले समय में अगर इस शिवलिंग की वैज्ञानिक जांच होती है, तो इसकी वास्तविक उम्र और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को लेकर अधिक स्पष्ट जानकारी मिल सकती है।
बेसाल्ट पत्थर और संरक्षण का महत्व
त्र्यंबकेश्वर और नासिक क्षेत्र दक्कन ट्रैप भू-क्षेत्र का हिस्सा है, जहाँ काले बेसाल्ट पत्थर की प्रचुरता मिलती है। इसी पत्थर का उपयोग महाराष्ट्र के कई प्राचीन मंदिरों, किलों और स्थापत्य संरचनाओं में किया गया है। बेसाल्ट मजबूत, टिकाऊ और मौसम की मार सहने वाला पत्थर माना जाता है।
यही वजह हो सकती है कि लंबे समय तक पानी और गाद के नीचे दबे रहने के बावजूद शिवलिंग का आकार सुरक्षित दिखाई दे रहा है। हालांकि, इसकी संरचना और संरक्षण स्थिति पर अंतिम टिप्पणी विशेषज्ञ जांच के बाद ही की जा सकती है।
साधारण सफाई नहीं, सांस्कृतिक विरासत की खोज
अमृत कुंड की सफाई केवल एक नियमित रखरखाव का काम नहीं रही, बल्कि यह भारत की प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी महत्वपूर्ण खोज बन गई है। बारिश और समय के साथ ऐसे जल निकायों में मिट्टी, रेत और जैविक पदार्थों की परतें जमा होती रहती हैं। अगर इन्हें वैज्ञानिक तरीके से हटाया जाए, तो कई बार इतिहास के छिपे हुए प्रमाण सामने आ सकते हैं।
ASI द्वारा त्र्यंबकेश्वर मंदिर में संरक्षण कार्य की तैयारी पहले से चल रही थी। वर्ष 2025 में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया था कि आगामी सिंहस्थ कुंभ मेले को ध्यान में रखते हुए ASI को त्र्यंबकेश्वर मंदिर के रासायनिक संरक्षण और सफाई कार्य की मंजूरी मिली थी।
श्री त्र्यंबकेश्वर मंदिर का धार्मिक महत्व
श्री त्र्यंबकेश्वर मंदिर महाराष्ट्र के नासिक शहर से लगभग 28 से 30 किलोमीटर दूर ब्रह्मगिरि पर्वत की तलहटी में स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। त्र्यंबकेश्वर का संबंध पवित्र गोदावरी नदी के उद्गम से भी जुड़ा है, जिसके कारण यह स्थान धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
त्र्यंबकेश्वर देवस्थान ट्रस्ट के अनुसार, वर्तमान मंदिर पुराने मंदिर के स्थान पर तीसरे पेशवा बालाजी बाजीराव के समय में निर्मित हुआ था। वर्ष 1954 में संस्थान को पब्लिक ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत किया गया था और आज मंदिर ट्रस्ट द्वारा पूजा, उत्सव, भक्त सुविधाओं और व्यवस्थाओं का संचालन किया जाता है।
श्रद्धालुओं में उत्साह, आगे की जांच पर नजर
अमृत कुंड से शिवलिंग के दर्शन होने के बाद श्रद्धालुओं में उत्साह है। मंदिर परिसर में इसे आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण घटना माना जा रहा है। हालांकि, इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों की नजर अब इस बात पर रहेगी कि क्या ASI इस शिवलिंग की उम्र और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को लेकर कोई वैज्ञानिक परीक्षण कराता है।
अगर वैज्ञानिक जांच में इसके कालखंड की पुष्टि होती है, तो यह खोज त्र्यंबकेश्वर मंदिर के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ सकती है। फिलहाल यह घटना मंदिर की धार्मिक महत्ता, पुरातात्विक संरक्षण और भारत की प्राचीन विरासत के प्रति नई रुचि पैदा कर रही है।
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