अमेरिका ने रूस की ऊर्जा आय पर दबाव बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। अमेरिकी सीनेट ने शुक्रवार, 7 अगस्त 2026 को ‘Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026’ को 86-11 वोटों से मंजूरी दे दी। इस विधेयक के कानून बनने पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से बड़े पैमाने पर तेल और गैस खरीदने वाले देशों से आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है।
भारत और चीन उन प्रमुख देशों में शामिल हैं जिन पर इस प्रस्ताव का असर पड़ सकता है। हालांकि, सीनेट से बिल पारित होने का मतलब यह नहीं है कि भारत पर तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लागू हो गया है। विधेयक को अभी अमेरिकी प्रतिनिधि सभा यानी House of Representatives से मंजूरी मिलनी बाकी है। इसके बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने पर ही यह कानून बन सकेगा।
रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका का निशाना
विधेयक का मुख्य उद्देश्य रूस की तेल और गैस बिक्री से होने वाली कमाई को कम करना है। अमेरिका और यूक्रेन समर्थक सांसदों का तर्क है कि रूस को ऊर्जा निर्यात से मिलने वाला राजस्व यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने की उसकी आर्थिक क्षमता को मजबूत करता है।
नए प्रावधान राष्ट्रपति को उन देशों के खिलाफ व्यापारिक कार्रवाई करने का अधिकार दे सकते हैं जो रूसी ऊर्जा के बड़े खरीदार हैं। भारत और चीन रूस के तेल के प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं और इसी वजह से दोनों देशों को इस कानून के सबसे महत्वपूर्ण संभावित लक्ष्यों के तौर पर देखा जा रहा है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रस्तावित टैरिफ स्वचालित रूप से लागू नहीं होंगे। कानून बनने के बाद भी टैरिफ लगाने, उनमें बदलाव करने या कुछ परिस्थितियों में राहत देने का अधिकार राष्ट्रपति के पास रह सकता है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बिल?
भारत के लिए यह मुद्दा खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारतीय रिफाइनरियों ने रूस से रियायती कीमतों पर बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदना शुरू किया।
रूसी तेल ने भारत को वैश्विक ऊर्जा बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच एक वैकल्पिक सप्लाई सोर्स उपलब्ध कराया है।
ऐसे में अमेरिका की ओर से रूसी तेल खरीद को भारत के साथ व्यापारिक संबंधों से जोड़ना नई दिल्ली के लिए आर्थिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर चुनौती पैदा कर सकता है।
पहले 500%, अब 100% तक टैरिफ का प्रस्ताव
रूस प्रतिबंध विधेयक के पहले के संस्करण में रूसी तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव चर्चा में था। लेकिन अमेरिकी संसद में सहमति बनाने के प्रयासों के बाद संशोधित प्रस्ताव में टैरिफ सीमा को घटाकर अधिकतम 100 प्रतिशत किया गया।
संशोधित विधेयक में रूसी ऊर्जा के सबसे बड़े खरीदारों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान रूसी कच्चे तेल के प्रमुख खरीदारों में गिने गए हैं।
‘लिंडसे ओ. ग्राहम रूस और ईरान पर प्रतिबंध लगाने वाला अधिनियम, 2026’
इस विधेयक का नाम दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ओ. ग्राहम के सम्मान में रखा गया है। ग्राहम रूस के खिलाफ कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने और यूक्रेन को अमेरिकी समर्थन जारी रखने के प्रमुख समर्थकों में शामिल थे।
लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल लंबे समय से ऐसे कानून को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे, जो केवल रूस पर सीधे प्रतिबंध लगाने के बजाय रूसी ऊर्जा खरीदने वाले तीसरे देशों पर भी आर्थिक दबाव डाल सके।
जुलाई 2026 में पेश किए गए संशोधित प्रस्ताव को 60 से अधिक सीनेटरों का समर्थन मिला था और आखिरकार 7 अगस्त को सीनेट ने इसे भारी बहुमत से पारित कर दिया।
पुतिन और रूसी संस्थानों पर भी नए प्रतिबंध
विधेयक केवल भारत, चीन या अन्य रूसी ऊर्जा खरीदार देशों पर संभावित टैरिफ तक सीमित नहीं है।
इसके तहत रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से जुड़े अधिकारियों, रूसी कुलीन वर्ग के प्रभावशाली लोगों, वित्तीय संस्थानों और ऊर्जा कारोबार से जुड़े नेटवर्क के खिलाफ अतिरिक्त प्रतिबंध लगाने की व्यवस्था भी शामिल है।
रूस की तथाकथित ‘शैडो फ्लीट’ और प्रतिबंधों से बचकर ऊर्जा कारोबार करने वाले नेटवर्क पर भी अमेरिकी कार्रवाई मजबूत करने की कोशिश की गई है।
इसका उद्देश्य रूस के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था और ऊर्जा बाजार के जरिए युद्ध के लिए धन जुटाना मुश्किल बनाना है।
ईरान पर भी सख्ती बढ़ाने की तैयारी
इस विधेयक में रूस के साथ ईरान से जुड़े प्रतिबंधों को भी शामिल किया गया है।
अमेरिकी सांसद ईरान के ऊर्जा और हथियार क्षेत्रों पर मौजूदा प्रतिबंध व्यवस्था को आगे बढ़ाने और मजबूत करने का समर्थन कर रहे हैं। इसके चलते यह बिल सिर्फ रूस-यूक्रेन युद्ध से संबंधित कानून न होकर अमेरिका की व्यापक रूस और ईरान प्रतिबंध नीति का हिस्सा बन गया है।
भारत-अमेरिका व्यापार पर क्या हो सकता है असर?
अगर यह बिल कानून बनता है और ट्रंप प्रशासन भारत पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने के अधिकार का इस्तेमाल करता है, तो इसका सीधा असर भारत से अमेरिका जाने वाले कई उत्पादों की कीमत और प्रतिस्पर्धात्मकता पर पड़ सकता है।
टैरिफ बढ़ने पर अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान महंगा हो सकता है। इससे भारतीय निर्यातकों के ऑर्डर और मार्जिन पर दबाव पैदा होने की आशंका रहेगी।
इसके साथ ही भारत के सामने एक रणनीतिक सवाल भी खड़ा होगा—क्या वह सस्ता रूसी कच्चा तेल खरीदना जारी रखे या अमेरिका के साथ अपने विशाल व्यापारिक संबंधों को देखते हुए रूसी तेल आयात की रणनीति में बदलाव करे?
हालांकि इस समय ऐसे किसी फैसले की स्थिति नहीं है क्योंकि विधेयक अभी अमेरिकी कानून नहीं बना है।
अमेरिका में भी टैरिफ प्रावधानों का विरोध
रूस के खिलाफ कड़े प्रतिबंधों को अमेरिकी सीनेट में व्यापक द्विदलीय समर्थन मिला है, लेकिन राष्ट्रपति को व्यापक टैरिफ अधिकार दिए जाने को लेकर मतभेद मौजूद हैं।
आलोचकों का कहना है कि 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की शक्ति का इस्तेमाल अमेरिका के महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदारों के खिलाफ किया जा सकता है। इससे अमेरिका में आयातित वस्तुओं की कीमत बढ़ने और अमेरिकी उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ने का खतरा भी है।
रिपब्लिकन सीनेटर रैंड पॉल समेत कुछ सांसदों ने इन्हीं कारणों से विधेयक के टैरिफ प्रावधानों पर आपत्ति जताई है।
अब House of Representatives में अगली परीक्षा
सीनेट से मंजूरी मिलने के बाद अब इस बिल की अगली बड़ी परीक्षा अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में होगी।
हाउस 31 अगस्त 2026 के बाद अवकाश से लौटेगा। वहां विधेयक को उसी स्वरूप में मंजूरी मिलती है या इसमें बदलाव होते हैं, यह भारत समेत कई देशों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा।
यदि हाउस बिल में बदलाव करता है, तो सीनेट और हाउस के संस्करणों को एक समान करने की प्रक्रिया भी करनी पड़ सकती है। अंतिम रूप से दोनों सदनों से मंजूरी मिलने के बाद इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर के लिए भेजा जाएगा।
इसके बाद ही राष्ट्रपति को रूसी ऊर्जा के बड़े खरीदार देशों पर प्रस्तावित टैरिफ लगाने का कानूनी अधिकार मिल सकेगा।
भारत के लिए आगे क्या?
फिलहाल भारत पर नए 100 प्रतिशत टैरिफ लागू नहीं हुए हैं। इसलिए इसे तत्काल अमेरिकी टैरिफ घोषणा के बजाय संभावित नई प्रतिबंध व्यवस्था के रूप में देखना जरूरी है।
लेकिन सीनेट में 86 सांसदों का समर्थन इस बात का संकेत है कि अमेरिकी संसद के एक बड़े हिस्से में रूस की ऊर्जा आय को निशाना बनाने के लिए भारत और चीन जैसे बड़े खरीदार देशों पर दबाव बढ़ाने की इच्छा मौजूद है।
अब नजर अमेरिकी प्रतिनिधि सभा और ट्रंप प्रशासन पर रहेगी। बिल कानून बनता है और राष्ट्रपति इसके टैरिफ प्रावधानों का इस्तेमाल करते हैं तो इसका प्रभाव केवल रूस-यूक्रेन युद्ध तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत-अमेरिका व्यापार, भारतीय निर्यात और नई दिल्ली की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति तक दिखाई दे सकता है।
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