मुंबई की एक सेशन कोर्ट ने शुक्रवार, 7 अगस्त 2026 को टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के दो छात्रों—अभिरूप पॉल (32) और कामख्या दास (23)—की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया। यह पूरा मामला अक्टूबर 2025 में दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा की बरसी पर आयोजित एक सभा के दौरान कथित तौर पर प्रतिबंधित और विवादास्पद गतिविधियों से जुड़ा हुआ है।
क्या है पूरा मामला? (Background)
यह घटना 12 अक्टूबर 2025 की है, जब TISS के देओनार कैंपस में शाम 7:30 से 8:30 बजे के बीच 10-12 छात्रों का एक समूह जुटा था। संस्थान के एसोसिएट डीन की शिकायत के अनुसार, यह सभा बिना किसी पूर्व अनुमति के आयोजित की गई थी। इस दौरान एक पेड़ पर जीएन साईबाबा की तस्वीरें लगाई गईं और उनकी कविताएँ पढ़ी गईं।
जीएन साईबाबा को 2017 में माओवादी संगठनों से संबंधों के आरोप में दोषी ठहराया गया था, हालांकि 2024 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया था। अक्टूबर 2025 में उनके निधन के बाद TISS परिसर में यह श्रद्धांजलि सभा रखी गई थी।
पुलिस कार्रवाई और अन्य छात्रों को राहत
ट्रॉम्बे पुलिस ने इस मामले में कुल 9 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की थी, जिसे बाद में मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच को ट्रांसफर कर दिया गया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, सभा के दौरान उमर खालिद और शरजील इमाम को जेल से रिहाई की मांग वाले नारे भी लगाए गए थे।
हालांकि, इसी मामले में शामिल सात अन्य छात्रों को अदालत ने अग्रिम जमानत दे दी, क्योंकि उनके खिलाफ मुख्य आरोप केवल सभा में शामिल होने का था और उनके पास से कोई आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई थी।
कोर्ट ने नारों और आचरण पर क्या कहा?
अतिरिक्त सत्र जज वीबी बोहरा ने फैसला सुनाते हुए कहा कि साईबाबा को श्रद्धांजलि देना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है, क्योंकि उन्हें बरी कर दिया गया था। लेकिन दोनों आरोपी छात्रों की गतिविधियां केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं थीं।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि छात्रों पर UAPA के तहत आरोपित उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई के समर्थन में नारे लगाने का आरोप है। जज ने कहा कि छात्र होने के नाते आरोपितों से कानून की मर्यादा का सम्मान करने की अपेक्षा की जाती है।
किताबों और माओवादी सामग्री पर चिंता
विशेष लोक अभियोजक शिशिर हिरे ने जमानत का विरोध करते हुए कोर्ट को बताया कि दोनों छात्रों के लैपटॉप और मोबाइल से आपत्तिजनक और माओवादी विचारधारा से जुड़ी सामग्री बरामद हुई है। इनमें माओत्से तुंग की पुस्तकें, व्लादिमीर लेनिन के लेख, कोबाड घांडी की किताब और CPI (Maoist) से जुड़े प्रकाशन शामिल थे। साथ ही यह भी दावा किया गया कि कुछ डेटा डिलीट किया गया था।
बचाव पक्ष के वकीलों ने तर्क दिया कि केवल किताबें डाउनलोड करना माओवादी होना साबित नहीं करता क्योंकि ये किताबें खुले बाजार में उपलब्ध हैं। इस पर कोर्ट ने माना कि केवल किताबें डाउनलोड करना अपराध नहीं है, लेकिन इनमें मौजूद सामग्री भारत के विभाजन और उग्रवादी विचारधारा को बढ़ावा देने से जुड़ी प्रतीत होती है। इससे प्रथम दृष्टया यह संदेह पैदा होता है कि आरोपी माओवादी सोच से प्रभावित थे और इसे अन्य छात्रों तक पहुँचाने का प्रयास कर रहे थे। इसी आधार पर अदालत ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।
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