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हॉलीवुड में चमकी कच्छ की ‘अजरक’ कला तो पाकिस्तान ने ठोका दावा, क्रिस्टोफर नोलन की टाई से छिड़ा क्रेडिट विवाद

हॉलीवुड में चमकी कच्छ की ‘अजरक’ कला तो पाकिस्तान ने ठोका दावा, क्रिस्टोफर नोलन की टाई से छिड़ा क्रेडिट विवाद

हॉलीवुड के मशहूर फिल्ममेकर क्रिस्टोफर नोलन ने न्यूयॉर्क में अपनी फिल्म ‘द ओडिसी’ के प्रीमियर के दौरान अजरक सिल्क की टाई पहनकर भारतीय हस्तकला को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाई। युवा भारतीय डिजाइनर अहान टंडन द्वारा डिजाइन की गई इस टाई की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होते ही कच्छ की पारंपरिक अजरक कला चर्चा का विषय बन गई।

हालांकि, भारत और कच्छ के लिए गौरव का यह पल जल्द ही सोशल मीडिया विवाद में बदल गया। कुछ पाकिस्तानी सोशल मीडिया अकाउंट्स ने दावा करना शुरू कर दिया कि अजरक कला मूल रूप से पाकिस्तान की है और भारत को इसका श्रेय नहीं मिलना चाहिए। इन दावों के बाद सोशल मीडिया पर अजरक की उत्पत्ति, विरासत और सांस्कृतिक पहचान को लेकर बहस तेज हो गई।

भारतीय डिजाइनर की टाई ने खींचा दुनिया का ध्यान

क्रिस्टोफर नोलन की अजरक सिल्क टाई को भारतीय डिजाइनर अहान टंडन ने तैयार किया था। नोलन जैसे विश्व प्रसिद्ध फिल्ममेकर द्वारा इसे पहनने के बाद भारतीय वस्त्र कला और पारंपरिक प्रिंटिंग तकनीक को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक पहचान मिली।

सोशल मीडिया पर भारतीय यूजर्स ने इसे कच्छ के कारीगरों और भारत की समृद्ध हस्तशिल्प परंपरा के लिए गर्व का क्षण बताया। लोगों ने कहा कि एक भारतीय डिजाइनर और स्थानीय कारीगरों की कला को हॉलीवुड के मंच पर पहचान मिलना पूरे देश के लिए सम्मान की बात है।

पाकिस्तानी अकाउंट्स ने जताया विरोध

अजरक टाई की तस्वीर वायरल होने के बाद कई पाकिस्तानी सोशल मीडिया अकाउंट्स ने पोस्ट साझा कर दावा किया कि अजरक सिंध की कला है और भारत को इसका क्रेडिट नहीं दिया जाना चाहिए। कुछ यूजर्स ने भारतीय डिजाइनर और कच्छ की भूमिका पर भी सवाल उठाए।

इसके बाद भारतीय सोशल मीडिया यूजर्स ने अजरकपुर, कच्छ के खत्री कारीगरों और भारत में अजरक की सदियों पुरानी परंपरा का उल्लेख करते हुए इन दावों का जवाब दिया। भारतीय पक्ष का कहना है कि अजरक की परंपरा सीमाओं से पुरानी है और कच्छ आज इसके सबसे प्रमुख तथा सक्रिय केंद्रों में शामिल है।

क्या है अजरक कला?

अजरक एक पारंपरिक ब्लॉक प्रिंटिंग कला है, जिसमें प्राकृतिक रंगों, लकड़ी के ब्लॉक्स और कई चरणों वाली जटिल प्रक्रिया के जरिए कपड़ों पर विशिष्ट ज्यामितीय डिजाइन तैयार किए जाते हैं। इसमें मुख्य रूप से गहरे नीले, लाल, काले और सफेद रंगों का इस्तेमाल किया जाता है।

यह कला भारत के कच्छ और पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र में लंबे समय से प्रचलित रही है। भारत में कच्छ के खत्री समुदाय के कारीगरों ने इस परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखा है। अजरक को तैयार करने में कई दिन लग सकते हैं और प्रत्येक चरण में बेहद सावधानी तथा पारंपरिक कौशल की आवश्यकता होती है।

कच्छ का अजरकपुर बना कला की पहचान

कच्छ में अजरक कला को मिलने वाले सम्मान का सबसे बड़ा उदाहरण अजरकपुर गांव है। इस गांव और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले खत्री कारीगर परिवार कई पीढ़ियों से अजरक प्रिंटिंग का काम कर रहे हैं।

अजरकपुर आज न केवल भारत बल्कि दुनिया के कई देशों में इस पारंपरिक कला का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहां तैयार कपड़े, शॉल, साड़ी, दुपट्टे और फैशन एक्सेसरीज देश-विदेश में पसंद की जाती हैं।

स्थानीय कारीगरों ने पारंपरिक तकनीक को सुरक्षित रखते हुए इसे आधुनिक फैशन के अनुरूप भी ढाला है। क्रिस्टोफर नोलन की टाई इसी बात का उदाहरण है कि कच्छ की सदियों पुरानी कला अब अंतरराष्ट्रीय फैशन और सिनेमा जगत तक पहुंच रही है।

साझा सांस्कृतिक विरासत पर छिड़ी बहस

इतिहासकारों और हस्तकला विशेषज्ञों के अनुसार, अजरक की परंपरा आधुनिक भारत-पाकिस्तान की सीमाओं से कहीं पुरानी है। विभाजन से पहले कच्छ, सिंध और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के बीच सांस्कृतिक तथा व्यापारिक संबंध थे।

इसलिए अजरक को केवल एक देश तक सीमित करने के बजाय इसे व्यापक क्षेत्र की साझा सांस्कृतिक विरासत के रूप में भी देखा जाता है। हालांकि, भारत में कच्छ के कारीगरों द्वारा इस कला को लगातार जीवित रखना और वैश्विक बाजार तक पहुंचाना एक स्थापित वास्तविकता है।

क्रेडिट विवाद के बीच कारीगरों की मेहनत पर ध्यान जरूरी

सोशल मीडिया पर भारत और पाकिस्तान के बीच छिड़ी बहस के बीच सबसे अहम पहलू उन कारीगरों की मेहनत है, जिन्होंने अजरक कला को पीढ़ियों से संरक्षित किया है। किसी भी पारंपरिक कला की पहचान केवल उसके इतिहास से नहीं, बल्कि उसे वर्तमान में जीवित रखने वाले कलाकारों और समुदायों से भी बनती है।

क्रिस्टोफर नोलन द्वारा अजरक टाई पहनना कच्छ के कारीगरों, भारतीय डिजाइन और पारंपरिक हस्तशिल्प के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। सोशल मीडिया पर क्रेडिट को लेकर विवाद जारी रह सकता है, लेकिन इस घटना ने अजरक कला को वैश्विक स्तर पर नई चर्चा और पहचान जरूर दिला दी है।

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