राष्ट्रीय राजधानी के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में एक बार फिर वैचारिक और राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इस बार विवाद की मुख्य वजह कैंपस में UAPA के तहत जेल में बंद आरोपी उमर खालिद की किताब ‘फ्रैक्चर्ड कम्यूनिटी’ (Fractured Community) पर आयोजित एक चर्चा कार्यक्रम रहा। इस कार्यक्रम के दौरान जेएनयू छात्र संघ (JNUSU) और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के आमने-सामने आने से परिसर में तनाव का माहौल पैदा हो गया।
जेएनयू कैंपस में क्यों हुआ विवाद?
मूल रूप से यह कार्यक्रम जेएनयू के एक ऑडिटोरियम में आयोजित किया जाना था। हालांकि, विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से अनुमति न मिलने के बाद जेएनयू छात्र संघ ने इस कार्यक्रम को एसएसएस-2 (SSS-2) कैंपस के बाहर खुले में आयोजित किया।
चर्चा के दौरान कार्यक्रम में उमर खालिद की रिहाई की मांग करते हुए ‘जेल के ताले टूटेंगे, सारे साथी छूटेंगे’ और ‘उमर खालिद को छोड़ दो’ जैसे नारे गूंजे। इसके ठीक विरोध में एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने भी उमर खालिद और देश विरोधी गतिविधियों के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। दोनों छात्र संगठनों के आमने-सामने आने से कैंपस में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी करनी पड़ी।
मुंबई के TISS मामले का भी उठा संदर्भ
इस पूरे घटनाक्रम के बीच मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल Sciences (TISS) से जुड़े एक कानूनी मामले की भी चर्चा तेज हो गई है, जहाँ अदालत ने उमर खालिद और शरजील इमाम के समर्थन में नारे लगाने वाले छात्रों को जमानत देने से इनकार कर दिया था।
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क्या था मामला: 12 अक्टूबर 2025 को TISS के कुछ छात्रों ने माओवादी गतिविधियों के आरोपी रहे दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जी.एन. साईबाबा की बरसी पर एक कार्यक्रम आयोजित किया था। प्रोफेसर साईबाबा को 2017 में दोषी ठहराया गया था, जिन्हें बाद में 2024 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने बरी कर दिया था और अक्टूबर 2024 में उनका निधन हो गया था।
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नारेबाजी और FIR: इस श्रद्धांजलि सभा के दौरान कथित तौर पर UAPA के तहत बंद उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई के नारे भी लगाए गए थे। इस मामले में मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने FIR दर्ज की थी।
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कोर्ट की सख्त टिप्पणी: अतिरिक्त सत्र जज वी.बी. बोहरा ने आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि हालांकि जी.एन. साईबाबा को बरी किए जाने के बाद उन्हें श्रद्धांजलि देना गैरकानूनी नहीं है, लेकिन छात्रों द्वारा UAPA के तहत आरोपी व्यक्तियों की रिहाई के समर्थन में नारे लगाना और वह भी किसी सार्वजनिक आंदोलन के बिना, कानून के दायरे से बाहर है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि छात्रों से देश के कानून की मर्यादा का सम्मान करने की उम्मीद की जाती है।
जेएनयू में हुई ताजा घटना ने एक बार फिर विश्वविद्यालयों में वैचारिक बहस, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानूनी मामलों की सीमाओं को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर एक नई बहस छेड़ दी है।
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