कांग्रेस पार्टी इन दिनों मोदी सरकार पर विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) का गलत इस्तेमाल करने और इसके जरिए नागरिक समाज समूहों व गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) पर दबाव बनाने का आरोप लगा रही है। हालांकि, FCRA के इतिहास पर नजर डालें तो विदेशी फंडिंग पर सरकारी नियंत्रण की नींव और इसे कड़ा बनाने की रूपरेखा कांग्रेस सरकारों के कार्यकाल में ही रखी गई थी।
FCRA का ऐतिहासिक घटनाक्रम (1976 – 2026)
| वर्ष | सरकार / प्रधानमंत्री | मुख्य प्रावधान व बदलाव |
| 1976 | इंदिरा गांधी (आपातकाल) | FCRA कानून की शुरुआत। पत्रकारों, नेताओं, जजों और सरकारी कर्मचारियों के विदेशी चंदे पर पूरी रोक। |
| 1985 | राजीव गांधी | पूर्व अनुमति व्यवस्था समाप्त; गृह मंत्रालय (MHA) के साथ अनिवार्य औपचारिक पंजीकरण की शुरुआत। |
| 2010 | डॉ. मनमोहन सिंह (UPA) | नया FCRA अधिनियम। पंजीकरण की 5 साल की सीमा, ‘राजनीतिक प्रकृति के संगठन’ श्रेणी और 50% प्रशासनिक खर्च सीमा लागू। |
| 2011-13 | मनमोहन सिंह (UPA) | कुडनकुलम परमाणु प्लांट विरोध के दौरान ~4,000 NGOs के FCRA लाइसेंस रद्द व बैंक खाते फ्रीज। |
| 2020-26 | नरेंद्र मोदी (NDA) | पारदर्शिता और राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर FCRA नियमों में आगे के महत्वपूर्ण संशोधन। |
आपातकाल में इंदिरा गांधी ने रखी थी FCRA की नींव (1976)
देश में 1975-77 के आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा 1976 में पहली बार FCRA कानून पारित किया गया। उस समय नागरिक स्वतंत्रताएं सीमित थीं और राजनीतिक विरोधियों को जेल में रखा गया था।
इस कानून का मुख्य उद्देश्य विदेशी आर्थिक मदद के जरिए घरेलू राजनीति में दखल को रोकना था। प्रतिबंधित सूची में निम्न वर्गों को शामिल किया गया:
- चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार
- पत्रकार, संपादक, कार्टूनिस्ट, कॉलम लेखक और प्रकाशक
- न्यायाधीश, सरकारी कर्मचारी व निगमों के कर्मचारी
- सांसद और विधायक
- राजनीतिक दल व उनके पदाधिकारी
राजीव गांधी सरकार: नौकरशाही निगरानी का दायरा बढ़ा (1985)
1985 में राजीव गांधी सरकार ने कानून में संशोधन कर यह अनिवार्य कर दिया कि विदेशी फंड प्राप्त करने वाले प्रत्येक संगठन को गृह मंत्रालय के साथ औपचारिक पंजीकरण कराना होगा। इससे पहले तक सामान्य सूचना या अस्थायी अनुमति से भी काम चल जाता था।
UPA सरकार और 2010 का नया FCRA अधिनियम
मनमोहन सिंह सरकार में तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम के कार्यकाल के दौरान 2010 में नया FCRA कानून लागू हुआ:
- राजनीतिक प्रकृति के संगठन (Section 5): सरकार को यह अधिकार मिला कि वह किसी भी विरोध-प्रदर्शन करने वाले समूह को ‘राजनीतिक प्रकृति’ का मानकर विदेशी फंड रोक सके।
- प्रशासनिक सीमा (Section 8): विदेशी चंदे का अधिकतम 50% ही संचालन, वेतन व प्रशासनिक कार्यों में खर्च करने की अनुमति दी गई।
कुडनकुलम परमाणु प्लांट विवाद (2011-2013):
UPA सरकार के दौरान जब तमिलनाडु के कुडनकुलम आंदोलन के कारण रूसी परमाणु प्रोजेक्ट में देरी हुई, तब तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह ने स्वयं विदेशी NGOs की भूमिका पर सवाल उठाए थे। इसके बाद गृह मंत्रालय ने करीब 4,000 NGOs के पंजीकरण रद्द कर दिए थे और कई संस्थाओं के खाते फ्रीज कर दिए थे।
निष्कर्ष
FCRA कानून को लेकर सरकारी नियंत्रण कोई हालिया व्यवस्था नहीं है, बल्कि पिछले पांच दशकों में अलग-अलग सरकारों (विशेषकर कांग्रेस शासनकाल) द्वारा इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता के नाम पर लगातार मजबूत किया जाता रहा है।
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